चुनौतियों से भरा प्रदेश–२ का ‘मधेश स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान’: ई. सत्य नारायण शाह

प्रदेश २ के लोगों के लिए बहुत उम्मीद दिखाते हुए, ‘मधेश स्वास्थ्य विज्ञान अकादमी’ का गठन प्रदेश सरकार द्वारा एक ऐन के तहत किया गया है । स्वास्थ्य आम जनता के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसे नेपाल के संविधान में भी महत्व दिया गया है और यह नागरिक के मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के अनुच्छेद ३५ में शामिल है । एक नजर में, वास्तव में, प्रदेश सरकार द्वारा यह बहुत ही सराहनीय कार्य किया गया है । नेपाल के संविधान की अनुसूची–६, क्र.सं. ८ के अनुसार, प्रदेश २ की सरकार ने ‘मधेश स्वास्थ्य विज्ञान अकादमी’ की स्थापना के लिए एक ऐन लाया है । इसकी प्रस्तावना के अनुसार, उच्च स्तरीय अध्ययन, अनुसंधान और प्रदेश में स्वास्थ्य विज्ञान के संबंध में आवश्यक जनशक्ति की तैयारी और आम जनता को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की बात कही गई है । इस ऐन के अनुसार, स्थापना के कार्य, कर्तव्य और अधिकार इस प्रकार हैं ।
(क) आधुनिक चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्नातक स्तर, स्नातकोत्तर डिग्री और डॉक्टरेट सहित स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों में अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान का संचालन करना ।
(ख) प्रतिष्ठान द्वारा संचालित कार्य के मानक को बढ़ाने के लिए घरेलू या विदेशी विश्वविद्यालयों, अस्पतालों या शैक्षणिक संस्थानों के साथ समन्वय करना ।
(ग) घरेलू और विदेशी स्वास्थ्य संबंधी विश्वविद्यालयों और संस्थानों और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ संबंधों की स्थापना, विस्तार और मजबूत करके आपसी सहायता का आदान–प्रदान करना ।
(घ) स्वास्थ्य क्षेत्र में योग्य जनशक्ति तैयार करने के लिए स्वास्थ्य से संबंधित शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की व्यवस्था करना ।
(ङ) प्रतिष्ठान के उद्देश्यों को पूरा करने और स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न प्रकाशनों को प्रकाशित करने के लिए स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर सेमिनार, सम्मेलन आदि का आयोजन करना ।
(च) अपने उद्देश्य के अनुसार स्वास्थ्य संबंधी कार्यों के लिए घरेलू और विदेशी व्यक्तियों और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निकायों से तकनीकी और भौतिक सहायता प्राप्त करके परिचालन करना ।
(छ) स्वास्थ्य सेवाओं की उपयोगिता और उपादेयता के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना ।
(ज) स्वास्थ्य नीति और स्वास्थ्य क्षेत्र के विकास पर संबंधित निकायों को राय, सुझाव और परामर्श देना ।
(झ) वर्तमान जनकपुर प्रांतीय अस्पताल इस अकादमी के तहत एक शिक्षण अस्पताल में बदल जाएगा ।
(ञ) अकादमी द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना, परीक्षा आयोजित करना और प्रमाण पत्र और डिग्री प्रदान करना ।
(ट) शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक तैयार करना ।
(ठ) प्रदेश के अन्य अस्पतालों में अध्ययन, शिक्षण, अनुसंधान और अन्य अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना ।
(ड) छात्रवृत्ति, पदक और पुरस्कार प्रदान करना ।
(ढ) प्रतिष्ठान में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा, शर्तों और सुविधाओं के लिए आवश्यक व्यवस्था करना ।
(ण) निर्धारित ब्यबस्था अनुरुप विभिन्न पदों में नियुक्तियां करने के लिए ।
