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स्वागत है मधेस प्रदेश में : अजय कुमार झा

Madhesh Pradesh
 

अजय कुमार झा, जलेश्वर, हिमालिनी अंक फरवरी ।संघीय गणतन्त्र नेपाल के प्रदेश नम्बर दो का नामकरण के लिए सीधा और स्पष्ट नाम ‘मधेश’ है । अर्थात् (मधेश प्रदेश) २०६३ साल से अबतक के आंदोलन में नेपाल के आकाश में जो क्रांति की ध्वनियां गूंज रही है वह ‘जय मधेश’ की है । जय मधेश शब्द और उसके ऊर्जा से यहां का बच्चा बच्चा उर्जायित है । यह क्रांतिकारी वाक्यांश यहां की जमीन और आकाश में गुंजायमान है । सूरज और चांद भी खुद को मधेसी सूरज और मधेसी चंदा कहलाना पसन्द करते हैं । मधेश शब्द किसी व्यक्ति के द्वारा योजनाबद्ध तरीके से गढ़ा गया शब्द नहीं है । यह तो कालखण्ड में परिस्थिति बस स्वतःस्फूर्त रूप में नेपाल के आम जन मानस के अंतःकरण से प्रस्फुटित हुआ एक विशाल भूखण्ड के अस्तित्व का संबोधन है ।

नेपाली साहित्य में वि. पि. कोइराला के कथाओं में मधेश शब्द का महिमा गान अनेक स्थानों पर मिल जाएगा । ‘मधेश तिर’ नाम के लोकप्रिय कथा ही मिल जाएगी । इस प्रकार से लाखों ऐसे दस्तावेज मिलेंगे जो मधेश के नाम से सुरक्षित है । सन् १८१६ के सुगौली सन्धि के पहले जो मधेस शब्द सम्मान जनक भावों से लिया जाता था वही मधेश शब्द अब षडयंत्रपूर्ण ढंग से लिया जाने लगा है । इसमें राजा महेंद्र से लेकर आज तक के सभी नेता और शासक वर्ग का योजना बद्ध योगदान है ।

स्वर्गीय रामराज बाबू को तत्कालीन राजा ने, ‘तेरो मधेसको अवस्था के छ’? कह के प्रश्न पूछा था । उस वक्त भी मधेस शब्द का ही प्रयोग किया गया था । तो फिर इस बीच में जानकी, मिथिला, जनक आदि शब्द किसने और क्यों घुसाया? अवश्य ही कोई जातीय अथवा बिकाऊ षड़यंत्र होना चाहिए ।

इक्ष्वाकु के पुत्र धर्मात्मा राजा “विशाल” ने वैशाली नगर बसाया था । जो ईसा पूर्व छठी सदी में लिच्छ्वियो का विशाल अधिराज्य था । वर्तमान में उसे हम बिहार प्रदेश के मुजफ्फरपुर जिला के नाम से जानते हैं । वैशाली के उसी लिच्छवियों ने लगभग ४०० से ७५० ई० में नेपाल के काठमांडू घाटी पर आक्रमण कर अपनी सत्ता स्थापित की थी । जिसके लाखों प्रमाण नेपाल के इतिहास और वंशावली तथा साहित्य में आज भी जीवंत हंै । तो फिर हम आठ जिला के ही बात में क्यों अड़के हुए हैं? अभी तो कदम रखा है, इतिहास लौटाना बांकी है । जो हमें भारतीय कहकर शोषण करते आ रहे हैं, उनसे हिसाब तो लाना बांकी है ।

खासकर मधेस बाहेक के नाम के साथ धर्म और जातीयता जुड़े होने के कारण अन्य जात और धर्म के मधेसियों के साथ दोहरा मापदंड अपनाने की मानसिकता हो सकती है । सैकड़ों वर्षों से खस षडयंत्र में फसे मधेसियों के लिए यह एक विशेष अवसर भी है । हम सभी जानते हैं कि वर्तमान का आठ जिला ही मधेश नही है । यह भी एक षडयंत्र ही था, लेकिन आठ जिला भी पहाड़ी शासक को खटकने लगा है । संघीयता के विरुद्ध पहाड़ और काठमांडू से आवाजें बुलंद होने लगी हैं । फिर मधेश के २४ जिला जो भविष्य में एक मजबूत मधेश प्रदेश का अंग बनेगा उसके स्वागत के लिए भी तो इस प्रदेश का नाम मधेश ही रखा जाना चाहिए । मधेश शब्द का विरोध निश्चित रूप से कोई भी मधेसी सपूत और बलिदानी पुरुष नहीं करेगा । यह सारा का सारा षडयंत्र मधेश विरोधी ताकतें जो मधेश में अपनी जड़े जमाए हुए है; उनका ही काम है ।

