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सवालों के कटघरे में मुख्य न्यायाधीश चोलेन्द्र शमशेर राणा : डा. श्वेता दीप्ति

 

अपने परिवार के सदस्यों के फायदे के लिए सामने आए यह आचरण उन्हें सवालों के कटघरे में खड़ा करता है

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक- नवंबर 2021। किसी भी देश के संवैधानिक निकायों में सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण निकाय न्यायपालिका होती है । और अगर यही निकाय सवालों के घेरे में आ जाए तो इसे किसी भी देश के लिए उसका दुर्भाग्य ही माना जाएगा । किन्तु नेपाल के इतिहास में अक्सर ऐसी घटनाएँ सामने आती रही हैं, जिसने इसकी स्थिति विश्व पटल पर कमजोर किया है ।

ओली सरकार के समय जिस तरह देश के सर्वोच्च पद और कार्यकलाप पर सवाल उठे और पक्षपात का आरोप लगा वह सचमुच देश के लिए शर्मनाक था । राष्ट्रपति किसी दल विशेष का नहीं होता किन्तु ओली शासन में राष्ट्रपति के क्रियाकलापों ने स्पष्ट कर दिया था कि उनका रवैया पक्षपातपूर्ण है । और अब जिस तरह मुख्य न्यायाधीश चोलेन्द्र शमशेर सवालों के घेरे में हैं, उसने न्यायपालिका जैसे महत्त्वपूर्ण निकाय को शर्मिन्दा किया है ।

लोकतंत्र को संस्थागत बनाने में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । किन्तु आज अदालत ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है । आज मुख्य न्यायाधीश खुद एक समस्या बन गए हैं । न्यायधीश समस्या का समाधान करता है किन्तु, जो परिस्थितियाँ हैं उसमें न्यायाधीश स्वयं समस्या का हिस्सा बन गए हैं । इस देश में हमेशा कुछ–ना–कुछ अजूबा होता ही रहा है । आज इस अजूबे में यह भी शामिल हो गया है कि, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, क्षमता, निष्पक्षता और सुशासन के लिए सबसे बड़ा खतरा मुख्य न्यायाधीश से सामने आया है । मुख्य न्यायाधीश की गैर–न्यायिक गतिविधियों और गैर–न्यायिक आचरण के कारण न्यायपालिका अब सबसे बड़े खतरे में है ।

हाल ही में पूर्व न्यायाधीशों की सोसायटी द्वारा आयोजित न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति के विश्लेषण पर एक अवधारणा पत्र में, यह निष्कर्ष निकाला गया कि चोलेन्द्र शमशेर न्यायपालिका की गरिमा, विश्वसनीयता, सार्वजनिक विश्वास और स्वतंत्रता को बनाए रखने में असमर्थ साबित हुई है । नेपाल बार एसोसिएशन की कार्यसमिति की बैठक में न्यायपालिका में विकृतियों और विसंगतियों की जांच के लिए गठित समिति के संयोजक न्यायाधीश हरिकृष्ण कार्की की रिपोर्ट को लागू करने के लिए १५ दिन का अल्टीमेटम देने का फैसला किया गया तथा मुख्य न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर से मुलाकात करने और मुख्य न्यायाधीश द्वारा उठाए गए मुद्दों पर उनका गंभीरता से ध्यान आकर्षित करने का भी निर्णय लिया गया । कोर्ट से सीधा संबंध रखने वाले इन दो संगठनों के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ औपचारिक रुख अपनाने के बाद मुख्य न्यायाधीश एक और नैतिक संकट में फस गए हैं ।

जितने सवाल और आरोप उन पर लगे हैं उससे तो यही साबित होता है कि चोलेंद्र शमशेर अब मुख्य न्यायाधीश बनने के लायक नहीं हैं । और उनके पास अब दो विकल्प हैं– पहला विकल्प पद से इस्तीफा देना और दूसरा विकल्प महाभियोग का सामना करना है । यों तो जिस दिन से मुख्य न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर को बहाल किया गया था, उस दिन से ही उनके खिलाफ तरह–तरह की बातें सामने आती रही हैं । और हाल की कुछ घटनाएं इन धारणाओं और संदेहों की पुष्टि कर रही हैं । मुख्य न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर केवल एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरी न्यायपालिका के नेता हैं । किन्तु वो इस से परे जिस तरह अपने परिवार के सदस्यों के फायदे के लिए सामने आए यह आचरण उन्हें सवालों के कटघरे में खड़ा करता है । उनकी यह पदलोलुपता उनके पद की गरिमा के बिल्कुल विपरीत है । उच्च सोपानों में प्रत्येक व्यक्ति न केवल कानून बल्कि नैतिकता से भी बंधा होता है । यह मुख्य न्यायाधीश और राजनीतिक दलों के नेताओं और उच्च राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर रहने वालों पर भी लागू होता है ।

