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अनोखा गठबंधन : मुकेश भटनागर

 

मुकेश भटनागर, होली का पर्व समीप आ रहा था पर विजय का मन कुछ अनमना सा चल रहा था। वह पहले की तरह उत्साहवर्धक नहीं था। शायद कुछ महीने पहले मां का स्वर्गवास हो जाना, एक कारण रहा हो। विजय इस बार की होली पर किसी शान्त जगह पर जाने का मन बना रहा था। परिवार के दूसरे सदस्य भी राज़ी हो गये।‌ दिल्ली के नजदीक नैनीताल जाना सबको अच्छा लगा। दक्षिण भारत में बोर्डिंग में पढ़ रहा उसका बड़ा बेटा भी एक साल बाद घर आया हुआ था।

विजय ने अपने घनिष्ठ मित्र रवि से भी बात करी की वह भी साथ हो ले पर किसी आवश्यक कार्य की वजह से रवि ने असमर्थता जताई । लेकिन मित्र आखिर मित्र होता है रवि ने विजय की संवेदनशीलता देखते हुए, अपनी कार, ड्राइवर के साथ दे दी। विजय के लाख मना करने पर भी रवि ने उसकी एक न सुनी और तीस साल की दोस्ती का हवाला देता रहा। आखिर विजय ने रवि की पेशकश स्वीकार कर ली।‌

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होली से एक दिन पहले विजय, अपनी पत्नी व दोनों बेटों के साथ दिल्ली से रवाना हुए और शाम होते होते वे सब नैनिताल पहुंच गए। परन्तु वहां का नजारा कुछ और ही पाया। छुट्टियों में भारी संख्या में सैलानियों के आगमन से होटल में जगह मिलना मुश्किल हो गया। ड्राईवर ने नैनी झील के समीप पब्लिक पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर दी और अच्छा सा होटल ढूंढने में मदद करने लगा। विजय ने एक होटल में बातचीत करी और दो दिन का एडवांस भी तुरन्त जमा कर दिया। ड्राईवर और बच्चे दूर पार्किंग में खड़ी गाड़ी से समान लेने चले गए। तभी विजय को पता चला उस होटल में ड्राईवर के लिए न तो कमरा है न ही कोई व्यवस्था। होटल मैनेजर बोला अरे यह लोग तो गाड़ी में ही सो जाते है। यह बात विजय को अच्छी नहीं लगी। उसने दूसरा होटल लेना का फैसला किया पर मैनेजर ने लिया हुआ एडवांस वापस करने से मना कर दिया। विजय बहस में पड़ने के बजाय, दूसरी तरफ़ रुख़ किया।‌ वहां खड़े दूसरे ड्राइवर और होटल एजेंट यह सब देख सुन रहें थे। एक दूसरे होटल मालिक को जब ड्राईवर के लिए एडवांस छोड़ देने का पता लगा तब उसने अपने होटल का बेहतरीन कमरा जो झील के सामने ही पड़ता था डिस्काउंट के साथ दे दिया और ड्राईवर के लिए जगह भी मुहैया करवा दी।

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अगले दिन नैनिताल की माल रोड पर होली का आलम ही कुछ और था। बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे व उनके माता-पिता और अभिभावक नाचते गाते गुलाल उड़ाते हर तरफ नजर आ रहे थे। शिष्टाचार के नाते वह सभी बड़ों के पैर छूते और चरणों में गुलाल रखते।‌ चारों तरफ पहाड़ियों के बीच से रंग बिरंगा उड़ता हुआ गुलाल एक अलग छटा बिखेर रहे थे और झील पर दौड़ती रंग बिरंगी नौकाएं और भी चार चांद लगा रही थी। पहाड़ी लोक संगीत की धुनें चारों तरफ गुंज रही थी।

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विजय पहाड़ी होली की मधुर यादें लिए वापस दिल्ली आ गया। ड्राईवर को जब वह बक्शीश देने लगा तो उसे न लेते हुए अचानक विजय के गले लग गया और बोला – “अरे साहब इस बार की होली तो मेरे लिए ईद बन गई” – और उसकी आंखों में आंसु आ गये। विजय के बेटों को भी तब तक नहीं पता था की जिसे वह अभी तक भैया भैया कह रहे थे वह अनीज़ भाई निकला। अनीज़ बोला साहब जैसा आपने किया ऐसा तो कोई अपना सगा भी नहीं करता। उसने फिर ऐसी बात कह दी जो सबके दिल को छू गई – “साहब, धर्म से हम चाहे अलग हो पर इंसानियत से इंसानियत का गठबंधन जरूर होना चाहिए, आपके साथ बीते यह दिन मुझे हमेशा याद रहेंगे”।

मुकेश भटनागर*
*वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं समाज सेवी*
*दिल्ली, भारत से*

मुकेश भटनागर
12.1.2022

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