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जय दास तंत्र की ? : बिम्मी शर्मा

 

हम यह भूल जाते हैं कि वह हमारे भविष्य से पहले अपना वर्तमान देख कर नीतियों का निर्माण करते हैं । वह खुद को हमारे मालिक समझते हैं और हम से दासों जैसा व्यवहार करते हैं क्योंकि हम दिमाग से दास ही हैं

बिम्मी शर्मा, हिमालिनी २०२० डिसेम्वर अंक | इस देश के सभी नागरिक दास हीं हैं इसी लिए अपनी रक्षा नहीं कर सकते और ऐब मालिक की खोज में रहते हैं । उनके लिए मालिक तो राजा ही हैं इसी लिए गणतंत्र से मन भरते ही या सत्ता की ठोकर लगते ही राजा आऊ देश बचाऊ का नारा लगा कर चिल्लाने लगते हैं । जैसे राजा नहीं भगवान जगन्नाथ जी हैं जो पुकारा सुनते ही दौड़ पड़ेगें । पर इस देश की दास और मुर्ख जनता यह भूल जाती है कि भगवान जगन्नाथ जी भी कुछ नहीं कर पाते तो यह राजा किस खेत की मूली हैं ? अपने डग्र एडिक्ट बेटे को तो नशे की लत से बचा नहीं पा रहे हैं और तीन करोड़ जनता की यह रक्षा करेंगे ? दिवा स्वप्न देखने की भी एक सीमा होती है न ?

गजेन्द्र हाथी को जब नदी में ग्राहा ने उसके पैर को काट कर लहुलुहान कर दिया तब घायल गजेन्द्र ने रो–रो कर गोविंद से विनती की कि वह आ कर उसकी रक्षा करे । और गोविंद ने भी देरी न करते हुए ग्राहा से गजेन्द्र की रक्षा की । हम गजेन्द्र जैसे घायल जनता भी तो सत्तारुपी ग्राहा से पीडि़त हैं । उस से मुक्ति चाहते हैं पर हमे बचाने के लिए कोई गोविंद नहीं आने वाला । वह गजेन्द्र तो सिर्फ हाथी था पर हम तो मनुष्य चोला में होते हुए भी दास हैं । और दास की न कोई बुद्धि और विवेक होती है न कोई मोक्ष की कामना । हम तो बस एक मालिक के द्वार से दूसरे मालिक के द्वार तक फेरा लगाते रहते हैं कि वह हमको मुक्ति देगा ? पर मालिक तो मुंह फेर कर काजु खाने मे व्यस्त हैं ।
इस देश में जब राणा शासन था तब भी, राजतंत्र था तब भी, पंचायती राज था तब भी और अब बहुदलीय गणतंत्र है तब भी दास थे हैं और रहेंगे । बिना दासों का मालिक अपनी सत्ता कैसे चलाएँगे और राज करेंगे ? दास है तभी तो सत्ता निरकुंश हो कर भी पद में टिकी रहती हैं । दासों भजन कीर्तन से मालिक प्रसन्न होते हैं और उनको भी मेवा मिष्ठान्न खाने को देते हैं । मालिक भी खुश और दास भी खुश । दासों को और चाहिए ही क्या ? बस दो टाईम डकार मारने को मिल जाए फिर मालिक जो भी हो उनके जूते सुंघने को मिल जाए तो दासों को इसी मे मीठी और गहरी नींद आ जाती है । बाकी दुनिया जाए भाड़ में दासों को अपनी दासगिरी प्यारी है ।

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दास की चटाई में पैदा हुए और उसी की रजांई मे सोने वाले खानदानी दास अब भी चाहते हैं की इस देश में खानदान शाही फिर से फले फूले और बरगद का वृक्ष बने इसी लिए उसके सूखे हुए जड़ को फिर से पानी से सींच रहे है कि कभी तो यह हरा होगा ? इसी लिए प्रधान मुंशी ओली द्वारा हांके जा रहे बैलगाड़ी तंत्र से आजित हो कर सड़क में मोटर साईकल रैली कर के नारा लगा रहे हैं कि राजा आऊ देश बचाऊ । पर राजा पहले कब आए थे जो अब आ कर उनको बचाएँगें ? दूसरों पर इतना आश्रित और विश्वास की वह हम को आ कर बचाएँगें या उद्धार करेंगे । क्या हम अपंग है हमारे अपने हाथ पैर या दिमाग नहीं हैं जो हम अपनी रक्षा या हिफाजत नहीं कर सकते ? क्यों हमें अपनी सुरक्षा के लिए किसी मालिक या राजा की जरूरत पडती है ? क्यों हम हरेक तंत्र मे निरीह बन कर आस करने लगते हैं कि कभी तो अवस्था सुधरेगी हमारी ? पर हम यह भूल जाते हैं हमारी अवस्था या व्यवस्था न सुधरने के लिए हम स्वयं दोषी है और कोई नहीं ।

