प्रेम पर पत्र :पत्र एक दस्तावेज़ ही तो है संवेदनाओं का,सम्भावनाओं का और सुखद कल्पनाओं का
प्रेम पर पत्र
प्रेमपत्र नहीं है यह। इसे प्रेम चर्चा कहा जा सकता है ।प्रत्यक्ष मिलकर चर्चा करना बेहतर होता किन्तु एक वर्ष तो कोरोना ही लील गया। पाँवों में बेड़ियाँ और मुख पर पट्टी। गति बन्द, मति मंद और जुबान बंदी। पर इस घुटन का क्या करूँ जो घटे तो कुछ सूझे। ऐसे में इस जलन का क्या करूँ जो उन यादों ने कम ही नहीं होने दी जो जौक सी चिपकी है मेरे तन पर भी और मन पर भी। ऐसे में पत्र लिखकर कुछ राहत पाने के अलावा और कुछ सूझा ही नहीं। सोचोगे तो अवश्य की पट और वह भी बरसों बाद । पर क्या करूँ । कुछ तो मन की सनक और कुछ झिझक भी। पर आज हिम्मत जुटा ही ली।
सुनो , पत्र भी एक दस्तावेज़ ही तो होता है संवेदनाओं का, सम्भावनाओं का और सुखद कल्पनाओं का। कई बार तो पत्र माध्यम बन जाता है और कारण भी कहानियों का, कविताओं का। आप ध्यान से पढ़ना इसे और फिर जो महसूस करो उसे भेजना मेरे पास हवाओं के पंखों पर लिखकर। हवाएँ जब छुएँगी ना मुझे , सब जान जाऊँगी। समझ लूँगी क्योंकि यह कला है मेरे पास। आखिर आपकी बावरी कनुप्रिया हूँ ना मैं। हूँ कि नहीं।
सर्दियों में कई बार इच्छा होती है कि छत पर जावें और मुँडेर पर बैठी धूप से बतियाये। हम जाते है तो हर बार वही धूप कुछ अलग दिखती है और सुखद अहसास कराती है । बस पत्र लिखना भी कुछ वैसा ही सुकून देता है मेरे कनु।
और सुनो;एक राज की बात बताती हूँ । यह जो प्रेम है ना। यह एक ताबीज़ ही तो है । हम अपने प्रेम को ताबीज़ की तरह बांधले गले में या बॉह में ताकि ये दिखे भी नहीं और अपना काम चुपचाप करता भी रहे।गले की नशों से ही तो है प्रेम के मंतर का राब्ता।वही सिकती रहती है सांस। यह मंतर हमारी साँसों के दर्द को सेकता सहलाता रहता है ।यह एक सुमिरनी है जो प्रेमी का सुमिरन करते हुए प्रेमी को परमात्मा तक पहुँचा देती है। प्रेमशास्त्र में प्रेमी को इसीलिए ईश्वर का रूप माना गया है। क्या आपको भी ऐसा ही लगता है, लिखना आप भी ख़त में।
मुझे अक्सर लगता है कि प्रेम खिड़की के रास्ते भीतर आने वाली धूप नहीं बल्कि धूल है। धूप का टिकाव होता ही कितना सा है भला! और प्रेम में तो यादें धूल की तरह चिपक जाती है मन पर और तन पर और अन्तर्मन तक ।
तन और मादक छुअनो की धूल और मन पर उनके अहसासों की धूल । मुझे तो ऐसा ही लगता है । तुम कैसा अनुभव करते हो कल्पनालोक के वीर ?
तुम्हारी हीर तो ढ़की पड़ी है इसी धूल से और हाँ , हम उस धूल को जितना भी झाड़े- पोंछे वह और ज्यादा चिपक जाती है मन की दीवारों पर। उसे धोता है प्रेम का बादल अपनी फुहारों से।
फिर बावरी कहकर डांटेंगे मुझे । मैं तो हूँ ही बावरी । कुछ भाग्यों की चाल के कारण और कुछ आपके निश्छल प्यार के कारण। यह जो प्रेम का बादल है ना, यह तन के साथ अन्तर्मन तक को सिक्त कर देता है ।प्रेम दिखाने की वस्तु नहीं है मेरे कान्हा !यह तो साँसों की भी साँस है। हमें भीतर के जप में रमाये रहने वाली रटन है यह। हम प्रेम के अहसास में बेसुध होकर दुनिया में जाग्रत अवस्था में दिनचर्या के सभी कार्य करते रहते है और वह भी पूरे होश और जोश के साथ। प्रेम के बिना तो जीवन ही निर्जीव है मेरे माधव।
वन में भी जी डालने का हुनर प्रेम के पास ही है।
मैं नहीं जानती मेरे कनु कि तुम मुझे किस रूप में देखते हो परन्तु तुम मेरे लिए पूजा के आले में महकती अगरबत्ती हो जो हरदम मेरे तन -मन को सुगन्ध से भरती रहती है। मेरी तो आत्मा तक तृप्त रहती है उस सुगन्ध से। आज कुछ खुलकर कह रही हूँ । मैं तो प्रेम के अभाव में अपनी खाली झोली लिए रेत के धोरों में भटकती एक जोगन ही रही हूँ आज तक । प्रेम मिले तो जीवन मिले । जीवन से कहाँ भिन्न है प्रेम? कहो तो । इसलिए मेरे जलधर !इस चातकी को प्यासा मत लौटा देना। जिस तरह मछलियां पानीसे प्रेम करती है खिलखिलाती हुई लहरों से किल्लोल करती है। पानी बिन मछली का कोई अस्तित्व नहीं उसी तरह तुम्हारे प्रेम बिन मेरा भी कोई अस्तित्व नहीं बस इतना ही जान लो।


