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संरक्षित दोषें : अजयकुमार झा

 
अजयकुमार झा, जलेश्वर। लोकतंत्र या गणतंत्र स्थापित करने से पहले हमें नेपाली समाज के यथार्थ पक्ष को गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए था जो हमने नहीं किया। वास्तव में हम इसकी आवश्यकता को समझ ही नहीं पाएं। जन्मों से सत्ता के भूखे हम नेपालियों ने किसी भी सूरत में सत्तासीन होना अपनी परम सफलता मानते थें, जो हमारी मौलिक भूल थी। यह भूल 2007 साल से होता आ रहा है। हम इसमें सुधार क्यों नहीं करना चाहते हैं? इसके पीछे गूढ़ मनोवैज्ञानिक कारण है। 2007, 2017, 2036, 2046, 2063 में हुए क्रांतिकारी घटना जिसमे देशभक्तों ने सहादात दी, लेकिन षड़यंत्रकारी ने उनकी बलिदानी को व्यक्तिगत, जातीय तथा पारिवारिक स्वार्थ में समेटकर नष्ट कर डाला। कभी वि पी बाबू के अहंकार ने तो कभी गिरिजा बाबू के मूढ़ता ने, कभी देउवा के अयोग्यता ने तो कभी प्रचण्ड, ओली, खनाल, नेपाल के घटिया स्वार्थी प्रवृत्ति ने नेपाली सहिद और युवाओं के भावनाओं के साथ बलात्कार किया है।
इतना ही नहीं इन लोगों ने देश के स्वाभिमान और सम्मान के साथ भी बलात्कार किया है। व्यक्तिगत स्वार्थ, अज्ञानता तथा अहंकार के कारण देश के गति को अवरूद्ध करना देशद्रोह के समान दंडनीय अपराध है। लेकिन इस विषय पर विद्वानों में चर्चा तक नहीं होता। परंपरावादी दरबरिया संस्कार के अवशेष के कारण नेपाली विद्वान लोग व्यक्ति विशेष के गुण गाने में ही अपनी महानता समझते हैं। यही व्यक्तिवादी धारणा नेपाल देश और नेपाली सनातन संस्कृति के लिए घातक सिद्ध हो रहा है।
इस देश मे सायाद ही कोई अपने जीवन व्यवहार में सैद्धांतिक पक्ष को मजबूती से पकड़े हुए नजर नहीं आएंगे। हाल ही में आए चिनिया अधिकारियों ने भी अपने मौलिक वक्तव्य में कहा कि नेपाल के पार्टी और नेताओं के पास कोई सैद्धांतिक सोच नहीं है। ए सब के सब एजेंट है।नोकरी करते हैं, इन्हे न देश से मतलब है न संस्कृति से। इन्हे पद और पैसा से जो भी खरीद सकता है। जिसका पैसा खाते है उसका गीत गाना शुरू कर देते हैं। अभी हाल ही में “एम सी सी” के गीत गाने लगे हैं, कभी महाकाली के गीत भी गाए थे।
इस तरह के पराधीन मानसिकता वाली स्थिति में अपनी राष्ट्रीय अस्तित्व को बचाए रखना नेपाल के लिए सौभाग्य की बात है। जिस तरह भारत में गद्दारों का सदा से बोलबाला रहा है, अपने ही गद्दारों के हाथों लाखों भारतीय हिन्दुओं ने प्राण गवाएं; लाखों बेघर हुए; वहीं सैकड़ों वर्षों तक घोर अपमान के साथ गुलामी के कठोर यातनाएं भी सहनी पड़ी। स्वतंत्रता के बावजूद भी षड्यंत्रकारियों के चंगुल से नहीं बच पाएं फिर भी देश का