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“पुत्र दिवस” बेटा तो घी का लड्डू हैं जो टेंढा भी हो तो कोई बात नहीं : बिम्मी शर्मा

 

 बिम्मी कालिन्दी शर्मा, (व्यग्ंय) बीरगंज । प्रदेश नंबर २ के सरकार ने पुत्र कि लंबी आयु की कामना कर के जीउतिया पर्व का व्रत रखने वाली माता या महिलाओं को सरकारी छुट्टी दे दिया है । यह वही दो नंबर प्रदेश सरकार है जो ‘बेटी बचायी बेटी पढायी’ का नारा लगाने में सब से आगे है । सच मे यह सरकार दो नंबर यानी कि दोगला है तभी तो पुत्र के पक्ष मे है । पर बेटी या पुत्री के नाम से कोई पर्व या व्रत नहीं है न यह सरकार चाहती है कि बेटी की आयु लंबी हो । बेटियां जितनी.जल्दी मर खप जाएं उतना ही मां बाप और सरकार के लिए अच्छा है । पर बेटियां होती है जीवट.और जैसी भी विषम परिस्थिति में भी संघर्ष कर के जिंदा रह जाती है । ईसी लिए तो ईस देश की आवादी में बेटों से ज्यादा बेटियों का हिस्सा ज्यादा है । ईसी लिए शायद मां पुत्रों कि संख्या और उनकी आयु दोनो बढाने के लिए जीउतिया का व्रत करती हैं और उदारमना प्रदेश नंबर दो कि सरकार खुश हो कर ईन व्रतालु महिलाओं के लिए छुट्टी घोषणा करती है ।
अब सरकार को शर्म तो है नहीं, सत्ता में काविज भी ज्यादातर पुरुष हैं और मुखिया भी पुरुष ही है । अब किस पुरुष को अच्छा नहीं लगेगा कि माता या.पत्नी उनकी लंबी और स्वास्थ्य के लिए निराहार व्रत करें । खुद तो चार वार खा कर डकारेगे और मोटा भी जाएगें । पर माता और पत्नी ईन्ही पुरुषों के लिए व्रत कर के दुब्ला रहीं है । अब सारे धर्म, परंपरा, संस्कृति, रीतिरिवाज और मर्यादा का जुआ औरत के ही कंधे पर बांध कर मर्द सदियों से उन पर हुक्म चलाता रहा है । आज पितृसत्ता कि टहनी ईतनी मजवुत और जड ईतना गहरा ईसी लिए है कि ईसको मल खाद्य दे कर सिंचने का काम औरतें ही करती आ रही है । दिखता आगे भले ही पुरुष हो पर ईसको सिंच कर खुब मजवुत बना रही है औरतें । सास बहु को मां बेटी को संस्कृति और परंपरा बचाने के नाम पर पितृसत्ता कि वलिवेदी पर चढाती है और कहती है मर्यादा में रहने के लिए आदेश देती है और कहती है परिवार और खानदान की ईज्जत तुम्हारे ही हाथ में है’ । जैसे ईज्जत न हुआ हाथ का मोबाईल हो गया जो गिरने पर टूट ही जाएगा । और बेटा तो कूलदीपक है । उसे काजु बादाम खिलाया जाएगा, उसकी हर फर्माईस पूरी की जाएगी और उसके लिए मन्नत मांगा जाएगा और लंबी आयु के लिए व्रत रखा जाएगा ।
बेटा तो घी का लड्डू हैं जो टेंढा भी हो तो कोई बात नहीं । बस बेटी को सावुत होना चाहिए जो पराए घर जा कर परिवार की ईज्ज़त और मर्यादा रखेगीं । बेटा दुसरे के घर की ईज्जत से खेलें तो भी ईनका आन बान शान कम नहीं होता । ईसी लिए पति कि लंबी उम्र के पत्नियां तीज का व्रत करती है ताकि उनका सुहाग अमर रहे । और माताएं अपने नौनिहाल बेटों के लंबी उम्र के लिए व्रत कर के उसको और ज्यादा उदंड बनने के लिए छूट देती हैं । सुहाग जिंदा रहेगा तब न पत्नियां सोलह श्रृंगार कर पाएगी और पुत्र जिंदा रहेगा तब न मातापिता की अर्थी को कांधा देगा और मुखाग्नि भी देगा । बेटा श्राद्ध करेगा वंश बढाएगा । बेटियां तो शादी कर के दहेज ले कर फूर्र से चीडियां की तरह उड जाएगी । ईसी पति और पुत्र कि लंबी उम्र कि कामना करते.