हिंदुत्व का प्रखर प्रेरणापुंज महर्षि दयानंद सरस्वती : राजेश झा

परिचय : समाजसुधारक , लेखक , स्वाधीनता के उत्प्रेरक
राजेश झा, राजऋषि चाणक्य के बाद भारतीय महाद्वीप को राजनीतिक -सामाजिक और आर्थिक दिशा देने का काम महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया है, यह हमारा निष्कर्ष है।उन्होने समाज के सभी वर्ग को कर्मकाण्डीय जड़ता से मुक्त करके सबका परिचय ‘वैदिक समाज रचना’ से कराया। सबके लिए ईश्वर की परिभाषा उन्होने दी और कहा “अप्सु देवा बालानाम ,दिवि देवता मनीषिनाम, कृण्वन्तो विश्वमार्यम “।
वे ‘हिन्दू’ के बदले ‘सनातनी’ शब्द का प्रयोग करते थे क्योंकि अरबी -फ़ारसी भाषा में हिन्दू का अर्थ चोर -दुष्ट , समाजद्रोही आदि हैं और यह ‘हिन्दू ‘ नाम भी मुगलों का दिया हुआ है।
अपने अध्यवसायी जीवन में सभी मतों के निर्धारक – पुस्तकों समेत लगभग २५००० पुस्तकों का अध्ययन करने के बाद महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने विश्व को सन्देश दिया ” वेदों की ओर लौटो BACK TO VEDAS ” महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहा था कि सभी को वेदों की ओर लौटना पड़ेगा , सभी को वैदिक रीतियों पर चलनेवाले सनातन धर्म को अपनाना होगा क्योंकि इस्लाम एवं ईसाइयत ‘सभ्य मनुष्यों ‘के सम्प्रदाय भी नहीं हो सकते, धर्म तो वे कतई नहीं हैं ।
उनकी बात समझने में पश्चिमी देशों को बहुत देर हुई पर जब समझ आयी है तो पूरे संसार में सनातन धर्म अपनाने का विचार कार्यरूप लेने लगा है। वर्ष २००७ में जर्मनी में EX -MUSLIM अभियान शुरू हुआ और आज इसकी ललक पूरे विश्व में देखी जा रही है। हर कार्यक्षेत्र के सेलेब्रिटीज चाहे राष्ट्राध्यक्ष हों,राजकुमारी हों,गायक हों,फिल्म स्टार हों, राजनेता हों -सनातन धर्म अपना रहे हैं। आज देश -विदेश के युवजन भी इस्लाम व् ईसाइयत से मुक्ति के लिए सोशल मीडिया पर विभिन्न सामूहिक अभियान चला रहे हैं ,
महर्षि दयानन्द ने समाज से सभी प्रकार के भेदभाव मिटाने का आंदोलन छेड़ा और आर्यसमाज की स्थापना करके विभिन्न मतावलम्बियों को मूल सनातन धर्म में वापस लाने का व्यावहारिक अभियान चलाया था। विभिन्न कारणों से जिनके पूर्वजों ने इस्लाम या ईसाई मत अपना लिए थे उनको अपने मूल की ओर लौटने तथा सभ्य जीवन जीने के अवसर इससे मिले। अपने मूल धर्म में लौटाने का पहला संगठित और सामूहिक अभियान महर्षि दयानन्द ने १८६३ में प्रारम्भ किया।
प्रसिद्ध यूरोपीय लेखक वेलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक INDIAN UNREST में आर्यसमाज , महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा बाल गंगाधर तिलक को “अशांति का जनक ” के रूप में उद्घृत किया है। लेकिन स्वामी दयानन्द तो राष्ट्रचेतना और समानता के मार्गदर्शक थे। वे त्रैतवाद के समर्थक थे -अर्थात् दयानंद सरस्वती ईश्वर ,संसार, एवं जीव की प्रथक- प्रथक सत्ता स्वीकार करते थे। दयानंद सरस्वती ने सभी धर्मों का आलोचनात्मक अध्ययन करने के बाद वेदों की सत्ता को सर्वोपरि माना और वेदों की ओर लौटो का नारा दिया ।
उन्होने अपने जीवनकाल में ही लगभग दस लाख लोगों की घर वापसी करवाई थी। एक मत -परिवर्तन अभियान में जब उन्होने पांच लाख लोगों को सामूहिक रूप से सनातनी बनाया तो उनकी ह्त्या के षड्यंत्र तीव्र हो गए। १८७५ तक आते -आते उनका आर्यसमाज संस्थान मुसलमानो’ तथा ईसाईयों के प्रसारक संस्थानों की आँख की किरकिरी बन गया। उनकी ह्त्या के प्रयास १९६९ में शुरू हुए जिसमें विधर्मियों को सफलता ३० अक्टूबर १८८३ में मिली।
नाम : मूलशंकर अंबाशंकर तिवारी (महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती)
जन्म : 12 फरवरी 1824 टंकारा (मोखी संस्थान, गुजरात).