(त) शैक्षिक और अन्य सेवा शुल्क निर्धारित और प्राप्त करना ।
(थ) अक्षयकोष स्थापित करना और इसे निर्धारित व्यस्था अनुसार संचालित करना ।
(द) प्रतिष्ठान के उद्देश्य को पूरा करने के लिए अन्य आवश्यक कार्य करना ।
इसे देखते हुए, ऐसा लगता है कि प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए एक उच्च स्तरीय संस्था की स्थापना करके एक सराहनीय कार्य किया है । संभवतः इस प्रकृति की एक संस्था की स्थापना करने वाले पहला प्रदेश है जिसे अन्य प्रदेशो के लिए भी अनुकरणीय कार्य हो सकता है । इस कार्य के लिए प्रदेश २ सरकार को हमें अवश्य धन्यवाद देना चाहिए ।
इन प्रकृति के प्रतिष्ठानो की स्थापना का सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक यह है कि सरकार कितनी स्वायत्तता प्रदान कर रही है और संसाधनों को जुटाने में कितना सक्रिय है । इसके बिना किसी संस्था के लिए खड़ा होना और परिपक्व होना मुश्किल है । यदि ऐसा ना हो पाया तो केवल एक ऐन लाना सिर्फ राजनीतिक एजेंडा के आलावा कुछ नही हो सकता । अब तक के कार्यगति को दिखाते हुए संतोष करने की जगह नही दिखाई दे रही है । क्योंकि इस ऐन का मसौदा तैयार करने में लगभग एक साल का समय लगा, और फिर प्रदेश सरकार के भीतर चर्चा और अन्य गृहकार्य मे एक और साल लग गया । इन सभी कार्यों के पूरा होने के बाद, यह प्रदेश विधानसभा द्वारा ३ कार्तिक, २०७७ पर पारित किया गया है तादुप्रांत २५ कार्तिक, २०७७ पर प्रदेश प्रमुख द्वारा प्रमाणित किया गया । उसके बाद, तीन पदाधिकारियों को कुलपति, रजिस्ट्रार और शिक्षा प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया है । प्रतिष्ठान के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंग ऐन के दफा (७) अनुसार ‘सञ्चालक परिषद’ है, जिस्का गठन अभी तक नही हो पाया है । इस गति को निश्चित रूप से उत्साही नहीं माना जा सकता है । दूसरे शब्दों में, इस प्रतिष्ठान की स्थापना जिस उत्साह, इरादों और उद्देश्यों के लिए किया गया है, उसके लिए प्रदेश सरकार की यह गति बाधक ना साबित हो इसकी चिन्ता लोगो में अवश्य है । कई अटकलें हैं कि अगर इस संस्था को अन्य सरकारी कार्य जैसा ही यदि माना जाता है, तो यह एक राजनीतिक एजेंडा में बदल जाने की सम्भावना बहुत प्रबल है । ऐसा न हो, संबंधित अधिकारियों से विनम्र अनुरोध है ।
एक कहावत है कि किसी योजना की शुरुआत और अंत बहुत कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है इसका मतलब यह है कि चाहे वह एक योजना हो या किसी नए कार्य की शुरुआत हो, इसके लिए बहुत दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत के साथ–साथ दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता होती है । इसके लिए ईमानदारी के साथ पूर्ण प्रतिबद्धता की आवश्यकता है । विशेष रूप से, ऐसे संस्थानों को परिपक्व करने के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता बहुत ही आवश्यक है । जिस तरह से इस संस्था की आवश्यकता को आत्मसात करके कानून लाया गया है, उसी तरह सरकार को एक उदार हृदय से आवश्यक संसाधन और साधन जुटाने होंगे ।
सवाल यह उठता है कि क्या प्रदेश सरकार संगठन के उद्देश्यों के अनुरूप अपेक्षित उदार सहयोग और गतिविधियाँ प्रदान कर रही है ? अब तक कानून को लाने से लेकर अब तक की गति को देखते हुए, पर्याप्त उदारता और उत्साह नहीं दिखाई देता है, लेकिन अभी भी आशा बनाए रखने के लिए बहुत जगह है । मेरा मकसद सिर्फ नकारात्मक टिप्पणी करना ही नही है परन्तु अच्छे के लिए सम्बन्धित व्यक्ति अथवा निकाय का ध्यान आकर्षित करना है ।
