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उज्जैन के साहित्यकार डॉ वैरागी की नेपाल यात्रा

 

नेपाल यात्रा, 6,7और 8 जनवरी 2022 को काठमांडु, नेपाल यात्रा, भाग-१

विषम परिस्थितियों और विषय समय में दिनांक 6,7 और 8 जनवरी 2022 को काठमांडु, नेपाल यात्रा का सुखद संयोग बन गया। एक तरफ जहाँ सारी दुनिया में कोरोना या ओमिक्राम को लेकर जहाँ स्थितियाँ चिंताजनक है वहीं दुसरी और इस तीसरी लहर के नुकसान कम होने के दावे भी किये जा रहे है। इस विपरित दौर और विपरित परिस्थिति में मैनें तो अपना मन बनाया और कोरोना प्रोटोकाल का पुरी तहर पालन कर भारत से जाने व नेपाल से लौटने के समय पर अपना आरटीपीसीआर टेस्ट करवाकर (दोनो ही टेस्ट निगेटिव) यात्रा की। ज्यादातर पहाड़ी इलाके में बसा नेपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता व ऐतिहासिक व पौराणिक संस्कृति व आख्यानों के लिए दुनियाभर में मशहुर है। मेरी इस साहित्यिक यात्रा के पिछे नेपाल में आगामी समय में आयोजित होने वाले साहित्यिक व सांस्कृतिक आयोजन के पुर्व संक्षिप्त अध्ययन व साहित्याकारों से भेंट सहित अन्य आयोजन में सहभागिता करना था।

यात्रा के दुसरे दिन काठमांडु के विभिन्न धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण योजनानुसार बुद्धनाथ स्तुप, स्वयंभुनाथ तथा कुमारी देवी दर्शन स्थल को देखने का अवसर मिला। इसी दिन नेपाल के साहित्यकारों से भी भेंट करना थी और मुझे ही दो-तीन हिंदी/नेपाली साहित्यकारों के पास जाना था, जिसके लिए मैने पुर्व में समय ले लिया था, सभी से उनके कार्यालयों में सौजन्य भेंट करना थी। लेकिन दिनभर अलग-अलग जगहों पर घुमने में ही सारा दिन खत्म हो गया और अब शाम हो गई थी। मतलब साफ था कि अब मुलाकात का दौर अगले दिन आयेगा। लेकिन यहां एक नई समस्या खड़ी हो गई थी, हमारे भारत में जैसे रविवार को शासकीय अवकाश होता है, उसी तरह नेपाल में शनिवार को शासकीय अवकाश होता है, इस दिन सभी सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ आम बाजार भी लगभग बंद होता है।

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लेकिन सौभाग्य कि, अगले दिन यानी 7 जनवरी 2022, शुक्रवार को काठमांडु, नेपाल के बड़े पत्रकार व साहित्यकार तथा नेपाल सरकार के विद्युत विभाग से सेवानिवृत्त इंजिनियर श्री सच्चिदानंद मिश्र जी से भेंट का रहा।

श्री सच्चिदानंद मिश्र बेहद सरल, सहज व्यक्तित्व के धनी है, तथा उनकी सहदयता देखिये कि, वे स्वयं मेरे होटल पर मुलाकात के लिए पधार गये। हल्की ठंड और सर्द मौसम में चाय के प्याले के साथ श्री मिश्र जी भारत-नेपाल के साहित्य व हिन्दी की स्थिति पर चर्चा हुई। इस चर्चा में महामारी कोविड की वजह से बन सही विपरित परिस्थितियों में आयोजन के स्वरूप व भव्यता को लेकर श्री मिश्र जी के चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

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भारत की ही तरह नेपाल में भी विपरित परिस्थितियों में हिंदी और नेपाली साहित्य व जनसंचार/पत्रकारिता के मुल को ध्यान में रखकर आप काठमांडू से हिमालिनी नामक पत्रिका का प्रकाशन करते है। और यह क्रम विगत चौबीस वर्ष से जारी है। चर्चा में श्री मिश्र ने बताया कि उनके पिता स्व प्रो डॉ कृष्णचन्द्र मिश्र काठमांडू के विश्वविद्यालय में भाषा,साहित्य के प्राध्यापक थे, तथा उनको नेपाली व भारतीय साहित्य के साथ हिंदी से बड़ा लगाव था। चुंकि नेपाल में नेपाली साहित्य को ज्यादा तरजीह दी जाती है, लेकिन साहित्य सरहदों के पार जाता है। और श्री मिश्र के पिता भी हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य के विद्वान थे, उनसे ही साहित्य के संस्कार श्री सच्चिदानंद मिश्र जी को विरासत में मिले है। और अपने पिता की विरासत हिमालिनी को वे आज भी उनकी लगन व निष्ठा से प्रकाशित कर रहे हैं।

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इस पत्रिका के संपादन का कार्य डॉ. श्वेता दिप्ति जी देखती हैं जो त्रिविवि हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष रह चुकीं हैं। चर्चा करते-करते समय ज्यादा हो चला था, इसलिए अंत में श्री मिश्र जी के साथ कुछ चित्र लियें और विदा की बारी आ गई। अंत में श्री विजय पण्डित जी का जिक्र करना आवश्यक है, उन्होनें ही श्री मिश्र जी भेंट करवाई और वे हिमालिनी पत्रिका के भारत देश के ब्यूरो प्रमुख भी है। डॉ. मोहन बैरागी

डॉ. मोहन बैरागी
संपादक
अक्षरवार्ता
भारत

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