जनआन्दोलन राष्ट्रवादी या राष्ट्रघाती
अभिषेक झा:फरवरी १३-१९९६ में प्रायः देश में अमन चैन था । कहीं किसी अनहोनी घटना की आशंका नहीं थी । अचानक लोग अपने-अपने हाथों में हँसिये-हथौडे छाप झंडे और अस्त्र-शस्त्र ले कर ‘माओवादी जिन्दावाद’ के नारों से देश व्याप्त चुप्पी को भंग करने लगे । युवाओं की भीडÞ आग में घी डÞालने का काम करने लगी थी । चारों ओर भय का वातावरण व्याप्त हो गया । किसी ने अचानक आगे आई भीडÞ के लोगों से प्रश्न करते हुए पूछा कि यह भीडÞ कैसी है और क्यों है – सवाल का जवाव भीडÞ से आया कि हम माओवादी हैं, देश के रखनेवाले हैं, देश को निरंकुश शासकों के चंगुल से छुडÞाने के लिए हम सडक पर उतरे हैं ।
माओवादियों का तथाकथित आन्दोलन नेपाल में १० वर्ष ९ महीने, ८ दिन तक चला । इस क्रम में धनजन की वर्वादी कितनी हर्ुइ, कहना कठिन है । आन्दोलन के बारे में विश्लेषण करने से लगता है कि यह जनआन्दोलन नहीं, प्रतिगामी उग्रवादी आन्दोलन हुआ । इस आन्दोलन ने शुरुवाती दौडÞ में खूब जनभावना बटोरा । इस जनभावना के पीछे माओवादियों का नारा था । नारा में समाविष्ट भावना थी सिर्फजनता की भलाई और देश की बहुमुखी प्रगति । पर सत्ता प्राप्ति के बाद वैसी स्थिति नहीं दिखी, जो नारा में दिखाई गई थी । आज की सत्ता प्राप्ति के लिए किए गए आन्दोलन में करीब निरीह, निर्दाेष १८००० जनता की ज्ाान और उससे जुडे लोगों की जीवन लीला को गोली और बारुद की भट्टी में झांेक दिया गया ।

तथाकथित आन्दोलन की उपलब्धि देश और जनता के हित में शून्य ही रही । तार्त्पर्य यह है कि एकाधिपत्य शासन को अन्त करने के लक्ष्य तो पूरा हुआ पर आन्दोलन के गर्भ में छिपी सत्ता प्राप्ति ही परिलक्षित हर्ुइ, जो आज भी देखी जा रही है । आन्दोलन की सफलता के बाद माओवादी नेता गण जनता और देश हित की बात को दरकिनार करते शासन व्यवस्था पर र्सवसत्तावादी प्रभुत्व जमाने में तत्पर हो गए । माओवादियों का सत्ता में आने के बाद जनता या देश के हित में किस क्षेत्र में क्या-क्या काम हुआ, यह बात खुली किताब की तरह सब के सामने है ।
माओवादी पक्षधर लोग इस आन्दोलन को राष्ट्रीयहित से जोडÞते है । पर लोगों ने जिस राष्ट्रीय भावना को आत्मसात करके आन्दोलन किया था, आन्दोलन की सफलता के बाद शब्द का शाब्दिक अर्थ ही बदल कर रख दिया । इन के विचारानुसार राष्ट्र शायद अपने निरंकुशतावादी दमन को स्थायी बनाए रखने के लिए ऐसी प्रणाली होनी चाहिए, जिसकी नीति हो- ‘डिभाइड एण्ड रुल’ । अपने आप को शान्ति का दूत बताने वाले माओवादी लोग राष्ट्र और राष्ट्रीयता का नारा देखकर अपने सपने पूरे करने के लिए कितने निर्दोष, निरीह नागरिकों की बलि चढÞ दी, लेखा-जोखा करना कठिन है ।
नेपाल में दश वर्षका लम्बा समय द्वन्द्वकाल के नाम से जाना जाता है । यह काल खण्ड किस उद्देश्य से निर्मित हुआ था, वह उद्देश्य विज्ञ-विश्लेषकों के विचारानुसार पूरा तो नहीं हुआ पर देश को चौतर्फी -समाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, औद्योगिक, आर्थिक, जातीय भेद भाव आदि) हानी उठानी पडÞी । माओवादी नेता लोग जनता को सींढÞी बना कर सत्ता की कर्ुर्सर्ीीो पाने में सफल हो गए । पर जनता को दिखाए गए सपने टुटी माला की तरह बिखर गए । जनता को अब दिए नारों पर अमल करने का वक्त आ गया है ।

