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जीते जी नही छूटता कभी, मोह माया का जाल : मनीषा मारु

मनीषा मारू
 

जीते जी नही छूटता कभी, मोह माया का जाल

सारा काम निपटा,जब थक कर सोई
सोते ही आंख लग गई,
हृदय करने लगा स्वप्न लोक में भ्रमण,
और वही से यात्रा शुरू हो गई।

देवलोक से आया एक पुष्प विमान,
यह देख नयन हुए हर्षित
मन हुआ पुलकित,
खड़ी हुई मैं हाथ जोड़कर,
और आभार प्रकट करने लगी
एक तुच्छ प्राणी सी होकर।

जैसे ही मैं पुष्प विमान में बैठकर,
चलने को हुईं तैयार,
आंखों के आगे घूमने लगा सारा घर परिवार,
आया सबसे पहले बच्चों का ख्याल,
बिन मां के क्या होगा उनका हाल?

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फिर व्याकुल हुआ हृदय,
जीवन साथी के लिए,
मेरे बिन कैसे गुजरेगा?
उनका जीवन संसार ,
हर छोटी से छोटी चीज भी
जिनको मेरे हाथों से ही चाहिए हरबार।

कुछ और आता जहन में विचार,
उसके पहले ही आ गई ये आवाज,
अब तो उठ जाओ भाग्यवान।
लगा दो चाय नाश्ता,हम सब हैं तैयार।

आंख घुमाकर देखा घड़ी में बज रहे थे चार,
फिर क्या था, उठी और लग गई ..
करने को वही घर गृहस्ती के कारोबार।

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घूम फिर के आए मन में बस यही सवाल,
चाहें घूम लो देश विदेश
या भ्रमण करलो खोल के अंतर्मन के द्वार।

जीते जी नही छूटता कभी, मोह माया का जाल…
जीते जी नही छूटता कभी, मोह माया का जाल।

मनीषा मारू
मनीषा मारू
नेपाल

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