हे दायानिधि ! कहां गया तेरा वो उच्च विचार, कहाँ है तेरा वो सुदर्शन ? : अंशु झा
हे ईश्वर ! तुझसे है शिकायत : अंशु झा
ईश्वर से शिकायत
हे ईश्वर !
तुझसे है शिकायत,
तु ही दुषित हो गया
या तेरी यह मागा की नगरी ?
या तेरे द्वारा सृजित मानव ?
हां !
तुझे तो बडा आनन्द आता न
अपने बनाए खिलौनों को तोडने में ?
बनाया–बिगाडा,
बनाया–बिगाडा
तेरा काम ही तो यही है न,
सदियों से तो यही करता आ रहा तु !
सब कहते,
कि मानव अपने बुने हुए
जाल में ही फंस रहे,
पर लीला तो तेरी ही है न ।
हे प्रभो !
तुझसे है यही शिकायत,
नर पिशाच को पैदा किया ही क्यो ?
उसमें कुबुद्धि भरा ही क्यों ?
रहने देते उसे आदिमानव ही,
जडमति ही, पशु ही ।
सब कहते,
कि एक पत्ता भी,
तेरे इशारे पह ही हिलता है,
तो तेरी माया की नगरी में,
जो मृत्यु का ताण्डव चल रहा,
इसके पिछे भी तु ही है न,
हे विधाता !
तु है कहां ?
अगर है तो बचा,
उस अबोध बच्चे के पिता को,
जिसका संरक्षण करने वाला
स्वच्छ हवा के लिए प्राण त्याग रहा,
उस अभागी मां को बचा,
जिसने अपनी नन्हीं जान को
धरती पर लाने से पहले ही
आंख मूंद रही ।
हे दायानिधि !
कहां गया तेरा वो उच्च विचार,
जिसे मानव मन्त्र बना,
रटा करते हैं,
कहां है तेरा वो सुदर्शन ?
जिसने कितने दुष्टों का संहार किया है ।
अब उठा अपना त्रिशुल,
और कर दे कोरोना रुपी
असुर का नष्ट
कर मानव का रक्षण,
बचा ले अपनी माया की नगरी
ताकि युगों–युगों तक
तेरी पूजा होती रहे ।



