शिक्षाविद् मंगल प्रसाद साहू (मंगल मास्टर साहेब) का संक्षिप्त परिचय

सच्चिदानन्द चौबे:एक महान कर्मयोगी, महान व्यक्तित्व का धनी, स्वाभिमानी एवं अपने सिद्धान्त के पक्के, अनुशासन प्रिय, सादा भोजन उच्च विचार के पालन करने वाले सामान्य शारीरिक सौष्ठव चेहरे पर गम्भीरता, चमकीले नेत्र, श्याम वर्ण, एक दो दाँत पंक्ति से कुछ आगे उभरे हुये, गर्मी में खद्दर की धोती जो घुटने तक होती थी, हाफ कमीज, और जाडेÞ में रुइहा, या कभी कोट धारण करने वाले, पैरों में सामान्य पम्प शू धारण करने वाले एक विलक्षण व्यक्तित्व की मुखाकृति आज भी ध्यान में घूमा करती हैं ये थे हमारे प्रारम्भिक गुरु मंगल प्रसाद मास्टर साहेब । मंगल प्रसाद मास्टर साहेब का जन्म बि.सं. १९६२ साल जेष्ठ ११ गते सामान्य व्यापारी परिवार में माता अंजनी साहू की कोख से हुआ था, पिता रघुवर साहू का पुस्तैनी घर लखनऊ में था । मास्टर साहेब के बडे भाई मूलचन्द साहू अपने पिता के साथ नेपालगन्ज में रहते थे और मंगल प्रसाद मास्टर साहेब लखनऊ में अपने चाचा के साथ रहकर प्रारम्भिक शिक्षा पाई बाद में नेपालगंज आकर आपने निकटवर्ती जिला बहराईच नानपारा के सहादत इन्टर कालेज से मिडिल पास किया ।
आप हिन्दी, अंगे्रजी, संस्कृत एवं उर्दू भाषा के ज्ञाता थे, आपका प्रिय विषय गणित था । आपने अपना पुस्तैनी पेशा नहीं अपनाया उन्होंने नगर में एक सुनियोजित शिक्षा देने का विचार किया उस समय पं. भगवानदीन चौबे की गुरु पाठशाला एवं चूणामणि रेग्मी एवं ढुनमुन मास्टर की भाषा पाठशाला चल रही थी, संस्कृत भाषा के विद्वान जगदेव पंडित, पं. वासवा नन्द, पं.वासुदेव भट्ट अपने–अपने संस्कृत, कर्मकाण्ड, ज्योतिष की शिक्षा दे रहे थे परन्तु ये सारे शिक्षालय एक कोचिंग सेन्टर जैसे थे । इन्होंने घसियारन टोल में अपना गोदाम खाली कराके उसे सफाई कराके ऊपरी तल्ला में कुछ मेज कुर्सी बेञ्चों की व्यवस्था करायी नीचे तल्ले में टाट पट्टी बोरा बिछवाया और बि.सं. १९८५ में इसी भवन अपना विद्यालय खोला जो मंगल प्रसाद मास्टर साहेब के विद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
इस विद्यालय में प्रवेशिका से लेकर कक्षा ५ तक की पढ़ाई हिन्दी माध्यम से होती थी । प्रारम्भ से कक्षा २ तक की पढ़ाई काठ की पाटी में होती थी, एक ४ पेज की किताब होती थी जिस का नाम मोहल्ला था जिस में हिन्दी–अंगे्रजी के स्वर व्यञ्जन अक्षर, १ से सौ तक की गिनती १ से २० तक पहाड़ा, २०–२० तक पौवा –अद्धा, पौना, सवैया, ड्योढा, अढैया, विकट पहाड़ा, बड़ा एकन्ना, ढ्योंचा, प्योंचा, होता था, इसका ज्ञान हो जाने पर–खुुुसकती (सुलेख) इमला बोला जाता था कक्षा २ के वाद हिन्दी की बेसिक