नेपाल स्थित प्रसिद्ध भगवती मंदिर – अरुण कुमार तिवारी
वर्ष के चार नवरात्रों में शारदीय नवरात्र को नेपाल में बड़ा दशैं के नाम से जाना जाता है । बड़ा दशैं (दशहरा) नेपाल के तराई और पहाड़ के सभी स्थानों पर धूमधाम से मनाया जाता है ।
नेपाल की राजधानी काठमाण्डु उपत्यका में माता सती के शरीर के गिरे अंग का शक्ति पीठ विद्यमान है । यह मंदिर देवाधिदेव भगवान पशुपतिनाथ मंदिर के पूर्वोत्तर १ किलो मीटर की दूरी पर प्रसिद्ध बागमती नदी के तट पर गुह्येश्वरी माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है ।
१) गुह्येश्वरी माता मंदिरः
गुह्येश्वरी माता को समस्त नेपाल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है । सती माता के शरीर का गुह्य भाग यहाँ गिरने से गुह्येश्वरी माता हुआ है । यहाँ दैनिक पूजा तांत्रिक विधि से दोनों वक्त की जाती है । यह पूजा पिछले पाँच सौ साल पहले काठमाण्डु के तत्कालिन राजा प्रताप मल्ल के समय से विधिवत होता आ रहा है ।
सती देवी माता के अंग पतन होने के पहले से ही यह स्थान पवित्र होने का कालिका पुराण में उल्लिखित है । भगवान शंकर ने स्वयम् कहा है कि मेरी स्वरूपा भगवती भक्तों को मोक्ष देने के लिए यहाँ अवस्थित है । मान्यता है कि देवाधिदेव भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करने से पहले माता का दर्शन करना पड़ता है । भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन के पूर्ण फल के लिए गुह्येश्वरी माता का दर्शन करना अनिवार्य है ।
गुह्येश्वरी माता के मंदिर का शिल्प शिखर का आकार एक अलग तरह से निर्मित है । शिखर का गुम्बज पीतल और चाँदी से निर्मित नागपास में अष्टधातु का चंद्रमा के बीच में एक विशाल घण्टा है । मंदिर के गर्भगृह में एक जल से भरा गोलाकार चाँदी मढा हुआ कुण्ड है । इसमें हमेशा जल भरा रहता है । इसे पूजा के पश्चात स्वर्ण कलश से ढक दिया जाता है । भक्तों को प्रसाद के रूप में वहाँ का जल दिया जाता है । जल को अपने सर पर छिडका जाता है । माता गुह्येश्वरी देवी को भुक्ति–मुक्ति प्रदायिनी कहा गया है । यह शक्ति पीठ होने से यहाँ बलि भी दिया जाता है ।
२) तलेजु भगवती माता मंदिरः
काठमाण्डु के हनुमानढोका स्थित तलेजु भगवती मंदिर है । यह मंदिर वर्ष में एक दिन शारदीय नवरात्र के महानवमी को सर्वसाधारणों के लिए खोला जाता है । इस दिन यहाँ सुबह से देर रात तक दर्शनार्थियों की भीड़ लगती है ।
मंदिर परिसर में स्थित श्वेत भैरव की मूर्ती के आगे पाड़ा का बलि चढाया जाता है । ईंट के बारह सीढि़यों का २५ मीटर उँचा यह मंदिर पैगोडा शैली में बना हुआ है । इस मंदिर को पाँच सौ साल पहले काठमाण्डु के मल्ल राजा महेन्द्र मल्ल के समय बनाया गया था । एक किम्बदंती है कि आज से तीन सौ पचास साल पहले मल्ल वंश के राजा जयप्रकाश मल्ल के साथ तुलजा भवानी एक कन्या का रूप धारण कर पाशा खेलने आया करती थी । एक दिन राजा ने उस कन्या को कुदृष्टि से देखा उसी समय वह कन्या अलोपित हो गई । उसके बाद राजा ने गलती महसूस कर देवी की स्तुति की तो एक दिन देवी प्रसन्न होकर आठ वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हुई । इस मंदिर का विशेष महत्व प्रत्येक साल महाअष्टमी और महानवमी और चतुदर्शी को १०८ बकरे और पाड़ा का बलि दिया जाता है ।
