‘प्रचण्ड’ की आत्महंता सोच : लिलानाथ गौतम
राजनीतिक असफलता से सृजित पीड़ा, निराशा और अराजक मानसिकता की उपज
लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर 2021 । पूर्व प्रधानमन्त्री तथा माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने हाल ही में एक अभिव्यक्ति दी है, जो आज चर्चा और विवाद में भी है । पार्टी संबंद्ध विद्यार्थी संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधन करते हुए उन्होंने कहा कि कभी–कभार उनको आत्महत्या करने का मन होता है । प्रचण्ड का कहना है कि राजनीतिक परिस्थिति ही ऐसी है, जहां उनके लिए ‘मृत्यु’ और ‘मुक्ति’ में से एक रास्ता चयन करने की बाध्यता है ।
विशेषतः नेकपा (एमाले–माओवादी एकता से निर्मित) पार्टी में हुए विभाजन के बाद प्रचण्ड की अभिव्यक्ति में कुछ ज्यादा ही उग्रता और आक्रोश दिखाई देती है, जो विवादित होती जा रही है । ऐसी ही पृष्ठभूमि में उन्होंने पिछली बार भारतीय स्वतन्त्रतता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद की जीवनी में आधारित फिल्मी कथा को उदाहरण के रूप में पेश करते हुए ‘आत्महत्या’ संबंधी निराशाजनक चिन्तन प्रकट किया । प्रचण्ड ने कहा कि वह यथास्थितिवादी और पश्चगामी शक्ति के सामने आत्मसमर्पण करनेवाले नहीं हैं, बदले में आत्महत्या कर सकते हैं ।
इस तरह की बात करते हुए प्रचण्ड नेकपा एमाले, विशेषतः पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली समर्थक एमाले कार्यकर्ताओं को सशक्त और हिंसात्मक प्रतिकार करने के लिए भी माओवादी संबंद्ध वाईसीएल और विद्यार्थी कार्यकर्ताओं को निर्देशन देते हैं । आखिर प्रचण्ड क्यों इसतरह पुनः हिंसात्मक राजनीति को प्रोत्साहित कर रहे हैं ? इसके लिए उनके राजनीतिक जीवन और उतार–चढ़ाव को देखना होगा । संक्षेप में कहें तो प्रचण्ड में अन्तरनिहित राजनीतिक महत्वाकांक्षा, व्यक्तिवादी चरित्र और उससे सृजित असफलता ही प्रमुख कारण है ।
हां, आज प्रचण्ड में अनेक कुण्ठा, निराशा और हीनताबोध है, जिसके चलते वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चुके हैं, इसीलिए कभी आत्महत्या की बात करते हैं तो कभी हिंसात्मक राजनीति को प्रोत्साहन करते हुए कार्यकर्ताओं को निर्देशन देते हैं ।
यहां वि.सं. २०६४ साल में सम्पन्न प्रथम संविधान चुनाव का स्मरण होता है । उस समय माओवादी पार्टी से डरनेवाले और आशावादी होनेवाले दोनों की संख्या अधिक थी । यही डर और आशावादी आम मनोविज्ञान के कारण ही माओवादी ने उस समय प्रत्यक्ष चुनाव में एकल बहुमत प्राप्त किया था । लेकिन समानुपातिक चुनाव प्रणाली के कारण संसद् में माओवादी को एकल बहुमत प्राप्त नहीं हो पाया । तब भी संसद् में माओवादी की सहभागिता बिना किसी भी निर्णय नहीं हो सकता था । शक्तिशाली पार्टी होते हुए भी प्रचण्ड उसको सदुपयोग नहीं कर पाए ।
प्रथम संविधानसभा चुनाव से पहले प्रचण्ड को नेपाल की प्रथम कार्यकारी राष्ट्रपति के रूप में प्रचारित किया गया । प्रचण्ड खुद भी कार्यकारी राष्ट्रपति होना चाहते थे, यह उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी ।
