एकाग्रता ः जीवन में सफलता का द्वार -राजकुमार जैन ‘राजन’
इंसान के व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है उसकी अपनी सोच । आंतरिक विचार एवम चिंतन शक्ति इसी से प्रभावित होते हैं । सोच यदि सुगठित एवम सुव्यवस्थित हो तो दुनिया को बदलकर रख देती है । इसी से संकल्प शक्ति सुदृढ बनकर ऐसी उड़ान भरती है कि जहाँ चाहो वहाँ पहुंचा जा सकता है । जब लक्ष्य सुंदर हो और उसे प्राप्त करने के प्रति एकाग्रता हो तो सफलता आसानी से प्राप्त होती है ।
जीवन के द्वार से होकर हर किसी को गुजरना होता है । कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो एकाग्रता के साथ लक्ष्य तक पहुंचने के टेढ़े–मेढे रास्तों से गुजरते हुए जीवन अनुभव से नवनीत पा लेते हैं । हर व्यक्ति सुखमय जीवन जीना चाहता है । सभी चाहते हैं कि हमारा वर्तमान और भविष्य सुखमय रहे । हम सुख से जीना तो चाहते हैं और भविष्य को भी सुखी बनाना चाहते हैं, लेकिन शुभ भविष्य का निर्माण कैसे हो ? हमारे में से अधिकांश लोगों को पता नहीं है । मंजिÞल तो तय करना है, पर मंजिÞल तक पहुंचने का मार्ग कौन सा है, वह हमें पता नहीं ?
हम यंत्रवत जी रहे हैं । जो सिखाया जाता है, वही सब कर रहे हैं, वही सब सोच रहे हैं । औरों का ज्ञान हमारा ज्ञान है, औरों के लक्ष्य हमारे लक्ष्य हैं । सब कुछ देखा–देखी चल रही है । फिर कैसे होगा हमारा जीवन विकास, कैसे मिलेगी सफलता ? महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकाग्र होकर चले बिना सफलता संभव नहीं हो सकती । लक्ष्य उस सिद्धांत का नाम है जो हमारे कर्म की प्रेरणा और पवित्रता का निमित्त बन सके । जीवन में सफलता हासिल करने के लिए, अपनी श्रेष्ठता और उपयोगिता सिद्ध करने के लिए लक्ष्य सिद्धि बिना प्रयास के हस्तगत नहीं हो सकती । लक्ष्य भी है, प्रयास भी है पर उसे प्राप्त करने के लिए सजगता, एकाग्रता नहीं है तो भी सफलता संभव नहीं है । सार्थक लक्ष्य प्राप्ति के बीच खड़े कठिनाइयों के पहाड़ को वही मानव हटा सकता है, जिसमें एकाग्रता की शक्ति हो । जीवन मे सफलता का द्वार है एकाग्रता ।
जीवन के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में एकाग्रता ने अपना प्रभुत्व बनाये रखा है । खिलाड़ी चाहे कितना ही सशक्त एवम मेहनती हो, उसमें एकाग्रता का अभाव है तो ‘गेंद’ का लक्ष्य भटक जाएगा । व्यपारी ,राजनेता, डॉक्टर, वैज्ञानिक, गायक, वादक, चित्रकार, छात्र सभी अपने–अपने कर्म में एकाकार हो जाएं तभी सफलता एवम प्रशंसा प्राप्त होती है । यहां तक कि लेखक, कवि, पत्रकार भी यदि अपनी एकाग्र बुद्धि से विषय चिंतन कर सृजन करता है तो निश्चित रूप से कालजयी, प्रशंसनीय रचना समाज को मिलती है । एकाग्रता रहित चित्त सफलता प्राप्ति में बाधक होता है । एकाग्रता के बिना मंजिल को हासिल करना असंभव है । कार्य को अंजाम तक पहंचाने के लिए उस पर ही पूरा ध्यान देना जरूरी है । यही ध्यान जब एकाग्रता का रूप ले लेता है, तो यकीनन आपका लक्ष्य आपके सामने होता है ।
कई बार व्यक्ति जीवन के किसी भी क्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पाता क्योंकि वह लक्ष्य और अवसर को गंभीरता से नहीं लेता । जैसे ही लक्ष्य पर से एकाग्रता हटती है, असफलता ही प्राप्त होती है । एकाग्रता के अभाव में जीवन बिना पतवार की नाव जैसा होता है । महाभारत के अर्जुन का उदाहरण सदैव एकाग्रता हेतु दिया जाता है । अर्जुन की नजÞर मात्र चिडि़या की आँख पर ही लगी थी, तभी वह संधान कर पाया ।
प्रश्न होता है कि एकाग्रता कैसे आये ? मन चंचल है, वह एक दिशा में चलना नहीं चाहता । एकाग्रता केवल कल्पना से नहीं आती, इसे खरीद भी नहीं सकते । किसी अन्य से प्रेरणा द्वारा केवल इच्छा जागृत होती है, तब हमें स्वय ही एकाग्र वृति का विकास करना पड़ता है । इसके लिए दृढ़ निश्चय की आवश्यक है । एकाग्रता से जीवन में नई शक्ति का संचार होता है । सर्वप्रथम हमें एक उद्देश्य सामने रखना होगा, फिर उसकी प्राप्ति हेतु रास्ता नियत करना होगा । तब उसके अनुरूप अपने प्रयास रूपी कदमों को साहस, दृढ़ता एवम एकाग्रता से बढ़ाना चाहिए । हम अपनी क्षमता, योग्यता एवम शक्ति को बिखरने न दें । यदि हमने इन्हें विभिन्न दिशाओं में बांट दिया तो हम निर्बल एवम उत्साहहीन हो जाएंगे और एक दिशा में भी सफलता हस्तगत नहीं हो पाएगी । जीवन मे कुछ लोग हमें हमारे कार्यों एवम सफलता के मार्ग से भटकाने के कई तरह के प्रयास भी कर सकते हैं, जिससे हमारी एकाग्रता भंग हो जाए । इसलिए सतर्कता पूर्वक अपने लक्ष्य की सुई को एकाग्र ध्रुवतारे की ओर से कभी न हटने दें । विपत्तियों का, रुकावटों का दृढ़ता व साहस से सामना करते हुए हम लक्ष्य को पाने के लिए अपनी एकाग्रता भंग नहीं होने देवें । यही सब कुछ मानवीय एकाग्रता के मानदंड हैं जिनपर चलकर हम किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ।
मनुष्य एक छोटे से शरीरवाला प्राणी है । इसके बावजूद वह हाथी, घोड़ा, ऊंट, सिंह जैसे विशालकाय एवम दुर्दांत प्राणियों को वश में कर लेता है । इसका रहस्य क्या है ? उसमें अजब–गजब की बुद्धि है, साहस है और एकाग्रता से लक्ष्य प्राप्त कर लेने की इच्छा शक्ति है । उसके सहारे वह बड़े से बड़ा कार्य कर सकता है । दुष्कर से दुष्कर अभियान को सफल बना सकता है । यहां तक कि असंभव दिखने वाले कार्य को भी संभव बना सकता है । इस विलक्षण शक्ति का दुरुपयोग भी हो सकता है । आज हम देखते हैं कि अनैतिक एवम स्वार्थमय कार्यों में मनुष्य अपनी इस शक्ति का दुरुपयोग भी कर रहा है । उस पर रोक लगाना आवश्यक है ।
हमारी शक्ति का उपयोग सृजनात्मक कार्यों में हो न कि विध्वंशक कार्यों में । इसके लिए भी हमे एकाग्रचित नजÞर रखनी होगी ।