पिता : अंबाशंकर तिवारी.
माता : अमृतबाई अंबाशंकर तिवारी.
गुरु : स्वामी विरजानन्द दांडी मथुरा
प्रमुख शिष्य : लाला हंसराज और स्वामी श्रद्धानन्द
आंदोलन का सूत्रपात :
(क) पाखण्ड खंडिनी पताका १८६३ (ख ) शुद्धि आंदोलन (ग) भारत है भारतीयों के लिए
प्रमुख नारा :
(क ) वेदों की ओर लौटो (ख ) स्वराज के लिए लड़ो और स्वदेशी का कठोरता से पालन करो
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इन पुस्तकों की रचना की – :
आर्योद्देश्य , गौ करूणानिधि , व्यवहारभानु , वेदांग प्रकाश , स्वीकार पत्र ,सत्यार्थ प्रकाश ,पाखंड खंडन , वेद भाष्य भूमिका, ऋग्वेद भाष्य, अद्वैत मत का खंडन . त्रेत वाद का समर्थन
संस्थान की स्थापना
आर्य समाज ( ६ अप्रेल १८७५ , चर्नी रोड मुंबई में )
मृत्यु : ३० अक्टूबर १८८३ को अजमेर में
महर्षि दयानन्द सरस्वती के विषय में विद्वानों के मत –
पट्टाभि सीतारमैया का विचार था कि गाँधी जी राष्ट्रपिता हैं, पर स्वामी दयानन्द राष्ट्र–पितामह हैं। फ्रेञ्च लेखक रोमां रोलां के अनुसार स्वामी दयानन्द राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रुप देने में प्रयत्नशील थे। श्रीमती एनी बेसेन्ट का कहना था कि स्वामी दयानन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ‘आर्यावर्त (भारत) आर्यावर्तियों (भारतीयों) के लिए की घोषणा की। डॉ. भगवान दास ने कहा था कि स्वामी दयानन्द हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता (प्रेरक) थे। सरदार पटेल के अनुसार वास्तव में भारत की स्वतन्त्रता की नींव स्वामी दयानन्द ने डाली थी।
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उन्नीसवीं शताब्दी के महान समाज-सुधारकों में स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम अत्यंत श्रध्दा के साथ लिया जाता है। राजऋषि चाणक्य के बाद भारतीय महाद्वीप को राजनीतिक -सामाजिक और आर्थिक दिशा देने का काम महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया है।उन्होने समाज के सभी वर्ग को कर्मकाण्डीय जड़ता से मुक्त करके सबका परिचय ‘वैदिक समाज रचना’ से कराया। दयानंद ने दावा किया कि केवल वेद ही सच्चे ज्ञान के भंडार थे और एकमात्र सनातन धर्म वेदों का धर्म था। अर्थशास्त्र, राजनीति, सामाजिक विज्ञान, मानविकी के सिद्धांत वेदों में पाए जा सकते हैं। उनके स्पष्ट आह्वान “गो बैक टू द वेद” ने लोगों में चेतना पैदा की।
दयानंद सरस्वती का जन्म १२ फ़रवरी टंकारा में सन् १८२४ में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनके पिता का नाम अंबाशंकर तिवारी माता का नाम अमृतबाई अंबाशंकर तिवारी था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए।उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया। एक बार शिवरात्रि की घटना है। तब वे बालक ही थे। शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था। सबके सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानव की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।