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न्यायाधीशों और अदालत के नेताओं और राजनीतिक दलों के कारण अदालत दिन–ब–दिन कमजोर और कमजोर होती जा रही है । कई बार देश में ऐसी परिस्थिति आई है जब न्यायालय द्वारा किए गए फैसले को सम्बन्धित नेताओं ने मानने से इनकार किया है और न्यायालय के निर्णय की धज्जी उड़ाई है । ऐसे में सिर्फ चोलेन्द्र शमशेर पर सवाल नहीं उठाए जा सकते क्योंकि यह परिपाटी हमारे नेताओं द्वारा ही शुरु की गई हैं । दबाव, प्रभाव और प्रलोभन के कई उदाहरण हैं, जिसके कारण मुख्य न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर जैसे पूर्व कई मुख्य न्यायाधीशों पर सवाल खड़े हुए हैं ।

आज सुप्रीम कोर्ट के नेतृत्व को बदलकर किसी और को पद सौंपा जा सकता है किन्तु क्या इससे विकृति को दूर किया जा सकता है ? यह कहना उपहासजनक होगा कि किसी व्यक्ति को हटाने से व्यवस्था के भीतर की बुराई दूर हो जाएगी । इस राजनीतिक व्यवस्था की बुराइयों का फायदा उठाकर कई चोलेंद्र सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों में प्रवेश कर चुके हैं । राज्य की जैविक अवधारणा कहती है कि राज्य की संरचना उसी तरह से निर्मित होती है जैसे मानव शरीर की संरचना । जिस प्रकार शरीर के एक अंग में खराबी आ जाती है, उसी प्रकार मानव शरीर ठीक से काम नहीं कर पाता । इस राज्य पर भी यही नियम लागू होता है । आंतरिक सत्ता संघर्ष और हित समूह राज्य सत्ता के महत्वपूर्ण अंगों और घटकों को कमजोर कर रहे हैं । कमियों को उचित प्रक्रियाओं को अपनाकर दूर किया जाना चाहिए लेकिन ऐसा करने का मौका दिए जाने पर भी उनमें सुधार नहीं किया जाता है ।

जबकि न्यायपालिका में सुधार के लिए बहुपक्षीय रणनीति अपनाई जानी चाहिए । कुछ दीर्घकालिक, कुछ मध्यम अवधि और कुछ अल्पकालिक सुधार किए जाने की आवश्यकता है । लेकिन जब पदों की बिक्री होने लगती है तब उस पद या पदधारी से न्यायसंगत बातों की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है । यहाँ सब कुछ सेटिंग से होता है करोड़ों खर्च होते हैं तो महत्त्वपूर्ण पद मिलते हैं । स्वाभाविक है कि ऐसे में उस पद के लिए दिए गए करोड़ भी उसी पद से उपार्जित किए जाएँगे और यह उम्मीद रहती है इसलिए पदों को पाने के लिए करोड़ों खर्च भी किए जाते हैं । इस स्थिति में किसी चमत्कारिक सुधार या परिवर्तन की उम्मीद करना बेमायने ही है । फिर भी जिस तरह मुख्य न्यायाधीश पर आरोप–दर–आरोप लग रहे हैं, उन्हें नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कायम रह सके । क्योंकि अगर न्यायपालिका भ्रष्ट हो जाती है, तो पूरे देश के अवैध बनने का खतरा और खत्म हो जाने का भय बना रहता है । न्यायालय लोगों के विश्वास पर आधारित संस्था है । इसकी सबसे बड़ी ताकत लोगों का भरोसा है । अब अगर कोर्ट पर से ही लोगों का विश्वास हट जाए तो आपराधिक घटनाओं पर अंकुश लगना मुश्किल हो जाएगा ।

