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नारी स्वाभिमान की गाथा है ‘मैं विद्योत्तमा’

 

रुड़की:

साहित्यकार श्री गोपाल नारसन की पुस्तक ‘मैं विद्योत्तमा’ नारी स्वाभिमान की प्रतीक महाकवि कालिदास की पत्नी विद्योत्तमा और उनकी परम्परा की नारी शक्तियो को लेकर लिखी गई एक ऐसी साहित्यिक कृति है।जिसमे नारी का संघर्ष है तो अन्याय के विरुद्ध प्रतिवाद करने की शक्ति का चित्रण भी। विदुषी विद्योत्तमा की गौरव गाथा के रूप में लिखी गई इस पुस्तक की सबसे विशेषता यह है कि यह पुस्तक एक पुरुष लेखक ने स्त्री संवाद में लिखी है।साहित्यकार श्रीगोपाल नारसन ने इस कृति को अपनी दिवंगत मां प्रकाश वती जो कि आजादी के आंदोलन के अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स की सगी बहन थी, को समर्पित किया है।पुस्तक की भूमिका ज्योतिष विज्ञान के चर्चित लेखक गोपाल राजू ने लिखी है।
इस पुस्तक में विद्योत्तमा को उनके समय की पुरुष प्रधानता से जूझते हुए रेखांकित किया गया है।विद्योत्तमा जहाँ अपने सवांद में अपनी संघर्ष गाथा सुनाती है।वहीँ एक षड्यंत्र के तहत मुर्ख पति को अपनाने की चुनौती और फिर एक संकल्प साधना के तहत अपने पति कालिदास को मूर्ख से विद्वान् महाकवि कालिदास बनाने की रोचक गाथा का वर्णन किया गया है।इस पुस्तक में नारी संघर्ष पर काम कर चुकी विभूतियो को भी स्थान दिया गया है।विद्योत्तमा को नेपथ्य से बाहर लाने के कारक बने उज्जैन के मौनी बाबा ,वैदुष्यमणि विद्योत्तमा के विद्वान लेखक डा योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ से लेकर ब्रह्माकुमारी दादी जानकी,अमृता प्रीतम,सितारा देवी,चित्रा मुद्गगल,सुधा चन्द्रन,रेखा मोदी,रीता शर्मा ,मलाला यूसुफजई व् वीना शास्त्री ,डा सुधा पांडे ,डा मधुराका सक्सेना,सरिता अग्रवाल,फूलवती व् अनीता समेत कई अन्य नारी शक्तियो को उनकी संघर्ष गाथा के साथ उद्धरत किया गया है।लेखक ने जिस मां प्रकाशवती को यह कृति समर्पित की है ,उनके आजादी से पूर्व व आजादी के बाद के संघर्ष को उकेरा गया गया।जिससे यह कृति नारियो के स्वाभिमान, संघर्ष और समर्पण की प्रतीक बन गई है।

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