३) शोभा भगवती माता मंदिरः
राजधानी काठमाण्डु में विष्णुमती नदी के तट पर स्थित शोभा भगवती माता का पैगोडा शैली में बना मंदिर है । पीतल के छत के उपर सोने का कलश विराजमान है । १२ वीं शताब्दी में बने इस मंदिर में नियमित पूजा होने के साथ नवरात्र में विशेष पूजा होती है ।
मंदिर के गर्भगृह में अति सुन्दर शोभा भगवती माता की मूर्ति विराजमान है । यह मूर्ति सुन्दर मूर्ति कला का एक नमूना माना जाता है । यहाँ दर्शन–पूजन करने से दरिद्रता दूर होने के साथ सुख–समृद्धि कि वृद्धि होने की मान्यता है ।
४) माइती देवी माता मंदिरः
काठमाण्डु के दिल्ली बाजार और ज्ञानेश्वरी के बीच में स्थित माइती देवी मंदिर है । मंदिर का निर्माण चौदह सौ वर्ष पहले तत्कालिन काठमाण्डु के राजा अंशु वर्मा के शासन काल में होने का उल्लेख है । मंदिर में काठमाण्डु के नेवारी समुदाय के वज्राचार्य आस्पद के पुजारी द्वारा तांत्रिक विधि से पूजा की जाती है । मंदिर में प्रत्येक शनिवार, मंगलवार और गुरुवार को स्थानियों की भीड़ जमा होती है । मंदिर में पशु बलि दी जाती है तथा नवरात्र में विशेष पूजा की जाती है । कार्तिक माह के यम पंचक को कुकुर पूजा के दिन यहाँ विशेष मेला लगता है ।
५) भद्रकाली माता मंदिरः
काठमाण्डु उपत्यका के टुडीखेल मैदान के दक्षिण भाग में स्थित भद्रकाली मंदिर है । यहाँ तांत्रिक विधि से पूजा होती है । तीन सौ १८ वर्ष पहले के लिखे एक लालमोहर में उल्लेख अनुसार इस मंदिर का अस्तित्व बहुत पुराना है । यहाँ नवरात्र में विशेष पूजा होती है तथा दर्शनार्थियों की भीड़ जमा होती है ।
६) बज्रवाराही माता मंदिरः
राजधानी काठमाण्डु के ललितपुर जिला के गोदावरी नगरपालिका स्थित वज्रवाराही मंदिर है । यहाँ नेवारी समुदाय के तांत्रिक विधि से पूजा होती है । सुनसान और चारों ओर घना जंगल के बीच रहे मंदिर में स्थित वज्रवाराही मूर्ति के नीचे से पानी आता रहता है तथा उसी पानी से मंदिर के भीतरी भागों की सफाई की जाती है । मंदिर पाँच सौ साल पुराना है । मल्ल राजा द्वारा निर्माण किये जाने का उल्लेख है ।
कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण एक ही रात में करना था । लेकिन शिल्पियों द्वारा निर्माण करते–करते सुबह होने लगी और कौआ के बोल दिये जाने से मंदिर का गुम्बज तैयार नहीं हो पाया जो आज तक वैसा का वैसा ही रह गया है ।
इस मंदिर में किसानों को अपने पालतु मवेशियों को स्वस्थ्य और सुरक्षित रखने के लिये दूध, दही, घी लेकर आने और चढ़ाने का कहा जाता है । साधारणतया हिन्दूओं के सभी मंदिरों में गुम्बज हुआ करता है । लेकिन इस मंदिर में गुम्बज नहीं है । काठमाण्डु के मध्य से सिर्फ ३० मिनट में गाड़ी से पहुँचे जाने वाले इस मंदिर में प्रायः लोग घूमने और और पिकनिक मनाने के लिए जाते हैं ।