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आज आवश्यकता है कि इस विषय पर सामुहिक रूप से आवाज उठायी जाए । क्योंकि चुप्पी प्रोत्साहन बढ़ाने का काम करती है । न्याय का विधान किसी के लिए कम या अधिक नहीं होता यह सभी के लिए समान है । और जग जाहिर है कि न्याय पक्ष किसी के दवाब में चलने वाली संस्था नहीं है बल्कि यह स्वतंत्र है और इसकी स्वतंत्रता हर हाल में कायम रहनी चाहिए । किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में न्यायिक स्वतंत्रता एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है । क्योंकि नेपाल का न्यायालय संविधान में स्वतंत्र है, व्यवहार में नहीं । यह हमेशा किसी ना किसी प्रभाव और दवाब में देखा जाता रहा है । पंचायतकाल में भी संविधान ने न्यायपालिका को स्वतंत्र नहीं बनाया था । देखा जाए तो कल न्यायालय संविधान में स्वतंत्र नहीं था, बल्कि व्यवहार में स्वतंत्र था । और आज न्यायालय संविधान में स्वतंत्र है, व्यवहार में नहीं । बावजूद इसके नेपाल की आज की जो न्यायपालिका की स्थिति है, वह पहले कभी नहीं रही है । माना जाता रहा है कि नेपाल का कानून, संवैधानिक और न्यायिक इतिहास बाकी दुनिया की तुलना में गर्व का विषय है । किन्तु क्या आज हम यह कह सकते हैं ? यह सच है कि हमारा संविधान कमजोर नहीं है, उसके क्रियान्वयन में हम कमजोर हैं ।

नेपाल की न्यायायिक व्यवस्था पर समय दर–समय–सवाल उठते आए हैं । चोलेन्द्र शमशेर कोई नया नाम नहीं जिस पर आरोप लगे हैं । इससे पहले भी खिलराज रेग्मी, गोपाल पराजुली और दीपक जोशी जैसे नाम इस सुची में शामिल हैं । खिल राज रेग्मी को जब प्रधान मंत्री बनाया गया था, तब वे इस देश के मुख्य न्यायाधीश के पद पर थे । उन्हें पद से हटाया नहीं गया और दो निकायों (न्यायालय और कार्यकारी) का प्रमुख बना दिया गया । खिलराज जब सत्ता में आए तो कोर्ट में सिर्फ पांच जज बचे थे । उन्होंने समय पर नियुक्ति भी नहीं की । यदि नियुक्ति समय पर होती तो वर्तमान व्यक्ति (चोलेंद्र) की नियुक्ति की संभावना कम होती । उसके बाद जो भी आए उसमें कोई अपवाद नहीं थे सभी किसी ना किसी प्रकरण में लिप्त ही थे । गोपाल पराजुली के समय में जो कुछ हुआ वह सबने देखा था । हालाँकि, जिस तरह से पराजुली को निष्कासित किया गया था, वह कानून के शासन द्वारा उचित नहीं था ।

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गोपाल पराजुली और दीपक राज जोशी के बाद चोलेंद्र को नियुक्त किया गया था । और आज उन्हें हटाने की माँग की जा रही है । जबकि वो जब आए थे तो कई उम्मीद और संभावनाएँ उनसे की जा रही थी । किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं । उनके आने के बाद से अगर देखा जाए तो कई घटनाएँ हैं जिसे देख कर यह कह सकते हैं कि इससे पहले इतने बड़े पैमाने पर न्यायालय परिसर में विकृतियाँ और भ्रष्टाचार हावी नहीं हुए थे । उन्होंने स्पष्ट रूप से अदालत में गुट का समर्थन किया । अपने गुट की रक्षा करना, इसी तरह के मुद्दों को उठाना और बाकी की अवहेलना करना यह वो करते आए हैं ।

आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी ने खुद लिखित में कहा कि कोर्ट में भ्रष्टाचार है । समिति ने न केवल न्यायालय में भ्रष्टाचार, बल्कि स्वयं न्यायालय द्वारा गठित जांच रिपोर्ट में भी कहा है कि कुछ न्यायाधीश भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं ।
ऐसे में उनका इस्तीफा देना ही तर्क संगत और न्याय संगत है । जहाँ तक न्यायपालिका में सुधार की बात है तो न्यायपालिका के स्थायी सुधार के लिए न्यायिक परिषद के ढांचे में बदलाव किया जाना चाहिए । राजनीति और भ्रष्टाचार के लिए प्रतिबद्ध लोगों को अदालत में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए । किन्तु यह भी सच है कि जब ऊपर से नीचे सब कुछ भ्रष्टाचार से लिप्त हो तो किसी भी सुधार की अपेक्षा रखना हथेली पर दूब उगाने की तरह ही कठिन है ।

Shweta Deepti डा. श्वेता दीप्ति
डा. श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी । पूर्व अध्यक्ष- केन्द्रीय हिंदी विभाग, त्रिविवि ।

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