रीडर, अंग्रेजी की किंग रीडर पुस्तक पढ़ाई जाती थी, कक्षा ५ में ‘चक्रवर्ती’ गाणित की किताब, व्यवहार गणित एवं इग्लिंश ट्रान्सलेसन ग्रामर आदि की पढ़ाई होती थी, विद्यालय चल निकला प्रत्येक कक्षा में औसत ३०–४० विद्यार्थी आने लगे लड़कियों की संख्या बहुत ही न्यून थी, मास्टर साहेब केवल कक्षा ५ से हर विषय पढ़ाते थे बाकी कक्षाओं के लिये अन्य ४–५ शिक्षक रखे थे । इस विद्यालय में हिन्दू–मुस्लिम एवं पहाड़ी सभी वर्ग के बच्चे पढ़ते थे ।
मास्टर साहेब ने बाद में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विद्यालय रुपईडीहा केन्द्र से प्रथमा–मध्यमा एवं शास्त्री की परीक्षा व्यक्तिगत पास की बाद में लोग मंगल प्रसाद शास्त्री भी कहने लगे । विद्यालय में फीस महीने में १ आना से ५ आना तक कक्षा क्रमानुसार थी । इसी से शिक्षकों को मेहनताना मिलता था । उस समय १ पायी का भी मूल्य था तीन पायी का १ पैसा ४ पैसे का १ आना और दो पैसे की अधन्नी ४ पैसे की एकन्नी, ८ पैसे की दुअन्नी, १६ पैसे की चवन्नी, ३२ पैसे की अठन्नी और ६४ पैसे का रुपया चलता था । नेपाली रुपये की कीमत दस आना के बराबर थी । मास्टर साहेब अपने निःस्वार्थ सेवा के कारण एक महान व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाने लगे ।
६–७ वर्ष की आयु में मास्टर साहेब मातृ–पितृ विहीन हो गये अपने बडेÞ भाई मूलचन्द के साथ रहकर उन्होंने अपना प्रारम्भिक जीवन बिताया, आपका विवाह हुवा, दो पुत्रियां हुई जिनसे नाती, नातिनी आज भी हैं । आपको अपने माँ–बाप की छत्र छाया, प्रेम दुलार नहीं मिला अतः आप ऊपर से नारियल जैसे कठोर दिखते थे परन्तु भीतर आपके एक दया से भरा हुवा निश्छल पवित्र हृदय था । कठोर अनुशासन के मामले में वे प्रसिद्ध थे । राणा शासन काल में शिक्षालय चलाना बड़ा दुष्कर कार्य था । मेरी ३ तक की प्रारम्भिक शिक्षा भारत के रायबरेली जनपद में हुई और सन् १९४७–१९४८ में आपके विद्यालय में हुई कक्षा ४–५ मैंने यहीं से पास किया । आप अनुशासनहीन विद्यार्थियों को कड़ी सजा देते थे कुँवा में बाँधकर लटका देना, नंगा करके मुर्गा बनाकर ठण्ढे पानी से नहलाना, गरम टीन के पत्ते पर नंगा करके बैठा देना, बेंत से मारना, उठक बैठक कराना, जैसे दण्ड उस समय थे । जिन्हें देखकर कोई गलत हरकत नहीं करता था । भारत में कक्षा ६ से अँग्रेजी की पढ़ाई शुरु होती थी परन्तु इनके यहाँ कक्षा तीन ही से अँग्रेजी पढ़ाई जाती थी कक्षा ५ पास करके मैं सन् १९४८ में वैशवाडा इन्टर कालेज लालगंज में पढने गया, कक्षा ६–७–८ पूरे पाण्डेय रायबरेली मेेंं पढकर नारायण इन्टर कालेज नेपालगन्ज में सन् १९५५ में कक्षा नौं में भर्ती हुवा सन् १९५६ में हाई स्कूल पास करके नार्मल शिक्षा तालीम किया । तालीम में प्रैटिक्स टीचिंग के लिये मुझे मास्टर साहेब के विद्यालय में भेजा गया ।