उनके परिवार में चाचा तथा छोटी बहन की मृत्यु से दयानन्द के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया ,उन्हें सांसारिक जीवन व्यर्थ दिखाई दे रहा था।उनमे जीवन के सच को जानने की इच्छा प्रबल होने लगी। घर के बड़े सदस्योने उनके विवाह की बात चलायी तो मूलशंकर ने कहा कि ‘भौतिक सुख का आनंद लेने के अलावा खुद की आध्यात्मिक उन्नति अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस विषय पर इनके और इनके पिता के मध्य कई विवाद भी हुए पर इनकी प्रबल इच्छा और दृढता के आगे इनके पिता को झुकना पड़ा। जीवन क्या है? मृत्यु क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर सक्षम महात्मा से समझ लेने का विचार कालांतर में उनको आया तो इस इस ध्येय प्राप्ती के लिये १८४६ में उन्होंने 21 वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया।
बचपन से ही अध्ययन में रूचि होने के कारण जीवनपर्यंत उन्होंने कर्मकांड, वैदिक ग्रंथों और साहित्य का अध्ययन किया जिसमें पाणिनी व्याकरण, वैदिक दर्शन, प्रतिपाद, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत, षड्दर्शन, चिकित्सा औषध विज्ञान, और सभी वेद सम्मिलित थे। स्वामी पूर्णानंद सरस्वती ने उन्हें (मूल शंकर) 24 वर्ष की आयु में दयानंद सरस्वती कहा। साधना यात्रा के काल में स्वामी दयानंद कालान्तर में मथुरा में स्वामी विरजानंद के शिष्य बन गए। उन्होंने मथुरा में स्वामी विरजानंद के पास रहकर वेद आदि आर्य-ग्रंथों का अध्ययन किया। गुरुदक्षिणा के रूप में स्वामी विरजानंद जी ने उनसे यह प्रण लिया कि वे आजीवन वेद आदि सत्य विद्याओं का प्रचार करते रहेंगे , स्वामी दयानंद जी ने अंत तक इस प्रण को निभाया , उन्होंने वेदों का हिंदी में अनुवाद किया।
गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके महर्षि स्वामी दयानन्द ने अपना शेष जीवन इसी कार्य में लगा दिया। हरिद्वार जाकर उन्होंने ‘पाखण्डखण्डिनी पताका’ फहराई और मूर्ति पूजा का विरोध किया। उनका कहना था कि यदि गंगा नहाने, सिर मुंडाने और भभूत मलने से स्वर्ग मिलता, तो मछली, भेड़ और गधा स्वर्ग के पहले अधिकारी होते। बुजुर्गों का अपमान करके मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध करना वे निरा ढोंग मानते थे। छूत का उन्होंने ज़ोरदार खण्डन किया। दूसरे धर्म वालों के लिए हिन्दू धर्म के द्वार खोले। महिलाओं की स्थिति सुधारने के प्रयत्न किए। मिथ्याडंबर और असमानता के समर्थकों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।
स्वामी दयानंद महान राष्ट्र-भक्त और समाज-सुधारक थे। उनका कहना था कि विदेशी शासन किसी भी रूप में स्वीकार करने योग्य नहीं होता।सन 1857 में छिड़े स्वतंत्रता-संग्राम में भी स्वामी जी ने राष्ट्र के लिए अतुलनीय कार्य किये जो राष्ट्र के कर्णधारों के लिए सदैव मार्गदर्शन का काम करता रहेगा। उन्होने जनता को जागृत करते हुए “स्वराज और स्वदेशी” का मंत्र दिया।
“भारत, भारतीयों का है’ अँग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके भारत में यह कहने का साहस भी सिर्फ दयानंद में ही था। अपनी रचनाओं व उपदेशों के माध्यम से भारतीय जनमानस को मानसिक दासत्व से मुक्त कराने की पूर्ण चेष्टा की । उनकी वाणी इतनी अधिक प्रभावी व ओजमयी थी कि श्रोता के अंतर्मन को सीधे प्रभावित करती थी । उनमें देश-प्रेम व राष्ट्रीय भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी । उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से भारतवासियों को राष्ट्रीयता का उपदेश दिया और भारतीयों को देश पर मर मिटने के लिए प्रेरित करते रहे। इससे अंग्रेजी सरकार सन्न रह गयी। प्रसिद्ध यूरोपीय लेखक वेलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक INDIAN UNREST में आर्यसमाज तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती को “अशांति का जनक ” के रूप में उद्घृत किया है।