यह संस्थान, प्रदेश द्वारा ‘उत्कृष्टता केंद्र’ (ऋभलतभच या भ्हअभििभलअभ)’ स्थापित करने की दृष्टि से स्थापित किया जाना चाहिए था, जो कि कानून के प्रावधानों के साथ ऐसा प्रतीत नहीं होता है । कम से कम नेपाल में अन्य विश्वविद्यालयों के संचालन मे जो कठिनाइयाँ होती रही है, उनसे सबक लिया जाना चाही था जो हुआ नहीं लगता है । इसके कानून को यदि गौर से देखा जो तो, यह एक बहुत ही पारंपरिक संस्था की तरह दिखता है । कुछ प्रावधान तो और भी अधिक पश्चगामी जैसा लगता है । उदाहरण के लिए, ऐन के अनुच्छेद ४ (१) में, यह कहा गया है कि संस्था एक स्वायत्त निकाय होगी जिसमें अविभाज्य उत्तराधिकार होगा, लेकिन ऐन में कुछ प्रावधानों पर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है जो स्वायत्तता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करते हैं ।
१. ऐन के दफा (९)(ख) के अनुसार, यह कहा जाता है कि स्थापना के आवश्यक नियम सञ्चालक परिषद् के कार्यों, कर्तव्यों और शक्तियों के अधीन बनाए जाएंगे ।
२. ऐन के दफा (४४) (२) के अनुसार, विनियम बनाने से पहले सरकार से सहमति प्राप्त की जानी चाहिए ।
३. ऐन के दफा (४२) के अनुसार, प्रदेश सरकार प्रतिष्ठान को आवश्यक दिशा–निर्देश दे सकती है ।
उपरोक्त कानूनी प्रावधान स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि सरकार ने किस प्रकार की स्वायत्तता प्रदान की है या प्रदान करना चाहती है । संक्षेप में यदि कहा जाय तो इस संस्था को मंत्रालय की शाखा बनाने का प्रयास किया गया प्रतीत होता है ? यह सरकार के रूढि़वाद को स्पष्ट रूप से दर्शाता है । एक साधारण सा सवाल है कि क्या यह ऐन किसी तरह की सामंती मानसिकता की उपज तो नही है ? इस असहिष्णुता के परिणामस्वरूप, इस संस्था की स्वायत्तता के अस्तित्व पर सवाल उठाया जा सकता है और साथ ही यह माना जा सकता है कि संस्था के विकास में एक बड़ी बाधा उत्पन्न हो सकती है । एक और विरोधाभास यह है कि इस ऐन में एक विनियमन बनाने का प्रावधान है जो अपने आप में एक नियम होना चाहिए या विनियम यह बहस का विषय हो सकता है । अन्यत्र विनियम होने के बाबजूद ऐन का दफा (४०) मे ‘नियम’ शब्द का उल्लेख किया गया है, जो कहीं भी परिभाषित नहीं है । यदि ऐसे विरोधाभासों और अव्यवहारिक प्रावधानों को समय रहते सुधारा नहीं गया, तो भविष्य में इसका संचालन और कठिन हो सकता है । एक अन्य चुनौती के रूप में, ऐन के दफा (२५) (२) के अनुसार, ऐन के प्रारंभ के समय प्रचलित कानून के आधार पर संचालित प्रदेश अस्पताल जनकपुरधाम को शिक्षण अस्पताल के रूप में स्थापित माना जाएगा और उसी तरह उपदफा (३) अनुसार प्रादेशिक अस्पताल जनकपुरधाम के अधीन चल–अचल सम्पत्ति का स्वामित्व स्वतः इस प्रतिष्ठान को स्थानांतरित कर दिया जाएगा । इन प्रावधानों का क्रियान्वयन कितना सहज या कठिन, वो तो बाद की बात है पर अभी तक प्रदेश सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है । प्रशासनिक दृष्टिकोण मे पुराने के साथ नए को सम्मलित करने की तुलना में एक नया संगठन स्थापित करना बेहतर होगा, ऐसा कुछ विद्वानो का कहना है ।
खैर जो भी हो, किसी भी तरह, सभी चुनौतियों को पार करते हुए एक अच्छे संस्थान के रूप में स्थापित किया जाय वो इस प्रदेश के लोगों की आकांक्षाएं और शुभकामनाएं निश्चित रूप मे बनी रहेगी ।
अंत में, मैं भारत के दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता की दो पंक्तियों को उद्धृत करना चाहूंगा ।
छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता है,
कोई छोटे मन से खड़ा नहीं होता है ।