इसके अतिरिक्त राजधानी काठमाण्डु में पूmल चौकी माई मंदिर गोदावरी, नक्शाल भगवती मंदिर, नरदेवी मंदिर में भक्तगण मनोकांक्षा लेकर आते हैं, न्यू रोड स्थित संकटा मंदिर में दर्शनार्थियों का भीड़ उमड़ पड़ती है । इसी प्रकार बंगलामुखी मंदिर, कालिका स्थान, अन्नपूर्णा मंदिर, लगनखेल स्थित महालक्ष्मी मंदिर, कलंकी स्थित नील वाराही मंदिर, दक्षिण काली मंदिर, चण्डी भगवती मंदिर, वागेश्वरी भगवती मंदिर, माता तीर्थ मंदिर, चुडाल देवी मंदिर में नवरात्र में विशेष पूजा होती है ।
राजधानी काठमाण्डु उपत्यका के अतिरिक्त पलाञ्चौक जिला के पलाञ्चौक भगवती का मंदिर बहुत पुराना है । इस मंदिर का निर्माण सोलह सौ पचहत्तर साल पहले तत्कालिन राजा मानदेव द्वारा कराये जाने का वहाँ के शिलालेख में उल्लेख है । मंदिर के गर्भगृह में पीतल के चौकी पर साढ़े तीन फीट उँची काले सालग्रावी शिला का मूर्ति विराजमान है । अष्टभुजी देवी अपने बाएँ पैर से महिशासुर को दबाकर बधकर रही है । पैगोडा शैली के इस मंदिर का छत पीतल के धातु से निर्मित है । मंदिर में नवरात्र और चण्डी पूर्णिमा में विशेष पूजा होती है ।
इसी प्रकार गोरखा जिला का गोरखकाली भगवती, मनकामना मंदिर, इच्क्षा माई मंदिर, पोखरा का विन्दवासिनी देवी मंदिर, पोखरा का अकला देवी माई मंदिर, तालवाराही भगवती मंदिर और वागेश्वरी मंदिर, पश्चिमी नेपाल के सुर्खेत में मैनामैनी भगवती देवी मंदिर, प्यूठान का शीतला भगवती मंदिर, स्वर्गद्वारी भगवती मंदिर, नेपालगंज का वागेश्वरी मंदिर, तनहुँ जिला का छापदी वारही मंदिर, वागलूँङ्ग जिला का काली मंदिर, डोटी के शैलेश्वरी पार्वती देवी का मंदिर, कैलाली जिला के घोडा–घोडी ताल के निकट का महादेवी मंदिर, डडेलधुरा के उग्रतारा मंदिर, पाल्पा का भैरव स्थान मंदिर, मकवानपुर का चुरीया देवी मंदिर, हेटौंडा का भुटन देवी मंदिर, नवलपरासी का मौलाकाली मंदिर, दाउन देवी मंदिर, वीरगंज का गहवा माई मंदिर, वारा का सिमरौनगढ भगवती देवी मंदिर, रौतहट का गढीमाई मंदिर, जलेश्वर का राजदेवी मंदिर, जनकपुर का राजदेवी मंदिर, सिरहा का राजदेवी मंदिर, उदयपुर का पंचकन्या भद्रकाली मंदिर, सप्तरी का छिन्नमस्ता सखड़ा देवी मंदिर, राजविराज का राजदेवी मंदिर और भारदाह स्थित कंकालनी भगवती मंदिर, विराटनगर का संसारी माई मंदिर, काली मंदिर, धरान का दंतकाली मंदिर और सिंह देवी मंदिर, झापा का माइखोला भगवती मंदिर, ताप्लेजुङ्ग का पाथिभरा भगवती देवी मंदिर में नवरात्र में विशेष पूजा होती है ।
भारत के साथ तीन तरफ के साढे सत्रह सौ किलोमीटर सीमा क्षेत्र के निकट के प्रसिद्ध देवी मंदिरों में दोनों ओर के श्रद्धालुओं भक्तों पूजा करने आते हैं । खासकर शारदीय नवरात्र एवं वासंती (चैत्री दुर्गापूजा) के अवसर पर सभी देवी माता के मंदिरों में काफी भीड़ उमड़ती है ।
सत्तर के दशक में भारत के तत्कालिन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र भारी सुरक्षा घेरा के बीच शारदीय नवरात्र की नवमी तिथि को सप्तरी के प्रसिद्ध छिन्नमस्ता सखड़ा देवी भगवती माता मंदिर और भारदाह स्थित कंकालनी देवी भगवती माता मंदिर में दर्शन पूजन करने हरेक साल आते थे ।