बि.सं. २०१३ साल में विद्यालय इसी पुराने ही भवन में चल रहा था । नारायण शिक्षा प्रसार के तमाम विद्यालय खुल चुके थे सरकार द्वारा प्रायमरी विद्यालयों को वार्षिक १८००÷– रुपया का कक्षा ६ से ८ कक्षा तक निम्न माध्यमिक का रुपया ३६००÷– माध्यमिक विद्यालय का रुपया ७२००÷– अनुदान मिलता था, इसी से शिक्षकों को वेतन दिया जाता था प्रायमरी शिक्षकों का मासिक वेतन ४०÷–रुपया, निम्न माध्यमिक का ५०÷–रुपया, हाई स्कूल का ८०÷–रुपया, विज्ञान–गणित के शिक्षकों को रु. ५÷– अधिक मिलता था ।
मंगल विद्यालय की नई बिल्डिंग का शिलान्यास बाँकी बगिया के उत्तर चौधरी सरकार बक्स की जगह के पास की गई । विद्यालय के दक्षिण की जगह धान के खेतों से घिरी थी अतः चौधरी–एवं अन्य लागों से अगल बगल की जगह विद्यालय के नाम कर दी गई । विद्यालय निर्माण के लिए मास्टर साहेब किसी के आगे हाथ फैलाने नहीं गए । विद्यालय की आय का कोई श्रोत नहीं था । विद्यालय निर्माण की गति बहुत धीमी थी, उसी समय महेन्द्र सरकार की नेपालगन्ज में सवारी हुई ।
नेपालगन्ज के निवासी ललित चन्द बाबू विद्यालय के अध्यक्ष थे राजा महेन्द्र के भी निकट थे अतः उन्होने विद्यालय परिसर में राजा की सवारी कराई राजा की तरफ से विद्यालय के लिये कुछ अनुदान देने की इच्छा व्यक्त की गई मंगल मास्टर साहेब ने कहा राजा साहेब यह–हाथ किसी के आगे नहीं फैलाया है, सरकार का विद्यालय है जो चाहें आप दे ले हम याचना नहीं करेंगे, राजा ने ललित बाबू की ओर देखा पूछा वहाँ के भनी राख्नु भएछ । ललित बाबू ने बात सम्हाली उन्होंने कहा सरकार वहाँ बहुतै स्वाभिमानी व्यक्ति हुनु हुन्छ वहाँले भन्नु हुन्छ म माग्ने छैन सरकारले केही दी बक्सनु हुन्छ भने मलाई आपत्ति छैन राजा उनकी निर्भयता एवं निडरता से बहुत प्रभावित हुये और बाद में उनके अथक परिश्रम त्याग स्वाभिमान एवं निर्भयता से प्रभावित होकर “गोरखा दक्षिण बाहु” की उपाधि देकर सम्मानित किया । विद्यालय कक्षा ६ से १० तक नई बिल्डिंग में खुला मगर प्रारम्भिक विद्यार्थियों के अभाव के कारण विद्यालय शून्य की स्थिति में पहँच गया, तत्सामायिक बडा हाकिम द्वारिका दास श्रेष्ठ ने विद्यालय की दशा के प्रति चिन्तित थे उन्होंने विद्यालय को सरकारी बनाने की सिफरिस की, शिक्षा विभाग के अनुदान से विद्यालय के उत्तर गेट तक की खाली जगह में नमूना प्राथमिक पाठशाला का निर्माण हुआ कक्षा १ से ५ कक्षा तक सरकारी अनुदान से विद्यालय सञ्चालन हुवा शिक्षक रामगोपाल अग्रवाल, घनश्याम प्रसाद वर्मा, चेतराम शर्मा, आदि नियुक्ति किये गये उधर विद्यालय को व्यवसायिक विद्यालय बनाने का प्रयास जारी रहा । बि.