समाजोत्थान की दिशा में उनके द्वारा किए गए प्रयास अविस्मरणीय हैं । स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। स्वामी जी ने मन, वचन व कर्म तीनों शक्तियों से समाजोद्धार के लिए प्रयत्न किया । समाज में व्याप्त बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का उन्होंने खुले शब्दों में विरोध किया । उनके अनुसार बाल-विवाह देश की शक्तिहीनता के मूल कारणों में से एक है । इसके अतिरिक्त वे विधवा-विवाह के भी समर्थक थे । स्वामी दयानंद सरस्वती जी को अपनी मातृभाषा हिंदी से विशेष लगाव था । उन्होंने उस समय हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने हेतु पूर्ण चेष्टा की । उनके प्रयासों से हिंदी के अतिरिक्त वैदिक धर्म व संस्कृत भाषा को भी समाज में विशेष स्थान प्राप्त हुआ। उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है। इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।
वेदों का प्रचार करने के लिए उन्होंने पूरे देश का दौरा करके पंडित और विद्वानों को वेदों की महत्ता के बारे में समझाया। स्वामी जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया। हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली और अनेक संस्कारगत कुरीतियों से छुटकारा मिला। अपने मत के प्रचार के लिए स्वामी जी 1863 से 1875 तक देश का भ्रमण करते रहे। 1875 में आपने मुम्बई में ‘आर्यसमाज’ की स्थापना की और देखते-ही- देखते देशभर में इसकी शाखाएँ खुल गईं। आर्यसमाज वेदों को ही प्रमाण और अपौरुषेय मानता है।
स्वामी दयानंद जी के वैचारिक दर्शन के केंद्र में समाज का परिष्कार और परिशोधन है। समाज के धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में आई कुरीतियों का निराकरण स्वामी जी के चिन्तन का प्रमुख विषय रहा है। जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ‘भारत एक खोज’ में लिखा है कि ‘उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक गुजराती स्वामी दयानंद सरस्वती ने सबसे उल्लेखनीय सुधार आंदोलनों में से एक की शुरुआत की थी, यह आर्य समाज था और उसका नारा था ‘वेद की ओर वापस चलो‘। इस आन्दोलन ने पंजाब (तत्कालीन विशाल पंजाब जिसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ के साथ पाकिस्तानी पंजाब का काफी क्षेत्र शामिल था) के हिंदुओं के बीच अपना गहरा स्थान बना लिया। आर्य समाज हिन्दू धर्म में आई कुरीतियों और इस्लाम तथा ईसाई धर्म के विरुद्ध आत्म-परिष्कार का आन्दोलन था’।
“स्वामी जी के अनुसार जीवन में शिक्षा का अत्यंत महत्त्व है, शिक्षा के बिना मनुष्य केवल नाम का आदमी होता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह शिक्षा प्राप्त करे, सदाचारी बने, द्वेष से मुक्त हो और देश, धर्म तथा समाज के लिए कार्य करे। स्वामी दयानंद जी के विचार में शिक्षा मनुष्य को ज्ञान, संस्कृति, धार्मिकता, आत्मनियंत्रण, नैतिक मूल्यों और धारणीय गुणों को प्राप्त करने में मदद करती है और मनुष्य में विद्यमान अज्ञानता, कुटिलता तथा बुरी आदतों को समाप्त करती है।
