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नाग-पंचमी पर नाग की पूजा का विशेष महत्व

 

nagनाग-पंचमी का पर्व धार्मिक आस्था एवं विश्वास के सहारे हमारी बेहतरी की कामना का प्रतीक है। यह जीव-जंतुओं के प्रति समभाव, हिंसक प्राणियों के प्रति भी दयाभाव और अहिंसा के अभयदान की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें पर्यावरण से जोड़ता है। सांप खेतों में रहकर कृषि-संपदा (अनाज) को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों को खा जाते हैं, इसलिए उन्हें किसानों का मित्र अथवा क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। अनेक जीवन-रक्षक औषधियों के निर्माण हेतु नागों से प्राप्त जहर की जरूरत होती है। अत: नाग हमारा जीवन-रक्षक भी है। इसी कारण आधुनिकता के वर्तमान युग में भी नाग-पंचमी का त्योहार प्रासंगिक है। हमारी संस्कृति ने उन सभी जीवों, वनस्पतियों तथा वस्तुओं को सम्मान दिया है, जो हमारे अस्तित्व को बचाने में सहायक हैं। इसी कारण, पर्यावरण-संतुलन में मदद करने वाला सांप देवाधिदेव शिवजी के कंठ का हार बनता है, तो नाग-पंचमी पर वह पूजा जाता है।

नाग-पंचमी श्रावण मास में शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में नाग को प्रत्येक पंचमी तिथि का देवता माना गया है, परंतु नाग-पंचमी पर नाग की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। पुराणों में यक्ष, किन्नर एवं गंधर्वो की भांति नागों का भी वर्णन है। उसमें सांप शक्ति एवं सूर्य के अवतार माने गए हैं, इसलिए नाग को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, नाग महर्षि कश्यप और उनकी पत्‍‌नी कद्रू की संतान हैं।

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पुराणों के अनुसार, सूर्य के रथ में बारह सर्प (नाग) हैं, जो क्त्रमश: प्रत्येक माह में उनके रथ के वाहक बनते हैं। भगवान विष्णु क्षीर-सागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। शेषनाग ही रामावतार में लक्ष्मण और कृष्णावतार में बलराम के रूप में अवतरित हुए थे।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष साक्षी हैं कि नागों के पूजन की परंपरा आदिकाल से प्रचलित है। मिश्च की सभ्यता भी अत्यंत प्राचीन है। वहां आज भी शेख हरेदी नामक पर्व पर सांपों की पूजा की जाती है। पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में नाग-पंचमी का उत्सव सपरें के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। पर्वतीय प्रदेशों में नाग-पूजा का प्रचलन अधिक है। सुप्रसिद्ध संस्कृत कवि कल्हण ने राज तरंगिणी ग्रंथ में कश्मीर की धरती का दिव्य सपरें से संबंध बताया है। वहां अनंतनाग नामक स्थान उसका ऐतिहासिक साक्ष्य है।
मान्यता है कि नाग-पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिय-मर्दन लीला हुई थी। भविष्य पुराण में कथानक है कि देवासुर-संग्राम में हुए समुद्र-मंथन से उच्चैश्रवा नामक अश्व (घोड़ा) निकला था। उसे देखकर नागमाता कद्रू ने अपनी सौत विनता से कहा, इस घोड़े का सफेद रंग है, परंतु बाल काले दिखलाई पड़ते हैं। विनता द्वारा यह बात स्वीकार न किए जाने पर दोनों में वाद-विवाद छिड़ गया। कद्रू ने नागों से अश्व के बाल के समान सूक्ष्म होकर उच्चैश्रवा के शरीर पर लिपट जाने को कहा, ताकि वह काले रंग का दिखाई देने लगे। पुत्र नागों द्वारा विरोध करने पर कद्रू ने क्त्रोधित होकर उन्हें राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्प-यज्ञ के दौरान भस्म हो जाने का शाप दे दिया। तब ब्रह्माजी के वरदान से आस्तीक मुनि ने सर्प-यज्ञ को रोककर नागों की प्राणरक्षा की। मान्यता है कि ब्रह्माजी द्वारा पंचमी के दिन वरदान दिए जाने और पंचमी के दिन ही आस्तीक मुनि द्वारा नागों की रक्षा किए जाने के कारण पंचमी-तिथि नागों को समर्पित है।

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नाग-पंचमी पर मुख्यत: पांच पौराणिक नागों की पूजा होती है – अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक व पिंगल। असंख्य फन वाले अनंत (शेष) नाग की शय्या पर भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। वासुकि नाग को मंदराचल से लपेटकर समुद्र-मंथन हुआ था। तक्षक के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। नागवंशी कर्कोटक के छल से रुष्ट होकर नारदजी ने उसे शाप दिया था। तब राजा नल ने उसके प्राणों की रक्षा की थी। हिंदू व बौद्ध साहित्य में पिंगल को कलिंग में छिपे खजाने का संरक्षक माना गया है।

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अंधविश्वास के चलते लोग नाग-पंचमी के दिन सांपों को दूध पिलाते हैं। यह गलत है। सांप स्वभावत: दूध नहीं पीते। सांपों को दूध पिलाने के प्रलोभन में सपेरे कई दिन पहले उनका भोजन-पानी बंद कर देते हैं। अत: भूख-प्यास शांत करने के लिए सांप नाग-पंचमी को दिया जाने वाला दूध ग्रहण तो कर लेते हैं, किंतु उसका पाचन न होने से अथवा एलर्जी के कारण उनकी मृत्यु होने की आशंका रहती है।जागरण

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