सं. २०१६ से इस जिला में एस.एल.सी.परीक्षा लागू हुई, अब तक हाई स्कूल तक की पढाई हिन्दी माध्यम से यू.पी.बोर्ड के पाठयक्रम से सञ्चालित थी, विद्यालय में प्रायोगिक शिक्षा काष्ठ कला, कृषि लेखा आदि विषय की पढाई प्रैटिक्स होने लगी उसके लिये विषय शिक्षकों की नियुक्ति हुई ।
बिद्यालय का नाम अंग्रेजी में मल्टी परपज हाई स्कूल एम.पी. हाई स्कूल रखा गया इस अंग्रेजी नाम की बड़ी आलोचना एवं विरोध हुवा अतः विद्यालय का नाम मंगल प्रसाद व्यवसायिक माध्यमिक विद्यालय हुआ । व्यवसायिक विद्यालय में पू. ८०० सौ में ४०० अंक व्यवसायिक विषय के लिये किये गये । वि.सं. २०२९ साल में नई शिक्षा योजना लागू हुई । शिक्षा निर्देशनालय की स्थापना हुई नरसिंह नारायण निर्देशक होकर आये नारायण हाई स्कूल में सभी प्र. अ., विद्यालय अध्यक्षों एवं वरिष्ठ शिक्षकों का समागम हुआ जिसमें निर्देशक जी द्वारा नई शिक्षा योजना के बारे में उन्होंने पूर्ण प्रकाश डाला । अन्त में नारायण विद्यालय के अध्यक्ष श्री कृष्ण गोपाल टण्डनजी ने नई शिक्षा योजना की खामियों पर अपना मन्तव्य प्रकट किया उन्होंने कहा‘ शिक्षा’ कभी नई पुरानी नही होती, शिक्षा देने की प्रणाली नई पुरानी होती है । यह प्रणाली विकसित देशों के लिये उपयुक्त है परन्तु हमारे देश के लिये यह उपयुक्त नही है ।
उन्होंने इसके भावी समय के प्रभाव के बारे में प्रकाश डाला । वही पर निर्देशक जी से मेरी भेंट हुई । उन्होंने मुझ से टण्डन जी के अलावा शिक्षा क्षेत्र में अनुभवी और कौन व्यक्ति है पूछा मैंने “मंगल प्रसाद मास्टर साहेब” नाम बताया, उन्होंने उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की दूसरे दिन वे मेरे साथ मास्टर साहेब के पुराने विद्यालय में मिलने गये मास्टर साहेब से मैने उनका परिचय कराया दोनों लोगों ने एक दूसरे से हाथ जोड़कर अभिवादन किया । निर्देशक जी बोले मैं आपसे कुछ सीखने आया हूँ –मास्टर साहेब बोले ठीक है मैं आपको अवश्य सिखाउँगा । निर्देशक जी ने नयी शिक्षा योजना के बारे में पूछा –मास्टर साहेब ने अपना मन्तव्य प्रकट किया । निर्देशक जी मेरे विचार से यह – गदहा लाद योजना है । बच्चों के वजन से अधिक उनकी किताबों का बैग, विद्यार्थी का बस्ता लेकर एक आदमी उसे विद्यालय छोड़ने जाय । इधर देखो मेरे यहाँ छोटे बच्चों के पास एक पाटी या स्लेट के अलावा कुछ भी नहीं है फिर भी आपकी नई योजना के लड़कों से बेहतर ज्ञान है । कितनी मंहगी शिक्षा है मेरा विचार यह है कि पढ़ाई मातृ भाषा में हो, भाषा और गणित की नींव गहरी हो इसके लिये इतनी पुस्तकों की आवश्यकता नहीं होगी मुझे इससे क्या लेना देना ।