अस्तित्व सुरक्षित है। भूगोल में थोड़ा बहुत परिवर्तन के बावजूद भी धर्म और संस्कृति अक्षुण्ण है। इसी प्रकार वैदेशिक आक्रमणकरियों से सीधा टक्कर लेनेवाले अपने पूर्वजों के बलिदान के कारण स्वाभिमान ऊंचा होते हुए भी व्यक्तिगत स्वार्थ और क्षणिक लालच में आकर हम अपने देश से गद्दारी कर विदेशियों के आगे नतमस्तक हो पूर्वजों के बलिदान को भी नस्तनाबुद कर रहे हैं। अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए बार बार विदेशियों को अपने देश के आंतरिक मामले में भी दखलंदज़ी करने के लिए आमंत्रित कर बैठते हैं। माइक्रो मैनेजमेंट के षड़यंत्र युक्त शब्दजाल में आम नागरिक को भ्रमित कर देश बेचने का ही काम होता है, जो एक प्रकार से राष्ट्रद्रोह माना जाएगा।
नेपाल के इन आंतरिक समस्याओं के पीछे कुछ बुनियादी कारणे है जिनपर गंभरतापूर्वक विचार करना हमारा धर्म बनता है।
धार्मिक, सांस्कतिक, जातीय तथा सामाजिक विविधताओं से सुसज्जित नेपाल विश्व में एक मात्र हिन्दू देश था, जिसे हमारे बिकाऊ नेताओ ने बिना जनता के मांग के ही पैसों के लालच में विदेशियों के इसारे पर धर्मनिरेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। यहीं से खुल्लखुल्ला विकाऊ राजनीति जोड़ पकड़े हुए है। दिन दहाड़े हो रहे हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचारी के विरुद्ध ए लोग कभी सड़क पर नहीं उतरते हैं, लेकिन कुर्सी पाने के लिए लोकतंत्र के दुहाई देने लगते हैं। इन्हे हर हाल में पद म बने रहना है,देश और जनता जाए भांड़ में।
इन सारी बातों के बावजूद आम नागरिक को यह पता नहीं है कि हमें किसके हाथों में देश के वागडोर को सौपना चाहिए। उन्हे तो देश क्या है, इसकी महत्ता क्या है? यह भी पता नहीं है। अधिकांश लोगों की दिनचर्या रोटी के व्यवस्था में ही समाप्त हो जाता है जबकि बांकी के लोग इन नेताओं और पार्टियों के नोकरी करते हैं, अतः उन्हें ग़लत दिखाई देने पर भी स्वाभिमान बेच देने के कारण जुबान पर ताला लगाए रहते हैं। इस हालत में देश के समुचित संरक्षण और संवर्धन कैसे संभव है! जैसे रात के अंधेरे को करोड़ों तारा होने के बावजूद भी नष्ट नहीं कर सकता वैसे ही धन,पद लोलुप मोहांध तथाकथित विद्वानों से देश की सदगती नहीं हो सकती; परन्तु, जैसे एक ही चांद उस घनघोर अंधकार को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है, वैसे ही आज भारत जैसे विशाल देश के अंधकार को नष्ट करने के लिए एक मोदी काफी है। लेकिन हमारा क्या होगा! यहां तो पूरी तंत्र ही खोखली हो चुकी है।खोखला दंभ, खोखली राष्ट्रवाद, और सड़क छाप नैतिकता को आदर्श मानकर स्वयम सम्मानित बौद्धिक वर्ग से अब क्या आशा कि जा सकती है!