प्रथम पार्टी होने के नाते भी संसदीय व्यवस्था में अभ्यासरत कांग्रेस–एमाले जैसे पार्टी और अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति के कारण प्रचण्ड अपनी महत्वाकांक्षा में असफल रहें, अर्थात् वह कार्यकारी राष्ट्रपति नहीं बन पाए । अन्ततः संवैधानिक राष्ट्रपति को स्वीकार करना पड़ा उसके बाद प्रचण्ड ‘बैक’ हो गए । यूं कहें तो महत्वाकांक्षापूर्ण उनकी राजनीतिक यात्रा में यहीं से ब्रेक लगना शुरु हुआ है ।
संसद् में प्रथम पार्टी होने के नाते प्रचण्ड प्रधानमन्त्री तो बन गए, लेकिन कुछ ही महीनों के बाद सेनापति प्रकरण में उनको पद से इस्तीफा देना पड़ा । परम्परागत संसदीय पार्टी और सशस्त्र युद्ध से संसद् में प्रवेश करनेवाले माओवादी के बीच संसद में काफी द्वन्द्व हो गया । जिसके चलते प्रथम संविधानसभा ही असफल बन गया । दूसरे संविधानसभा चुनाव में पहले की तुलना में माओवादी को बुरी तरह पराजित होना पड़ा, धीरे–धीरे माओवादी पार्टी कई टुकड़ो में विभाजित हो गई । परिणामतः आज प्रचण्ड के सामने ऐसी परिस्थिति है, अगर समानुपातिक चुनाव प्रणाली को खारिज कर पहले की तरह प्रत्यक्ष चुनाव–प्रणाली में जाते हैं तो माओवादी को संसद् में एक सीट मिलने की संभावना भी कम है ।
आज जितने भी क्रान्तिकारी भाषण–बाजी क्यों ना हो, वि.सं. २०७२–०७३ साल में सम्पन्न चुनाव से पहले ही प्रचण्ड इस सत्य को भालिभांति जानते थे । इसीलिए उन्होंने स्थानीय चुनाव में नेपाली कांग्रेस के साथ तालमेल किया, लेकिन बाद में प्रादेशिक और संघीय चुनाव में तत्कालीन एमाले के साथ चुनावी तालमेल की गई, पूर्व सहमति अनुसार पार्टी एकता भी हो गई । एमाले के साथ पार्टी एकता होने के बाद प्रचण्ड में फिर एक बार शक्तिशाली पार्टी का एकल अध्यक्ष और प्रधानमन्त्री बनने की महत्वाकांक्षा बढ़ने लगी । यूं कहें तो एकीकृत ‘नेकपा’ को प्रचण्ड अपने कब्जे में लेना चाहते थे । लेकिन एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली के कारण ही वह असफल बन गए । उसके बाद प्रचण्ड में चरम निराशा दिखाई देती है । इसीलिए आज प्रचण्ड ओली और एमाले कार्यकर्ताओं के विरुद्ध भौतिक रूप में प्रतिकार करने के लिए निर्देशन देते हैं । अगर माओवादी कार्यकर्ता किसी एमाले कार्यकर्ता के विरुद्ध भौतिक आक्रमण में उतर जाते हैं तो सार्वजनिक रूप में ही प्रचण्ड खुशी व्यक्त करते हैं । राजनीतिक रूप में ओली को यथास्थितिवादी प्रमाणित करने के बदले इसतरह हिंसात्मक मानसिकता से प्रस्तुत होना एक पूर्व प्रधानमन्त्री के लिए शोभनीय नहीं है । सच कहें तो यह एक अराजक और विक्षिप्त मानसिकता की उपज है । ऐसी ही मानसिकता में फंसने के कारण आज प्रचण्ड आत्महत्या की बात करने लगे हैं । इसतरह की राजनीति से माओवादी और प्रचण्ड को अब राजनीतिक शक्ति प्राप्त होनेवाली भी नहीं है । यह प्रचण्ड को और भी कमजोर बना देगा, यह निश्चित है ।
आज प्रचण्ड जिस तरह प्रस्तुत हो रहे हैं, यह एक लोकतान्त्रिक नेता का चरित्र भी नहीं है । जनयुद्ध से शान्तिपूर्ण राजनीति में आने के बाद उन्होंने कई बार लोकतन्त्र और संसदीय राजनीतिक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त किया है । लेकिन आज लगभग १५ साल के बाद वह अपने कार्यकर्ताओं को हिंसात्मक राजनीति के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं । राजनीतिक पीड़ा, कुण्ठा और निराशा के कारण आत्महत्या करने की बात करते हैं । आखिर प्रचण्ड में इस तरह की पीड़ा, कुण्ठा और निराशा क्यों हावी हो रही ? इसके पीछे उनकी व्यक्तिवादी चरित्र और अहंकार मुख्य जिम्मेदार हैं ।