योजना लागू होने से पूर्व नारायण और मंगल दोनों विद्यालयों ने खेलकूद जगत में अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित की थी । बि.सं. २०२९ साल के बाद अन्र्तमाध्यमिक खेल प्रतियोगिता के लिये सरकार की तरफ से बीरेन्द्र शील्ड प्रतियोगिता लागू हुई । इस विद्यालय से फुटवाल के खिलाड़ी और बुहत से एथलीट्स निकले । इस विद्यालय में अपने जीवन का अमूल्य समय देकर शिक्षा दान देने वाले कुछ शिक्षकों का नाम मैं उद्धृत करुंगा ।
संस्थापक– मंगल प्रसाद शास्त्री, प्रधानाध्यापक अनिरुद्ध सिंह एवं अध्यक्ष बासुदेव शर्मा का योगदान सराहनीय रहा । इसके अलावा भरतराज शर्मा, श्री कृष्ण प्रसाद आचार्य, ओम बहादुर सिंह, केशरी कुमार मिश्र, राधेश्याम शर्मा, महाबीर प्रसाद शर्मा, मोहम्मद इसहाक सिद्दिकी, मोहम्मद शकूर कुरैशी, चन्द्र प्रकाश उपाध्याय, पशुपति प्रसाद उपाध्याय, डिल्लीराज पाण्डेय, इन्द्रमणि मानव, महाबीर प्रसाद गुप्ता, ललित सिंह सिजापति, केशव सिंह सिजापति, देबू बहादुर श्रेष्ठ, रुद्रपति लाल कर्ण, भगवती प्रसाद द्विवेदी, राम बहादुर शाक्य, माधुरी श्रेष्ठ, गंगा शर्मा, सुशीला शर्मा, गुलाफ मैंया श्रेष्ठ, भुवन रत्न कंसाकार, शिवरत्न शाक्य, सरोज लता प्रधान, बिपुला शर्मा, जगदीश प्रसाद शर्मा, चेतराम शर्मा, गजराज सिंह, मोहम्मद हनीफ सिद्दिकी, रसूल अहमद, नजीर अहमद अन्सारी, शिव कुमार मिश्र, निर्मल कुमार अर्याल, राम स्वरुप मण्डल, घमान सिंह बस्नेत, मेवालाल श्रीवास्तव, मोहम्मद रज्जाक, भोजराज शर्मा, चन्द्रमान श्रेष्ठ, हफीजुल्लाह खाँ, पुराण प्रसाद शास्त्री, हरीराज शर्मा, टीकाराम शाही, बिष्णु प्रसाद शर्मा, संकटा प्रसाद पाठक, दुर्गा प्रसाद गुप्ता, सुरेन्द्र नाथ शुक्ल, मोहम्मद अकबाल, इखलाख हुसेन, मोहम्मद नसीम, बिजय कुमार श्रीवास्तव, लक्ष्मी श्रेष्ठ, आरती चटर्जी, दुर्गा बस्नेत, श्रीमती पर्शुराम शर्मा, जयकेश सिंह, बिष्णुमान श्रेष्ठ, जितेन्द्र सिंह, अम्बिका प्रसाद वर्मा, अरुणलाल श्रेष्ठ, बिश्वनाथ चौबे, कल्पना सुवेदी, सुशील कुमार वर्मा, अब्दुल समद, सारेन्स श्रीवास्तव, सरिता शर्मा, उमा लक्ष्मी, बिमला शर्मा, दुर्गा बहादुर थापा, शाकीर हुसेन, सुधा कर्ण, कल्पनाथ तिवारी, शशीकला राई, कन्हैयालाल राना, मदनलाल श्रेष्ठ आदि । उपयुक्त शिक्षकों का इस विद्यालय के उत्तरोत्तर बिकास में सहयोग रहा है ।
