राजनीति और भ्रष्टाचार का चोली दामन का साथ : बाबुराम पौडेल
हिमालिनी 2021 फरवरी अंक । भ्रष्टाचार का कसता शिकन्जा सामाजिक, नैतिक मूल्यों पर लगातार प्रहार कर रहा है । उत्तरदायित्व, सेवा जैसे मुल्यों कोे घुटने टेकते देखा गया है । लोकतन्त्र की अवधारणा पर सेंध लगाने का काम भी भ्रष्टाचार के कारण हो रहा है । लोकतन्त्र से आम लोगों को अलग–थलग कर दिया जा रहा हैै । इसलिए लोकतन्त्र पर खतरे के काले बादल मंड़रा रहे हैैं । भ्रष्टाचार नियम कानूनाें और नैतिकता को मूल्यों का अवमानना करते हुये की जानेवाली गतिविधियाँ है । यह जरूरी नहीं कि आर्थिक अपचलन ही हो, बल्कि दुराचरण ही उसका श्रोत है । अनैतिक आचरण के बल पर ही भ्रष्टाचार खड़ा हो सकता है । हमारे रोजमर्रा में घटित हो रहे जबरन वसुली, नातावाद, अपहरण, विधि से अपरिचित धन को ईकट्ठा करना भ्रष्टाचार है ।
संसदीय लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली को समकालीन दुनिया में सब से अधिक देशों ने स्वीकार किया है । शीतयुद्ध के अन्त के पश्चात् अधिकतर साम्यवादी देशों की हुकूमतोंं का भी अवसान हुआ । सदियों से दुनिया में चली आ रही राजनीतिक रूप से अनुदार राजाशाही के पतन की शुरुआत इससे पहले ही हो चुकी थी । सोवियतसंघ के पतन के बाद कई देशोें की साम्यवादी सियासी ताकतों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा । इस बड़ी घटना ने साम्यवाद के अनुदार सत्ता संचालन के उपर सवाल खड़ा किया । इस असर से बचने के लिए चीन जैसे देश ने राजनीतिक रूप से न सही आर्थिक स्वरूप पर बहुत बड़ा बदलाव किया । जो साम्यवादी विरासत से हटकर था । अन्य कई देशों की साम्यवादी पार्टियाँ भी संसदीय लोकतन्त्र को स्वीकार करने को विवश हो गईं । बदलते माहौल के कारण भी संसदीय लोकतन्त्र को दुनिया में और अधिक बढ़त मिली । आम जनता के अभिमत के लिए अवधि चुनाव, बहुमत प्राप्त ताकत की सत्ता, अल्पमत का विपक्ष, कार्यपालिका न्यायपालिका और व्यवस्थापिका के बीच शक्ति का सन्तुलन संसदीय लोकतन्त्र की सैद्धान्तिक बुनियाद हैं । जिस में आम लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी, मानवअधिकार और समता का अधिकार जैसे जीवनोपयोगी प्रावधानोें को महत्त्व दिया जाता है । सुन्दर सिद्धान्त के बावजूद भी लोकतन्त्र को जनता तक पहुँचने में भ्रष्टाचार अवरोध खड़ा कर रहा है ।
सिद्धान्त और व्यवहारिकता में जब तालमेल कमजोर पड़ जाता है तब विकृतियों का जन्म होता है । लोकप्रिय होने के बावजूद भी लोकतन्त्र के अभ्यास में गम्भीर खामियाँ दिखाई देने लगी है । उनमें भ्रष्टाचार पहले नम्बर पर है । संसदीय लोकतन्त्र को अमल में ला रहे कई देशों में भ्रष्टाचार की बढ़त तेजी से हो रही है ।