किसी भी विचारधारा और उस विचारधारा पर चलनेवाली पार्टी सर्वगुणसंपन्न नहीं हो सकती, वह किसी काल विशेष के लिए अत्यधिक उपयोगी हो सकता है, सदा के लिए नहीं।अतः उस में समयानुकुल परीमार्जन भी आवश्यक होता है। इधर नेपाल में हर नेता और पार्टी का अपना अपना संशोधित सिद्धान्त है जिसके आधार पर वो देश को विकसित करने का भ्रम फैलाते हैं। लेकिन देखा यह गया है कि उनके सारे विचारधारा डालर के आगे घुटने टेक देते हैं। तो मित्रों! जहां के विद्वानों का यह हाल है, वहां के आम नागरिकों के मानसिक अवस्था कैसा होगा? यह अविस्मरणीय प्रश्न है। नेपाल में आज भी लाखोंके संख्या में अशिक्षित जनता उपस्थित है।
* अशिक्षित व्यक्ति के दृष्टिकोण संकीर्ण होने के कारण वह रूढ़ियों, परम्पराओं तथा अन्धविश्वासों से ग्रसित रहता है जो समाज सुधार के लिए आत्मघाती अवरोधक हो जाता है।
* धूर्त, चालाक और षड़यंत्रकारी राजनीतिज्ञों के जाल में फंसकर यह वर्ग अपने मत का दुरुपयोग करता है जो देश को वर्वादी की ओर ले जाता है। बेईमान राजनीतिज्ञ व नेता उनकी भावनाओं को जातीय, धार्मिक या भौगोलिक कारण को अतिरंजित भाषा में उत्तेजित कर पिछले चुनाव की तरह अपने पक्ष में कर लेते हैं।
* अशिक्षित व्यक्ति, जाति, धर्म, सम्प्रदाय तथा क्षेत्रीयता को ही विशेष महत्व देता है; जिससे सही जनमत का निर्माण नहीं हो पाता है, और न निर्णायक मतदान ही हो पाता है। निराशाओं और कुण्ठाओं से ग्रस्त व्यक्ति लोकतन्त्र के प्रति उदासीन हो जाता है, सत्ता परिवर्तन या शासन के अच्छे बुरे कार्य के प्रति इनमें स्वाभाविक उदासीनता रहने से अच्छे लोग कमजोर हो जाते हैं,जिसका दुष्परिणाम देशको भुगतना पड़ता है। अशिक्षित जनता अनेक प्रकार की आर्थिक या सामाजिक बुराइयों में फँसा होता है जिससे लोकतन्त्र की संरक्षण नहीं हो पाती। साथ ही ऐसे लोगो को बड़ी आसानी से आत्मघाती निर्णय लेने के लिए तैयार किया जा सकता है, इसे हम वर्तमान के राजनीति में प्रत्यक्ष देख सकते हैं। मधेस आंदोलन में कांग्रेस एमाले के मधेसी कार्यकर्ता और नेता अपनी ही अधिकार के विरुद्ध पार्टी नेतृत्व को खुश रखने के लिए असहयोग और अवरोध करने पर उतर गए। वैसे ही अपनी ही धर्म के विरुद्ध हिन्दुओं से धर्म निरपेक्ष के नामपर 85% जनता के विरुद्ध समर्थन में ताली बजाने के लिए मजबूर किया गया। ऐसे हजारों निर्णय है जो हम बिना सोचे समझे अपनी आकाओं को खुश रखने के लिए लेते रहते हैं। भविष्य में चाहे अपनी ही संतानों से गालियां क्यों न खाना पड़े! आखिरकार समय समयपर समस्या हमारे सर पर ही आ बजरता है, जिसे हम अपनी ग़लती को दबाने के लिए राजा के ऊपर मढ़ देते हैं। और फिर एक चक्र शुरू होता है; राजा – कांग्रेस, राजा – कम्युनिस्ट, राजा – खसबादी, राजा – राणा। ए सबकेसब एक ही सिक्के के अनेक पहलुएं है। इसमें मधेसी, थारू, जनजाति, दलित, नेवार, लामा, राई, गुरुंग, मगर, शेर्पा जैसों को बलि के रूप में प्रयोग किया जाता है। वैसे मधेसी जनजाति लोग जितने सुरक्षित अपने को पंचायती व्यवस्था में महसूस करते थें आज उसके तुलना में एक अंश भी सुरक्षित नहीं है। प्रमाण के रूप में मधेस आंदोलन में सहिदो के संख्या को देख सकते हैं।
उपर्युक्त सभी समस्याओं के बावजूद हम आम सहमति के आधार पर खुले हृदय सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के हेतु से एक राष्ट्रीय सोच पैदा कर सकते हैं। विश्वास को बनाए रखने के लिए राष्ट्र के प्रमुख कार्यकारी पद का जनता के द्वारा सीधा चुनावी प्रक्रिया हेतु संविधान में संशोधन किया जाय और बेहिचक पूर्ण कार्यकाल के लिए संसदीय व्यवस्था का स्वरूप प्रदान किया जाय।……..

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