30 नवम्बर मंगलवार को हस्त नक्षत्र व आयुष्मान योग में उत्पन्ना एकादशी
1 दिसबर बुधवार को सौभाग्य योग में प्रातः 7 से 11:30 तक पारणा:-
वर्ष पर्यन्त या जितना संभव हो उतने एकादशी करने के लिए इस दिन व्रत करने से सम्पूर्ण एकादशी का उद्गम होता है। यह एकादशी पूर्ण नियम, श्रद्धा व विश्वास के साथ अवश्य आरम्भ किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव सभी दोषों से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत को आरम्भ एकादशी भी कहा जाता है। इससे मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थ स्नान व दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है। इस दिन के उपवास से पवित्रता के साथ साथ मन निर्मल और शरीर शुद्ध और स्वस्थ होता है। कार्तिक के प्रबोधन जागरण के बाद इस दिन भगवान प्रजा पालन का कार्य आरंभ किये थे।
*उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा:-*
सतयुग में चंद्रावती नगरी में नाड़ीजंग नामक राजा आसुरी वृति से राज्य किया करता था। जिसका मुर नामक उनका एक पुत्र था। मुर बहुत ही बलशाली दैत्य था। उसने अपने पराक्रम के बल पर समस्त देवताओं को त्रस्त कर दिया। इंद्र आदि सब देवताओं को स्वर्गलोक से खदेड़कर वहां अपना अधिकार जमा लिया। कोई भी देवता उसके पराक्रम के आगे टिक नहीं पाता था। इसके बाद देवताओं ने भगवान विष्णु के पास जाकर दैत्यों के अत्याचारों से मुक्त करने की प्रार्थना की। देवताओं के अनुरोध पर भगवान श्री विष्णु ने दैत्य पर आक्रमण कर दिया। हजारों वर्षों तक युद्ध चलता रहा और इस क्रम में सैकडों असुरों को मारने के बाद भगवान विष्णु को नींद आने लगी और वे बद्रीकाश्रम स्थित बारह योजन लम्बी सिंहावती गुफा में जाकर निद्रा में लीन हो गए। उनको मारने के खयाल से मुर भी गुफा में चला आया। भगवान विष्णु को सोते हुए देखकर उन पर वार करने के लिये मुर ने जैसे ही हथियार उठाये भगवान विष्णु के शरीर से एक सुंदर कन्या प्रकट हुई। इसके बाद दैत्य तथा कन्या में काफी देर तक युद्ध होते रहा और इस बीच उस कन्या ने दैत्य को धक्का मारकर मूर्छित कर दिया और उसका सिर काट दिया, जिससे दैत्य की मृत्यु हो गई। जब श्री विष्णु भगवान निद्रा से उठे तो देखा की दैत्य मरा हुआ है तब वे सोचने लगे की इस दैत्य को किसने मारा। उस वक्त कन्या ने कहा कि दैत्य आपको मारने के लिये तैयार था तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इसका वध कर दिया। भगवान श्री विष्णु ने उस कन्या का नाम एकादशी रखा क्योंकि वह एकादशी के दिन श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी इसलिए इस दिन को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाने लगा। *भगवान विष्णु ने एकादशी को वरदान दिया कि आज से प्रत्येक मास की एकादशी का जो भी उपवास रखेगा उसके समस्त पापों का नाश होगा और विष्णुलोक में स्थान मिलेगा।*
*एकादशी उपवास आज से आरम्भ करना चाहिए जो श्रद्धालु एकादशी का उपवास नहीं रखते हैं और इस उपवास को लगातार रखने का मन बना रहे हैं तो उन्हें मार्गशीर्ष मास की कृष्ण एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से इसका आरंभ करना चाहिये क्योंकि इसी एकादशी से इस व्रत का प्रारंभ माना जाता है।*
उत्पन्ना एकादशी व्रत व पूजा विधि:-
एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि के दिन नहाय खाय से आरम्भ कर दशमी तिथि को सायंकाल भोजन करने के पश्चात अच्छे से साफ-सफाई कर लें। रात्रि को बिल्कुल भी भोजन न करें। ज्यादा बातचीत कर अपनी ऊर्जा व्यर्थ न करें और रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। नित्य क्रियाओं से निपटने के बाद स्नानादि के बाद भगवान की पूजा करें, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।। मंत्र का जप करें और कथा सुनें। इस दौरान पूरे दिन व्रती को बुरे कर्म करने वाले, पापी, दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। रात्रि में भजन-कीर्तन करें और जाने-अंजाने हुई गलतियों के लिये भगवान विष्णु से क्षमा मांगे। द्वादशी के दिन प्रात:काल ब्राह्मण या किसी गरीब को भोजन करवाकर उचित दान दक्षिणा देकर फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये। नियम पूर्वक किया गया उपवास बहुत ही पुण्य फलदायी होता है।
*श्री हरि विष्णु सभी भौतिक दुखों से मुक्त कर उत्तम जीवन प्रदान करें।*

*आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
*✍🏻 ज्योतिषाचार्य आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
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