अंतर्मन के अंतर्द्वंद से कब विजय पाऊँगी ? : दीक्षा मिश्रा
मैं
मन की कुछ बातों को मन में रख कर ,
अंदर के उथल- पुथल के साथ ,
जीवन जीती चली जा रही,
अपने और अपनों के साथ ।
अपने उलझन को सुलझाती,
पर पूर्ण विराम नहीं पाती ,
कुछ हाथ नहीं आ पाता है ,
ये वक्त गुजरता जाता है ।
कई प्रश्नों से घिरे हुए ,
चंचल मन को समझती ,
एक राह ढूंढती और समय के साथ चलती जाती ,
एक आस लिए जीवन को अनुभव करती जाती।
कभी – कभी अपने में कुछ कमियाँ भी पाती हूँ मैं ,
पर चाटुकार, चापलूस और चालाक नहीं हूँ मैं ,
हाँ खुद से मुझको ये सवाल भी करना है कि ,
अंतर्मन के अंतर्द्वंद से कब विजय पाऊँगी ?

काठमांडू