स्वामी दयानंद ही थे जिन्होंने भारतीयों में स्वतंत्रता की अलख जगायी। उन्होंने लोगों को एकजुट करने के लिए पूरे भारत की यात्रा की। दयानंद पूरी तरह से आश्वस्त थे कि केवल सशस्त्र क्रांति ही अंग्रेजों को भारत से बाहर निकाल सकती है। स्वामी जी का असली उद्देश्य भारत को राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक रूप से एकजुट करना था, उन्होंने ही हमें स्वराज का पाठ पढ़ाया और इसे पुरुषों के जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में लिया। दयानंद अपने विचारों में लोकतांत्रिक थे और देशवासियों का सामान्य कल्याण चाहते थे। भारत की अपनी अमूल्य विरासत है, जिसके पास उसके उत्थान में योगदान देने के लिए कुछ भी है, इस प्रकार स्वामी दयानंद के विचारों ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नया आकार और पंथ दिया।
1857 के महान विद्रोह की विफलता के बाद भारत में राष्ट्रवाद के प्रसार के लिए तीन एजेंसियां जिम्मेदार हो गईं। वे विदेशी ईसाई मिशनरी, ब्रिटिश सरकार और शिक्षित प्राच्यवादी थे। ओरिएंटलिस्ट दो समूहों में विभाजित थे – अंग्रेजी शिक्षित भारतीय और वे भारतीय जिन्हें भारत के अतीत के गौरव में विश्वास था। स्वामी दयानंद ने राष्ट्रीय उत्थान के महान उत्तोलक के रूप में भारत के गौरवशाली अतीत के महत्व को समझा था। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद पश्चिमी प्रभावों के खिलाफ खड़े थे। वह इस परंपरा से विदा लेने वाले पहले सुधारक थे और उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को एक स्वदेशी अभिविन्यास दिया। उनका आर्य समाज, 1875 में बॉम्बे में स्थापित, मजबूत धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों को गति प्रदान करता है, जो भारत के अतीत के गौरव और सांस्कृतिक विरासत के करीबी और अंतरंग संदर्भ का प्रतीक है और पश्चिमी प्रभावों के खिलाफ प्रतिक्रिया करता है। स्वामी दयानंद ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई गति दी। स्वामी दयानन्द ने ‘स्वराज’ का युद्ध-नायक हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। दयानंद के देश में यूरोपीय लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी और भारतीय यूरोपीय लोगों से बेहतर के लिए सब कुछ प्रबंधित कर सकते थे।
स्वामी दयानंद सरस्वती मूल रूप से राजनीतिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति थे। हिंदू धर्म पर उनके विचारों को स्पष्ट और विस्तारित किया गया। उन्होंने न केवल राष्ट्रवाद का सबसे जोरदार धार्मिक आंदोलन शुरू किया, बल्कि उस तुलनात्मक पद्धति को भी स्वीकार किया जिसके द्वारा उन्होंने देश को पतन से बचाया। स्वामी दयानंद सरस्वती भारत में राजनीति के सबसे उन्नत विचारों के सबसे बड़े प्रतिपादक साबित हुए। उन्होंने राज्य शिल्प और राजनीतिक संस्थानों की एक पूरी प्रणाली विकसित की क्योंकि वे हर पहलू से भारत की स्वतंत्रता की नींव रखना चाहते थे। उन्होंने पश्चिम की राजनीतिक स्थिति के विपरीत एक नैतिक राज्य की वकालत की।
उन्होंने यह भी महसूस किया कि इस स्वतंत्रता के बिना सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की किसी भी व्यापक योजना को लागू करना असंभव था। उस समय, भारत के अंग्रेजी शिक्षित लोगों द्वारा यह दावा किया गया था कि ब्रिटिश सरकार सबसे अच्छी सरकार थी। दयानंद ने इस दावे का खंडन करने में अपना समय बर्बाद नहीं किया। उन्होंने सूरज की तुलना स्वराज से की और कहा कि कोई भी विदेशी सरकार कितनी भी अच्छी क्यों न हो, कभी भी स्वशासन की बराबरी नहीं कर सकती। यह वह समय था जब कोई भी स्वराज का अर्थ सिखाने की हिम्मत नहीं कर सकता था।