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हम मानसिक रूप से इतने अपंग हो चुके हैं कि हाथ पांव होते हुए भी लाचार हैं । हमने अपने दिमाग को इतना कुंठित कर लिया है कि हमें शासकों में भगवान की छवि नजर होती है । जो शासक सिर्फ भाषण और आश्वासन ही देता हैं उस से ही राशन की उम्मीद कर बैठते हैं । यह कैसी आस या मोह है जो भंग ही नहीं होती ? २४० वर्ष तक शासन कर के देश के नागरिको कों रैती से ज्यादा न समझने वाले राजतंत्र से ऐसा मोह क्यों ? क्या राजतंत्र में मुफ्त में खाना, दवा और शिक्षा मिलती थी ? किसी ने भी जनता को नहीं बख्शा है, सभी ने ऊख के रस की तरह देश के नागरिकों को निचोड़ा ही है तब क्यों किसी एक खास तंत्र पर इतना विश्वास और आस ? माना की गणतंत्र या लोकतंत्र जनता के अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है फिर भी लोकतंत्र या गणतंत्र का विकल्प लोकतंत्र या गणतंत्र ही हो सकता है और कोई नहीं । हमारे ही हाथों में है कि हम कैसी व्यवस्था चुन सकते हैं या चुन रहे हैं ।

जब चुनाव होता हैं तब हम कुछ पैसों और सुदंर आश्वासनों में भूल कर सड़े हुए टमाटर जैसे नेताओं को चुन कर संसद में भेजते हैं और उम्मीद करते हैं की वह हमारे लिए सुंदर भविष्य का निर्माण करें । जो खुद सड़ा हुआ है वह दूसरों को हरा–भरा कैसे बनाएगा ? हम क्यों नही अपना भविष्य खुद बनाएं । क्यो दूसरों से यह आशा करते हैं कि वह हमारे बच्चों के भविष्य को आकार देगा ? क्यो हम हमेशा मालिकों की खोज करते हैं ? क्यों हम खुद अपना मालिक नहीं बनते या बनने का प्रयत्न नहीं करते ? यदि कोई नेता नहीं हैं तो उसको बदले या व्यवस्था बदले खुद उस व्यवस्था की रखवाली करें और उनको सतर्क करें कि हम सब देख या जान रहे है आप हम से छल नहीं कर सकते । हमने आपको उस पद पर पहुंचाया है तो हम ही आप को उस गद्दी से उतार भी सकते है यह हम क्यों नहीं कहते ? पर नहीं हम मौन रहते हैं जहां विरोध करना चाहिए वहां बिल्कुल मिट्टी का माधो बन जाते हैं ।

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क्योंकि हमें घुट्टी में पिलाया गया है कि हमें विरोध नहीं करना है । वह हमारे बड़े हैं, हमारे भाग्य विधाता नेता है वह हमारे लिए नीति निर्माण करेगें । पर हम यह भूल जाते हैं कि वह हमारे भविष्य से पहले अपना वर्तमान देख कर नीतियों का निर्माण करते हैं । वह खुद को हमारे मालिक समझते हैं और हम से दासों जैसा व्यवहार करते हैं क्योंकि हम दिमाग से दास ही हैं । दास मनोवृति हमारी नस–नस में हैं । हमें दास बन कर चापलुसी करने में मजा आता है । क्योंकि इस में हमारा कुछ खर्च नहीं होता और फायदा ही फायदा होता है । दास बने रहने से मालिक भी खुश और अपना भी काम बनता है तो भाड़ मे जाए बाकी सब । इसीलिए हमको दासतंत्र से बहुत ही प्यार है । जय दासतंत्र की । (व्यंग्य)

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