हुए तीज और जीउतिया पर्व मनाया जाता है । पर पत्नी और पुत्री तो नदीं मे बह कर आई है ईनके लिए व्रत और पर्व कैसा ? ईनके लिए तो बस बाबा जी का ठूल्लू 👍
चाहे जितनी भी बेटी दिवस मनाओ या मातृ दिवस भी मना लो पर तल्ख सच्चाई यही है कि समाज अभी भी बेटे का ही कामना करता है । चाहे वह पति हो या पुत्र समाज के लिए यही चाहिए । बेटा सोने की अशर्फी की थैली ले कर पेदा नहीं होता । पर उसे हिरें जैसा मान मिलता है भले ही वह बाद मे किरा सावित हो । मातापिता को वृद्धावस्था में यही बेटा लताड्ता है तब भी ईनके होश ठिकाने नहीं आते । बेटे के पैदा होने पर ईसी लिए जश्न मनाया जाता है कि यह दहेज़ ले कर नहीं जाएगा उल्टे खुद की बोली लगा कर दहेज ले कर आएगा और मां बाप को मालामाल करेगा । हाय रे देया ! अनदेखे सुदूर भविष्य के बारे में मां बाप अभी से सोचना शुरु कर देतें है । यह पितृसत्ता कि सोच और समझ है जो महिलाओं को दुसरे दर्जे का मानती है । ईसी लिए तो पति या पुत्र के नाम पर लिया जाने वाला व्रत में सरकार छुट्टी देता है । देखने में तो यह सरकार महिला मैत्री लगती है पर है महिलाओं की दुश्मन । ईसी लिए तो अपनी और पितृसत्ता को बचाने के लिए महिलाओं का ही धार्मिक और सामाजिक शोषण कर रही है । ‘मियां कि जुती मियां के सर’ की तर्ज पर औरत की जुती औरत के ही सर पर मारा जा रहा है । ईसे कहते है चीत्त भी मेरा और पट भी मेरा ।
अब किस मुहं से दो नंबर प्रदेश सरकार ‘बेटी पढाओ बेटी बचाओ’ का नारा लगाएगी और बेटियों को साईकल बांटेगी ? बेटियों को तो बचने नहीं दे रहे हैं परंपरा और धर्म के नाम पर । पत्नी और मां भी तो किसी की बेटियां ही हैं जो पति और पुत्र के लंबी उम्र के लिए व्रत रख कर अपनी उम्र घटा रही है । बेटों को बचाना है, पढाना है और आगे बढाना है यही है सरकार की दिली ईच्छा । ईसी लिए तो बेटों के लिए बेटियो की वलि दी जा रही है । यह पितृसत्ता को बचाने के लिए ही पुरुषों कि सत्ता द्वारा किया गया प्रपंच है । यदि नहीं तो प्रदेश सरकार उस विज्ञप्ति में पुत्र कि जगह संतान लिख सकती थी । पर नही प्रदेश सरकार को तो पुत्र को बचाना है पुत्री जाए चाहे भांड में । पुत्र तो अपने आप ही भगवान शिव की तरह धरति से प्रकट हो जाएगें । पुत्री के लिए न मां का गर्भ चाहिए । जीउतिया पर्व को सिधे ही पुत्र दिवस’ मान कर क्यों नहीं मनाया जाता ? पुत्र भी खुश, मां भी खुश और सरकार भी खुश । पुत्री का तो दान होता है ‘कन्यादान’ होता है उसका मान क्या अपमान क्या ?

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बिम्मी शर्मा

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