1906 में भारत के महान वृद्ध दादाभाई नरोजी ने कलकत्ता अधिवेशन में अपने प्रसिद्ध अध्यक्षीय भाषण में स्वशासन की बात कही थी। इसलिए स्वामी दयानंद की स्वदेशी राज या स्वराज की बात ऐसे समय में जब देश राजनीतिक चेतना में इतना पिछड़ा हुआ था। उन्होंने पहले ही नारा दे दिया था ‘भारतीयों के लिए भारत, यह नारा कलकत्ता अधिवेशन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का आधार बना। दयानन्द का मानना था कि आत्म-विश्वास की भावना के बिना स्वराज की प्राप्ति नहीं हो सकती। । उन्हें विश्वास था कि यदि भारतीय राजनीतिक रूप से जागरूक और शारीरिक रूप से मजबूत हो जाते हैं, तो स्वराज तब से दूर नहीं था। यदि लोग वैदिक धर्म को अपना राष्ट्रीय धर्म मानते हैं, तो स्वराज उनसे दूर नहीं है।
“सत्यार्थ प्रकाश” के छठे अध्याय में स्वराज के विचार की पूरी तरह से चर्चा की गई है। दयानंद अपने विचार में लोकतांत्रिक थे और देशवासियों का सामान्य कल्याण चाहते थे। ब्रिटिश सरकार भारतीय धन को लूट रही थी। सरकार की ऐसी प्रकृति की ओर इशारा करते हुए। स्वामी दयानंद ने भारतीयों को ऐसे सम्राट के प्रति सचेत रहने की चेतावनी दी, जो उन पर खंडहर और अनकहे दुख लाने के लिए जिम्मेदार थे।
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे। स्वदेशी अभिविन्यास के साथ स्त्री शिक्षा और उनके समानाधिकार की बात भी की थी, वह भारत में एक नया सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक आदेश लाना चाहते थे। जिस समय भारत में चारों ओर पाखंड और मूर्ति-पूजा का बोल-बाला था, स्वामी जी ने उसके विरुध्द आवाज उठायी और कहा कि इसका प्रारम्भ बौद्ध काल में हुआ जो कि वैदिक पद्धति नहीं है। वेद से प्रेरणा लेते हुए, उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे मूर्तिपूजा, जाति प्रथा, छुआछूत आदि की आलोचना की। उन्होंने मूर्ति पूजा, कर्मकांड, पशु-बलि की प्रथा, बहुदेववाद की अवधारणा, स्वर्ग और नर्क और भाग्यवाद के विचार का पुरजोर विरोध किया। भारत में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए 1876 में हरिव्दार के कुंभ मेले के अवसर पर उन्होंने पाखण्डखंडिनी पताका फहराकर पोंगा-पंथियों को चुनौती दी. उन्होंने फिर से वेद की महिमा की स्थापना करते हुए एक ऐसे समाज की स्थापना की जिसके विचार सुधारवादी और प्रगतिशील थे,जिसे उन्होंने आर्यसमाज के नाम से पुकारा। वे हिन्दू के बदले सनातनी शब्द करते थे क्योंकि अरबी -फ़ारसी भाषा में हिन्दू अर्थ चोर -दुष्ट , समाजद्रोही आदि हैं और यह ‘हिन्दू ‘ नाम भी मुगलों का दिया हुआ है।
आर्य समाज ने सनातन धर्म को सरल बनाया और सनातनियों को उनकी शानदार विरासत और बेहतर मूल्य के प्रति जागरूक किया। स्वामी दयानन्द ने कहा कि मार्गदर्शन के लिए सनातनियों को ईसाई धर्म, इस्लाम या पश्चिमी संस्कृति की ओर नहीं देखना चाहिए। वैदिक समाज पुरुषों की समानता पर आधारित एक आदर्श समाज था और कोई भी जाति व्यवस्था नहीं थी, भले ही समाज को उनके पेशे के अनुसार चार प्राकृतिक वर्गों में विभाजित किया गया था जैसे कि पूजा, युद्ध, कृषि और व्यापार और सामाजिक सेवा। वैदिक समय के दौरान कोई अस्पृश्यता नहीं थी और महिलाएं समाज में सम्मान और स्वतंत्रता का आनंद ले रही थीं। दयानंद महसूस कर सकते थे कि बाद के सनातनी धर्म दूषित हो गए और सनातनियों ने जीवन के मूल्यों को खो दिया। इसने कई झूठी मान्यताओं को समायोजित किया जिसने सामाजिक एकता को तोड़ने वाले विभाजन लोग पैदा किया।