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आजकल दक्षिण एशियाई देशों में भाषिक राष्ट्रीयता के लिए आंदोलन जोरों पर है । उसी का अवशेष कुछ मुट्ठीभर षडयंत्रकारियों के द्वारा मधेसी आंदोलन तथा मुद्दा को इतिहास से नष्ट करने के लिए लादने का प्रयास किया जा रहा है । जिस प्रकार पूरे मधेश और पहाड़ के साथ साथ समग्र नेपाल को जोड़नेवाली एकमात्र हिंदी भाषा के विरुद्ध तथाकथित बिकाऊ मैथिली भाषा अभियानियों के द्वारा खस सरकार के निर्देशन में भ्रम फैलाया गया है ठीक उसी प्रकार आज मधेस प्रदेश के नाम पर भी भ्रम पैदा किया जा रहा है । बीरगंज और जनकपुर बीच के सौहार्दपूर्ण वातावरण को वैमनश्यता में बदलकर आपसी द्वंद्व में फसाने का चक्रव्यूह रचा जा रहा है । मैथिली और भोजपुरी बीच का संभावित टकराव भी इस मधुरता में खटास पैदा कर रहा है । मैथिली भाषा को मधेश के प्रमुख भाषा तथा सरकारी कामकाज के भाषा का दर्जा दिलाने के चक्कर में प्रयोग किए क्षुद्रता और अहंकारयुक्त वाक्यांशो के कारण ही आज मैथिली भाषा को कमजोर करने के लिए बज्जिका, अवधि, भोजपुरी और मगही भाषा को आगे बढ़ाया जा रहा है । इसके पीछे भी उसी शक्ति का हाथ है जो हिंदी को समाप्त करने के लिए मैथिली भाषी को उपयोग में लाया है । इस जनगणना में सारे के सारे मूढ अभियानियों के हैकड़ी गुम होनेवाली है ।

मधेस के लिए सर्वमान्य और सर्वग्राह्य भाषा वही हो सकती है, जो हमारे किसान लोग भारत में जाकर बोलते हैं । जो हमारे मजदूर लोग पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, बिहार और अन्य जगह जाकर बोलते हैं । हमारे विद्वान् लोग काठमांडू में हिंदी में बोलकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं । राष्ट्रसेवक लोग नेपाल के पूरब से पश्चिम तक हिंदी को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर सेवा कार्य में अपने को सहज पाते हैं । हमारे आध्यात्मिक संत सन्यासी और दार्शनिक गण हिंदी में प्रवचन करते हैं और श्रोता, शिष्य, भक्त और साधकों को श्रवण करने तथा गूढार्थ को समझने में हिंदी में सहज होता है । हिंदी इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि, सारे उच्चकोटी के विश्वस्तरीय साहित्य, वेद के रहस्य, उपनिषदों के गूढार्थ, भागवत के भावार्थ, सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ गीता के गरिमागान, पुराणों के पुर्णार्थ तथा कुरान, बाइबल, धम्मपद, गुरुग्रंथ, त्रिपिटक, ताओ, कबीर, गोरख, बुद्ध, कपिल, नानक, अष्टावक्र, नागार्जुन आदि हजारों रहस्यदर्शी ग्रंथों तथा दिव्यात्माओं के समसामयिक विश्लेषण और विवेचन हिंदी के अलावा अन्य किसी भाषा में उपलब्ध नहीं है ।