अगर प्रचण्ड में व्यक्तिवादी अहंकार नहीं रहता तो आज डा. बाबुराम भट्टराई, मोहन वैद्य, नेत्रविक्रम चन्द जैसे नेता उनसे अलग नहीं होते । जीवन–मरण की लड़ाई (सशस्त्र युद्ध) काल में महत्वपूर्ण भूमिका साथ–साथ निर्वाह करनेवाले माओवादी के कई नेता–कार्यकर्ता पार्टी से अलग होने के बाद भी प्रचण्ड में व्यक्तिवादी चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है, यही कारण है कि एमाले के साथ की गई पार्टी एकता भी सफल नहीं हो पायी । राजनीतिक वृत्त में कहा जाता है कि अन्य पार्टी तथा पार्टी से बाहर रहे व्यक्तियों को ही नहीं, खुद अपनी पार्टी में रहे सहकर्मी को भी प्रचण्ड ने कभी अपने हैसियत बराबर नहीं माना । जिसके चलते आज वह अकेले हो गए हैं । बताया जाता है कि अगर प्रचण्ड नहीं रहते हैं तो माओवादी पार्टी का अस्तित्व भी नहीं रहेगा । एक राजनीतिक पार्टी, सिर्फ एक नेता के कारण जीवित रहने की स्थिति हो जाती है तो ऐसी पार्टी को ‘पार्टी’ नहीं, व्यक्तिगत ‘क्लब’ के रूप में व्याख्या करना उचित है । लगभग ऐसी ही हांलात माओवादी और प्रचण्ड के होने के कारण प्रचण्ड अपने राजनीतिक भविष्य को अंधकार देख रहे हैं । एमाले पार्टी के साथ की गई एकता असफल होना, एमाले से माधव कुमार नेपाल को अलग करने से भी ओली और एमाले की शक्ति में महत्वपूर्ण गिरावट न आना, आदि के कारण प्रचण्ड राजनीतिक रूप में विक्षिप्त भी हो गए हैं ।
बताया जाता है कि पिछली बार से वह राजनीतिक रूप में अकेले महसूस करने लगे हैं । इसीलिए आगामी चुनाव तक वर्तमान सत्ता गठबंधन को कायम रखने की बात वह प्रायः हर सार्वजनिक भाषण में करते हैं । वैसे तो कभी–कभार प्रचण्ड पूर्व माओवादियों के बीच एकता करने की बात भी करते हैं । लेकिन यह असंभव है, प्रचण्ड खुद भी जानते हैं । राजनीतिक विचार की दृष्टिकोण से भी प्रचण्ड में नैतिक संकट है । क्योंकि प्रचण्ड एकबार एमाले हो चुके हैं । अर्थात् एमाले द्वारा आत्मसात् किए गए राजनीतिक दर्शन को प्रचण्ड पहले ही आत्मसात कर चुके हैं । पुनः एमाले से विभाजन होने के बाद प्रचण्ड की वैचारिक लाइन क्या है ? इसमे आज स्पष्टता नहीं हैं ।
इसीतरह पार्टी कमजोर होने के कारण पहले प्रचण्ड को जिस तरह दाताओं से आर्थिक सहयोग प्राप्त होता था, आज वह टूटने लगा है । बताया जाता है कि आर्थिक रूप में भी प्रचण्ड कमजोर पड़ते जा रहे हैं । चुनाव आ रहा है, उसके लिए आवश्यक आर्थिक स्रोत जुटाने के लिए प्रचण्ड को मुश्किल हो रही है । प्रचण्ड को लगता है कि अगामी चुनाव में पार्टी की संसदीय पोजिशन अधिक कमजोर होनेवाली है । इसी भय के कारण प्रचण्ड मानसिक रूप में विचलित हैं । जिसके चलते वह कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप में उत्तेजित बना रहें । लेकिन प्रचण्ड राजनीतिक शक्ति प्राप्ति के लिए आज जिसतरह ‘इमोसनल ब्ल्याकमेल’ करना चाहते हैं, अब वह बिकनेवाला नहीं है । क्योंकि माओवादी और प्रचण्ड का सत्तारोहण आम लोग देख चुके हैं । पुनः माओवादी को ही सत्ता में आना चाहिए, इसके लिए कोई भी कारण नहीं है । इसीलिए प्रचण्ड जो कुछ कर रहे हैं, वह उनके लिए ही और भी घातक हो सकता है ।