सनातन धर्म की श्रेष्ठता पर जोर देते हुए, आर्य समाज इस्लामी और ईसाई प्रचार को चुनौती दी । दयानंद ने “शुद्धि आंदोलन” की शुरुआत अन्य धर्मों के लोगों को सनातन धर्म में परिवर्तित करने की प्रक्रिया के रूप में की और साथ ही उन लोगों को फिर से जोड़ने के लिए जिन्होंने सनातन धर्म से दूसरे धर्मों में परिवर्तन किया है। इस आंदोलन ने निम्न जाति के सनातनियों को ईसाई या इस्लाम धर्म में परिवर्तित होने से रोक दिया। शुद्धि आंदोलन ने उन ईसाई मिशनरियों को चुनौती दी जिन्होंने हिंदुओं के अशिक्षित, गरीब और दबे-कुचले वर्गों के मतों को बदलने की कोशिश की।
आर्य समाज ने पुरुषों और महिलाओं दोनों की शिक्षा के लिए गुरुकुल, कन्या गुरुकुलों, डीएवी स्कूलों और कॉलेजों जैसे कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। इन शैक्षणिक संस्थानों ने हिंदू धर्म और समाज की रक्षा की और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान और शिक्षा के विकास को बढ़ावा दिया। यद्यपि आर्य समाज ने सक्रिय रूप से राजनीति में भाग नहीं लिया था, फिर भी इसने अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा देने में मदद की। दयानंद “स्वदेशी” की वकालत करने वाले पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं को त्याग दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देकर, उन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रीय भावना के विकास को बढ़ावा दिया। उन्होंने वैदिक सिद्धांतों पर स्थापित होने वाले ‘स्वराज’ शब्द का इस्तेमाल किसी भारतीय राष्ट्रीय नेता के विचार से पहले किया था। आर्य समाज, इस प्रकार सनातन धर्म का कट्टर समर्थक और उग्र अंग बन गया। इस तरह की उग्रवाद के कारण, बाद में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की तह में चरमपंथ का विकास संभव हो गया।
स्वतंत्र भारत में सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन लाने में आर्य समाज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि दयानंद की आलोचना एक रूढ़िवादी और संप्रदायवादी कार्यकर्ता के रूप में की गई थी, जिन्होंने अन्य सभी धर्मों के ऊपर और ऊपर सनातन धर्म की श्रेष्ठता का दावा किया था, फिर भी वे आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे।
वह ईसाई धर्म या इस्लाम के विरोध में नहीं , बल्कि सभी धर्मों की बुरी प्रथाओं और उनके धार्मिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध थे । कहा जाता है कि 1857 में स्वतंत्रता-संग्राम में भी स्वामी जी ने राष्ट्र के लिए जो कार्य किया वह राष्ट्र के कर्णधारों के लिए सदैव मार्गदर्शन का काम करता रहेगा।