अतः ज्ञान विज्ञान, धर्म अध्यात्म, आयुर्वेद और सामवेद, संगीत और नृत्य सब हिंदीमय होने के कारण भी हमारे लिए हिंदी अनमोल है । जड़ीबुटी से जीवन व्यवहार तक, प्रेम से परमात्मा तक, शुभ से सौभाग्य तक, हस्त रेखा के ज्ञान से कुंडली निर्माण के सूक्ष्म विज्ञान तक, कृषि से व्यापार तक, तकनीक से बाजार तक का ज्ञान हमें हिंदी के अलावा अन्य भाषा में संभव नहीं है । मैं खड़ी हिंदी और बनारसी हिंदी की बात नहीं करता हूँ । हम जो सहज भाव से बोल और समझ सकते हैं, लिख और पढ़ सकते हैं; उस हिंदी भाषा की बात करता हूं । आज नेपाली, मैथली, भोजपुरी, अवधी, मगही जिस किसी भाषा को देखो उसमे हिंदी के शब्द भंडार और सामग्री के भरमार मिलेंगे । आज इन सभी स्थानीय भाषाओं के प्राणवायु अर्थात् प्राणिक भाषा के रूप में हिंदी ही है । यह मैं ही नहीं, आप भी जानते हैं ।

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आज के समय में राजनीति का मौलिक सूत्र ही तोड़ना हो गया है । आम नागरिक को कभी एकता के सूत्र में आबद्ध न रहने दिया जाय । जितने खंडों में हम टूटे रहेंगे दुष्ट नेताओं को उतना अधिक शक्तिशाली बनने का अवसर प्राप्त होगा । यही कारण है कि जातीयता को प्रमुख मुद्दा के रूप में मधेश में स्थापित कराने की पुरजोर कोशिश की जा रही है । दूसरी ओर से भुराबाल की दृष्टि से मधेश को न देखने का अल्टीमेटम भी दिया जा रहा है । मधेश में ब्राह्मण, भूमिहार, क्षत्रीय और कायस्थ जाति के लोगों की संख्या न्यून होने तथा राजनीति में सीधा टक्कर देने की हैसियत न होने के कारण अपना रूख बदलते हुए यादव के साथ अन्य वर्गो के बीच संघर्षशील वातावरण निर्माण होने लगा है । इस तरह के जातीय वैमनस्य में विशुद्ध रूप से मधेश समुदाय को क्षति भुगतना पड़ेगा ।

उधर धार्मिक उन्मादियों से मधेश को बचाने का हर संभव प्रयास किया जाना आवश्यक है । बार–बार इस तरह का उन्माद देखने को मिल रहा है जो भविष्य में मधेसी जनता, मानवता और प्रांतीयता के लिए कलंक प्रमाणित होगा । हम कलंकित होंगे, हमारा वंश कलंकित कहलाएगा । अतः आयात किया गया गरीबी और खस शासकों के द्वारा लादा गया बेरोजगारी के चक्रव्यूह को तोड़ना ही हम मधेसियों का परम लक्ष्य होना चाहिए । अन्यथा परिणाम स्पष्ट है; मधेस जातीय और धार्मिक चक्रव्यूह में फसकर मरुभूमि होने ही वाला है । फिर न मैथिली अभियानी बचेंगे न मगही – भोजपुरी ! बस, एक रोता बिलखता इतिहास बचेगा और अपनी ही मूढ़ संतानों के रक्त से रंजित तड़पता हुआ मधेस भूमि ।

विदेशी और बाहर वालों के इशारों पर अपनों के साथ किया गया दुव्र्यवहार महाविनाश का कारण बनता है । इसकी भीषण प्रतिक्रिया में बुद्ध, कृष्ण, राम और गांधी जैसों को भी झुलसना पड़ता है । ऊंच और नीच जाति के नाम पर किया गया भेदभाव और घृणा भी घोर असभ्यता का द्योतक है । हमें इसका भी मधेस और मधेसी के भीतर से निकाल फेंकना होगा । आज हम मानव इतिहास के जिस मोड़ पर खड़े हैं वहां छुआछूत प्रथा जैसे अमानवीय व्यवहार तथा संस्कृतियों के लिए कोई स्थान नहीं है । समूचा विश्व आज एक गांव में परिणत हो चुका है; ऐसी स्थिति में हम किसी से भी दूरी नहीं बना सकते । हमें हर हाल में एक उच्च मानवीय संवेदनाओं के आधार पर समझदारी कायम करना होगा । आपसी तालमेल को हार्दिकता रूपी चादर में संजो कर भावी पीढी को संस्कार में देना होगा । सबका साथ सबका विकास के मंत्र को हृदयंगम करना होगा । और इसके लिए हम आम नागरिकों को ही आगे आना होगा ।