खासकर कमजोर अर्थतन्त्र वाले संसदीय लोकतन्त्र का अभ्यास कर रहे देशों में भ्रष्टाचार की बड़ी समस्या है । पारदर्शिता को महत्व देते हुये भी इस रोग से निजात पाने की सम्भावना की बात छोडि़ए उसपर अबतक कारगर तरीके से कोई मुहीम व बहस नहीं चलाई जा रही है । भ्रष्टाचार के प्रति आम लोगों में गुस्सा जरूर है । इसको देखते हुए चुनावी फायदे के लिए कुछ भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कुछ कार्यवाहियाँ होती भी हैं परन्तु भ्रष्टाचार मिटाने के मकसद से कहीं ज्यादा लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए । भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश लोगों के जेहन में इस कदर बैठा है कि चुनावों में हर किसी राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में मत पाने के लिए भी किसी–न–किसी रूप में इसके खिलाफ बोलना ही पड़ता है । इसके अलावा कोई कारगर बहस छेड़ने की तदारुकता दिखाई नहींं पड़ती । राजनीतिक ताकत अक्सर भ्रष्टाचार की सन्जाल का परवरिश करते भी नजर आते हैं । संसदीय लोकतन्त्र में यह एक बड़ी खामी है ।
संसदीय राजनीति में भ्रष्टाचार के इन सभी अवयवों का भरपूर उपयोग किया जाता रहा है । अक्सर बड़ी या छोटी राजनीतिक दलों को चुनावी दल संचालन के लिए धन राशि की जरूरत होती है । भारी भरकम खर्च जुटा पाना सामान्य लोगों के लिए नामुमकिन है । इसलिए उन्हें उद्योगपतियों कारपोरेटों और काला धन्दा करनेवालों का विश्वास लेना ही पड़ता है । राजनीतिक दलों में आय और व्यय की कोई पारदर्शिता नहीं होती । राजनीतिक दलों के भारी खरचे, नेताओं की शानदार जिन्दगी ही उनकी अपारदर्शिता बयान करती है । देश मे इसकी खबर लेने के लिए संवैधानिक दफ्तरों को खोला गया है, परन्तु राजनीति ने सभी को लाचार परछाईं बना दिया है । ऐसे निकायों में सत्ता के लोग अपनी तरफदारी करनेवाले अधिकारियों को नियुक्त करते हैं और भ्रष्टाचार से उनकी मिलीभगत को परदाफास होने से रोकने हरसम्भव प्रयास करते हैं । ऐसे गलत कार्याे से लोकतन्त्र दिन ब दिन बदनाम हो रहा है । गलत नीयत और गलत रास्ते से राजनीति में आनेवाला धन राजनीति को ही आम लोगों दूर ले जा रहा है ।
संंसदीय लोकतन्त्र में चुनाव को केन्द्र माना गया है । चुनाव ही भ्रष्टाचार से विकृत हो चला है । चुनावी खरचे इतने बढ़ गये हैं कि किसी आम आदमी को चुनाव में उम्मीदवार बनना नामुमकिन हो गया है । चुनाव जीतना किसी सदाचारी और मेघावी अच्छे इन्सान के वश से बाहर की बात है । ऐसे इन्सान को कोई पूँजीपति धन देकर क्यों अपने ही स्वार्थ पर कुल्हाड़ी मरवाएगा । अब सोचिए लोकतन्त्र का केन्द्र ही प्रदुषित हो जाये तो उसका आकर्षण कैसे रह पायेगा ? अगर चुनावी खरचों पर कड़ाई के साथ अंकुश लगाया जाये तो बहुत कुछ साफ होने की उम्मीद की जा शक्ति है । इससे राजनीति में धन के कारण हासिए से बाहर खड़े अच्छे लोगों को अन्दर आने के लिए लौह फाटक खुल सकता है । जब ऐसे लोगों की संख्या राजनीति में बढ़ने लगे तो अपराधी, पैसों के पीछे दौड़ने वालों कोे राजनीति से विस्थापित किया जा सकता है, फिर कुछ हो सकता है ।
भ्रष्टाचार अवैध पूँजी की मात्रा को बढ़ाने का जरिया बन जाता है और इसका निवेश अपराध तथा अक्सर अनुत्पादक गतिविधियोंं में होता देखा गया है। राजनीति से लेकर देश के हर एक अंगों मेंं इसकी पैठ महसूस किया जा सकता है । देश की आर्थिक विकास और स्वच्छ प्रशासन पर भी भ्रष्टाचार का बुरा असर पड़ रहा है ।