आज देश ही नहीं शेष विश्व में भी सनातन धर्म की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है। इंडोनेशिया का राजपरिवार इस्लाम छोड़ सनातनी बन चुका है। वहां की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री इरेल टॉटेन ने भी इस्लाम छोड़ हिंदुत्व की राह ली है। वर्ष २००७ में जर्मनी ने EX MUSLIMS OF GERMANY नामक अंतर्राष्ट्रीय समूह बनाकर अपनी जड़ों की तलाश के लिए पाश्चात्य देशों में जागरूकता फैलानी शुरू कर दी थी। अफगानिस्तान में भी सनातन धर्म का बवंडर उठ गया है। टेलीविजन कार्यक्रम प्रस्तोता ब्रदर रशीद, मिश्र के पूर्व शेख बोहा अल दीन अहमद हुसैन ऐल अक्कड़ ,अर्जेंटीना के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष कार्लोस मेनम,रूसी अभिनेत्री कुलपन खमतावा ,कैसीलदा ऑफ़ टोलेडो ,अमेरिकी रैपर चैमि लियोनेर समेत लगभग दो सौ सेलिब्रिटीज ने ईसाइयत या इस्लाम को छोड़कर सनातन धर्म की मुख्य धरा हिन्दूत्व को स्वीकार कर लिया है। प्रख्यात इस्लामिक स्कॉलर तुफैल चतुर्वेदी तो शर्त लगाने को तैयार हैं कि ईराक वह पहला देश होगा जो पूरी तरह हिंदुत्व की राह पर चल पड़ेगा। हमारे देश ही शिया बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने इस्लाम को छोड़ अपने पुरखों के धर्म में वापसी कर ली है। केरल में पिछले एक साल में ६३५ लोगों ने ईसाइयत – इस्लाम छोड़कर हिन्दू धर्म स्वीकार लिया है। इससे चिंतित मिशनरियों ने सनातन धर्म में वापसी करनेवाले फारुख हुसैन जैसे कुछ युवकों की ह्त्या करवा दी तो उसके विरुद्ध इन लोगों ने “एक्स मुस्लिम” समूह बनाकर ईसाईयों और मुसलमानों की भद पीटनी शुरू कर दी हैं।
तमिलनाडु के ४० उच्च शिक्षित लोगों ने ” इस्लाम छोडो , ईसाइयत छोडो !! सनातन धर्म से नाता जोड़ो !!” का नारा देते हुए सोशल मीडिया पर विभिन्न समूह बनाकर एक दूसरे को सहयोग देना शुरू कर दिया है। फेसबुक पर हिना द्वारा संचालित पेज ex muslim of india में १०० से अधिक और आरिफ हुसैन थेरूवथ द्वारा संचालित ex muslim of tamilnadu पेज पर ३०० से अधिक लोग नित्य इस्लाम और ईसाइयत के विरुद्ध सप्रमाण बातें कर रहे हैं तथा अन्य लोगों को हिंदुत्व स्वीकारने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। आरिफ हुसैन थेरूवथ ने बताया कि लगभग २५०० पूर्व मुसलमानों तथा ईसाईयों के सीधे संपर्क में वे लोग हैं और युवाओं त था शिक्षितों को सनातन धर्म को विधिवत अपनाने की प्रेरणा दे रहे हैं।ये लोग हिंदुत्व स्वीकारनेवालों को मानसिक रूप से दृढ़संकल्पित बनाये रखने और उनपर आक्रमणों को रोकने के लिए अपने स्तर पर आर्थिक व् कानूनी सहायता भी देते हैं। इनकी प्रेरणा से लखनऊ के नरही स्थित आर्य मंदिर में इब्राहीम ने घर वापसी की और उसका नाम आदित्य मिश्रा हो गया। शाहीन सुलतान NEW AGE ISLAAM website की संस्थापक हैं और तौसीफ अहमद पटना में ex muslim समूह चलाते हैं।
स्वामी दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना कर विभिन्न कारणों से ईसाइयत या इस्लाम स्वीकारनेवालों की घर-वापसी का रास्ता बनाया था। उन्होने सभी पंथों तथा उनके ग्रंथों का अध्ययन करके डंके की चोट पर कहा था सभी को एक- न- एक दिन सनातन धर्म को अपनाना पड़ेगा। उन्होने BACK TO VED का आदर्श ध्येयवाक्य दिया था । स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन को हम पौराणिक हिन्दुत्व से आरम्भ कर दार्शनिक हिन्दुत्व के पथ पर चलते हुए हिन्दुत्व की आधार शिला वैदिक धर्म तक पहुँचता हुआ पाते हैं। 1886 में लाहौर में स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज ने दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी।