अन्य आगे मास्टर साहेब के साथ बिताये कुछ पलों का संस्मरण लिख रहा हूँ । वैसे तो उनके बहुत कारनामें हैं परन्तु अपने साथ व्यतीत किये कुछ का वर्णन कर रहा हूँ । – यह उस समय की बात है महेन्द्र पुस्तकालय में वहाँ के अध्यक्ष के रूप में रहे नगर के गणमान्य व्यक्ति केदार नाथ टण्डन जी की शोक सभा थी करीब १०० जाने माने व्यक्तियों को आमन्त्रित किया गया था जिसमें मास्टर साहेब भी गये थे, कुल २०–२५ लोगों की उपस्थिति थी शोक सभा समाप्त होने पर मुझसे मिले और बड़े गम्भीर भाव से पूछा सच्दिानन्द एक बात मुझको खटक रही है कि बजार के इतने जाने–माने व्यक्तित्व, व्यापार संघ, महेन्द्र पुस्तकालय एवं विभिन्न संघ, संस्था एवं प्रतिष्ठानों में रहते हुये अपना अमूल्य समय दिया, पैसा दिया, ऐसे व्यक्ति की शोक सभा में इतनी न्यून उपस्थिति देखकर मुझे लगता है कि मेरे मरने पर कोई नही आयेगा ? मैने कहा मास्टर साहेब मैं औरों की तो नहीं कहता मगर मैं नारायण विद्यालय के समस्त शिक्षक, विद्यार्थी आपके अन्तिम प्रयाण मे सम्मिलित होंगे अगर मैं जीवित रहा । आप शतायु हों यही मेरी कामना है आपको लोग सदियों तक याद करते रहेगे यह लेख आज मैं बि.सं. २०७८ साल भाद्र में पड़ने वाले अन्र्तराष्ट्रीय शिक्षक दिवस पर लिखकर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अपर्ण कर रहा हूँ– आपका निधन २०४५साल जेष्ठ २ गते एक साधारण बिमारी के बाद हो गया ।
मास्टर साहेब की उदारता का एक और उदाहरण प्रस्तुत है ः–
यह घटना सन् १९७४ की है मेरे पिता जी ने मेरी बहिन की शादी भारत में उत्तर प्रदेश जिला उन्नाव में तय करके वहाँ से मुझे टेलीग्राम किया चार हजार रुपये की व्यवस्था करके तुरुन्त चले आवो बहिन का तिलक चढाना है । समय बहुत कम था बड़ी मुश्किल से एक हजार की व्यवस्था कर पाया । कई जगह भटका ट्यूशन जहाँ पढ़ाता था बड़े धनी लोग थे परन्तु संवेदना नहीं थी दुनिया की बातें पूछते पैसा क्या करोगे ? कब लौटावोगे ? बदले में क्या रखोगे ? आदि तर्क वितर्क करके टाल देते । इसी उधेड़वुन में सोचता हुआ नारायण विद्यालय से बाहर आया– नेपाल बैंक लिमिटेड के सामने मास्टर साहेब से भेंट हो गई मैने अभिवादन किया मास्टर साहेब मेरी मनोदशा को समझ गये और बोले क्या वात है बेटा ? बडेÞ उदास लगते हो मैने अपनी उदासी का कारण बताया उन्होंने तुरन्त अपनी जेब में हाथ डाला और भारु चार हजार रुपये मुझे दे दिया, कहा आज मुझे ये रुपये तम्हारे लिये ही ईश्वर ने उपलव्ध कराये हैं जाओ बहिन की शादी करो, जब तुम्हारे पास हो तो लौटा देना – बच्चों का पेट काटकर पैसा मुझे न देना । शादी हो गई धीरे–धीरे दो हजार मैंने वापस कर दिये दो हजार रुपये मेरी दूसरी बहिन की शादी में व्यौहार के रूप में देकर मुझे उऋण कर दिया । उन्हें मैं कभी विस्मरण नहीं कर सकता । उनकी परम आत्मा को शत् शत् प्रणाम ।
– नेपालगन्ज–११ भवानीबाग, नेपालगन्ज(बाँके)

