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कमल में किचड’ कमल है हार कैसे स्विकारेगा ? : बिम्मी कालिन्दी शर्मा

 


व्यंग्य -बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बिरगंज। कमल तो किचड में ही खिलता है पर ईस बार कमल खुद किचडमय हो गया है । कमल जब से अध्यझ में हारा तब से बार चारा मुर्झा गया था । मुर्झाते मुर्झाते बेचारे कि स्थिति ईतनी खराब हो गई कि बेचारा किचड मे ही सन गया । कमल को अभिमान था कि राजनीतिक पार्टी नाम के बगिचे में उसके अलावा और कोई फूल नहीं है । सिर्फ वही सिर्फ फूल है और उसी को ही अध्यक्ष बनना चाहिए बांकी तो सब धूल है जिधर से हवा चलती है उधर ही उड जाते हैं । पर ईस बार धूल पर ही ऐसा बंवडर उठा कि कमल उसी धूल में लोटपोट हो गया और उसका दर्प चूर-चूर हो गया ।
पर वह तो कमल है हार कैसे स्विकारेगा ? उसकी आकांक्षा और अपेक्षा तालाब से बडी है ईसी लिए कमल तानाबाना बुनता रहा और उसने किचड में धंस कर उसी दल से खुद को किनारा कर लिया जिससे उसकी पहचान थी । उप-प्रधान मंत्री, गृह मंत्री और विदेश मंत्री तक बन चूके ईस कमल के ख्वाब थे देश का प्रधान मंत्री बन कर गगन चूमने कि । पर क्या करें होनी को कैसे टाले । अपनी राजनीतिक पार्टी के महाधिवेशन में अपने ही जुनियर से मात खा गया । बेचारे के रगों में क्षत्रियों का खून बह रहा है ईसी लिए खुद को हारा हुआ मान कर छोटा नही बन सकता । खानदान परंपरा और संस्कार ने बेचारे को समृद्ध परिवार मे पैदा होने का मौका मिला दरवार से भी नजदीकी रही और राजा से भी गला जोडने का मौका बार-बार मिला । पर क्या करें समय हमेशा एक सा नहीं रहता । पलटा खाया और कमल कुम्हला कर कंही का न.रहा । जब कमल हारा तो उसने अपने प्रतिद्वंद्वी को जीत की बधाई नहीं दी । उल्टे आरोप लगाया कि पूर्व राजा ने बिच में राजनीति और छल कर के उसको हरवा दिया । यह वही कमल जिस ने संवैधानिक राजतंत्र और हिंदू राष्ट्र का डुगडुगी बजा कर पिछले चुनाव में वोट बटोरे थे । सभी अंधे हो गए थे और उसके आडंबर और सफेद झूट को अनदेखा कर के गणतंत्र और नेताओं के चालबाजियों से तंग आ कर उस को वोट दिए । पर परिणाम क्या निकला ? ईसने अपने मतदाताओं का मान भी नही रखा और पार्टी परित्याग कर के दुसरी पार्टी गठन कर ली और दरवार से दुश्मनी मोल ली सो अलग । अब कमल बिफर कर संवैधानिक राजतंत्र को तीलाजंली दे कर हिंदू राष्ट्र का परचम हिलाते हुए नंया पार्टी गठन कर लिया ।
कमल जैसों से उम्मीद रखनू वाली बेवकूफ है ।

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यह अति महत्वाकांक्षी कमल है जो सारे बाग कोई तहस नहस कर के भी खुद खिलते रहना चाहता था ।जो हमेशा संभव नहीं होता । यह वही कमल है ६३ साल के जन आंदोलन में गृह मंत्री रहते हुए शाही सत्त के बचाव मे देश के निर्दोष नागरिक पर निर्मम तरिके से गोली चलाने के आदेश देते हुए भी नहीं डरा । यह वह कमल.है जो हर सरकार में चाहे जिसी भी दल सत्ता में जाए मोलमलाई कर के पावरफूल मंत्रालय हथिया ही लेता था । पावर और पद का ऐसा चश्का लगा कि बिना मंत्री पद के रहना उसको बिना कपडों के नंगे रहने जैसा महसुस होने लगा । बस जैसे भी हो साम, दाम, दंड, भेद सहित पद में टीके रहना या सत्ता में जमे रहना ही ईसके जीवन का अभिष्ठ है । जो पूरा न होने पर बेचारा बौखला गया और अपनी जिस पार्टी से उसकी पहचान थी उसी को लात मार दी । जैसे छोटा बच्चा मनपसंद झूनझूना न मिलने पर खाने की थालीभी पटक देता है ठीक वैसेही ।
कमल अब गीर चूका है पूरी तरह किचड में उसका कोई ईज्जत और प्रतिष्ठा नहीं है । जो थी वह भी खत्म हो गई । अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार कर कमल खुद को तीसमारखाँ समझ रहा है पर भविष्य ही बताएगा कि उसका यह कदम कितना प्रत्युतपाथक था । हार बर्दाश्त न कर पाना और दुसरे नेता को अपना समकक्ष न समझना यह कितनी बडी भूल है यह समय ही जब झापड मारेगा तब पता चलेगा । बदलाव को आत्मसात न कर पाने वाले उसी बंवडर में धूलो सात हो जाते है और उनका कोई वजूद नहीं रहता । अब कमल पूरी तरह किचड में है । कमल किचड मे ही खिलता है पर किचड कमल के फूल पर नहीं निचे होता है । पर ईस बार किचड खुद पंसद की है और किचड के पास चला गया । अब आने वाले चुनाव मेन मतदाता को ईस किचड और कमल दोनों को हमेशा के लिए धरति के अंदर ढंक देना है ताकि फिर यह दुषित कमल खील कर देश को बर्बाद करें । कमल की यह नियति कमले ने खुद तय की है ।

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