जनकपुरको राजधानी बनाए जाने के बाद वीरगन्ज वासियों को थोड़ी सी पीड़ा बोध होना स्वाभाविक ही है । परंतु जानकी, मिथिला, जनक और विदेह आदि ऐतिहासिक–सांस्कृतिक धरोहरों को त्यागकर मधेश नाम पर दो तिहाई से भी अधिक मतों से पारित कराना वीरगंज लगायत नेपाल का वह सभी जिला और स्थान; जहां मधेसी समुदाय की अच्छी खासी जनसंख्या है, के सभी मधेसियों के भावनाओं का सम्मान, संरक्षण तथा संबोधन करने का प्रयास किया गया है ।

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मधेश प्रदेश नाम से तो उनको कष्ट होना चाहिए था, जो २५० वर्षों से मधेश और मधेसियो का दोहन तथा दमन करता आ रहा है । वे लोग तो हमारे अस्तित्व को ही विश्व समुदाय के समक्ष अस्वीकार करते आ रहे थे । जिसे सैकड़ों मधेसी युवाओं ने अपनी छाती पर गोली खाकर संयुक्त राष्ट्र संघ लगायत विश्व के अन्य मानवतावादी संघ संगठन को हमारी अर्थात् (मधेश और मधेसी) के अस्तित्व को सम्मान पूर्वक स्वीकारने के लिए मजबूर कर दिया । दुनिया हमें मधेसी नाम से जानती है । मधेश के लिए विश्व के अनेक देशों से सहयोग और अन्य मानवतावादी कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही है । अतः इसका विरोध करना आत्महत्या और मूढ़ता के सिवाय और कुछ नहीं माना जाएगा ।
वर्तमान के आठ जिला नामक मधेश प्रदेश हमें अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है । इतना तो सब मानते और जानते हैं कि हमारे साथ षडयंत्र हुआ है । हुआ ही नही, बल्कि निरंतर जारी है । अतः इन भीषण षडयंत्रों के बीच खड़े होने के लिए स्थान हासिल होना यह साबित करता है की कल आराम से विचरण करने के लिए भी बागवान हमें अवश्य ही प्राप्त होगा । उस दिन हम सब मिलकर एक साथ काम करते हुए अपने अस्तित्व को विश्व मंच पर प्रस्तुत करेंगे । तब हमारा एक ही लक्ष्य होगा भौतिक विकास और आध्यात्मिक ऊंचाइयों तथा गहराइयों को अनुभव से जानना । अतः अन्य शब्दों में वह सामर्थ्य नहीं है जो समग्र मधेश को अपनी विशाल हृदय में समेट पाए । जो कोचिला, मगही, भोजपुरा, अवध, मैथिल, बज्जीका को एक साथ सम्मान और सौहार्दता के साथ सर्वांग संबोधन कर पाए । इसलिए भी ‘मधेश प्रदेश’ निर्विवाद स्वीकार्य है ।

वीर सपूत मधेसी शहीदों के सपना और भावनाओं को सम्मान करते हुए मधेस को एक सुंदर, सौम्य और समृद्ध राज्य के रूप में शृंगारना होगा । मधेस के सरलता और भौतिक सौम्यता के कारण अमरावती बनाने में कुछ वर्ष ही लगेंगे । यहां के कर्मठ युवाओं को विकास के पथ पर अग्रसर होने के लिए किसी के प्रेरणा की नहीं सिर्फ अवसर की आवश्यकता है । इनके फौलादी हाथों को किसी में रोकने का दम नही है । जो मरुभूमि से तेल निकाल सकते हों, रेत से स्वर्ण निकाल सकते हो, चट्टान को चीरकर सड़के निर्माण कर सकते हों; उनके लिए इस कोमल और सुंदर भूमि को संवारना तो चुटकी का खेल भर है । आवश्यकता है तो बस अवसर का । शहीद के सपनों को पूरा करना अपने जीवन को सफल बनाने के साथ साथ महान आत्माओं का सम्मान भी है । अन्यथा हम नालायक कहलाएंगे । अपने ही शहीदों, पूर्वजों और युवाओं के सामने तुच्छ तथा कुपात्र के भागी माने जाएंगे । अतः भाषाई विवाद, जातीय भेदभाव तथा राजनीतिक षड़यंत्र को त्यागकर समस्वरता और हार्दिकता के साथ आगे बढ़ते रहना ही हम मधेसियों का एक मात्र सामूहिक लक्ष्य होना चाहिए ।

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