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मन की कलुषता को धो देता है होली का त्योहार : श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति, 17 मार्च 022।नेपाल में होली दो दिन मनाई जाती है। पहाड़ों में संबत जिस दिन जलता है उसी दिन होली मनाई जाती है और तराई में उसके दूसरे दिन। नेपाल में होली को फाल्गुन पूर्णिमा भी कहते हैँ । नेपालभाषा में फागु पुन्हि भी कहा जाता है। विभिन्न जातियों और भाषाओं से संपन्न नेपाल के अलग अलग स्थानों पर होली के रीति रिवाज़ों में थोड़ी बहुत विभिन्नता है। काठमांडू में इस अवसर पर एक सप्ताह के लिए प्राचीन दरबार और नारायणहिटी दरबार मैं चीर (बाँस का स्तम्भ) गाड़ा जाता है । इस चीर मैं विभिन्न रंग के कपड़े लटकाए जाते हैं। यह बाँस का स्तंभ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा तालाब में स्नान कर रही ग्वाल-बालाओं के कपडे वृक्ष पर लटका देनेवाली कथा की स्मृति में प्रतीक स्वरूप खड़ा किया जाता है। स्तंभ गाड़ने के बाद आधिकारिक रूप से होली का आरम्भ होता है। काठमांडू में होली मैं रंग के साथ साथ मैं पानी का भी बहुत प्रयोग होता है। नेपाल के हिमाल और पहाड़ी इलाके में मुख्य होली भारत से एक दिन पहले मनाई जाती है। परंतु तराई में होली भारत की होली के दिन ही मनाई जाती है। तराई की होली का रूप बिहार की फगुआ से मिलता जुलता है। होली एक हिन्दू त्यौहार है परन्तु नेपाल में हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बी (प्रायः नेवार जाति) दोनों ही इस त्यौहार को हर्षोल्हास से मनाते है । होली में मांसाहारी भोजन खाने का प्रचलन है ।सेल रोटी, मालपुए, अचार आदि खाने की चीजें बनतीं हैं ।काठमांडू की होली में पानी का प्रयोग बहुत होता है। रंगों की जगह गुलाल का प्रयोग होता है। पानी से भरे बैलून फेंका जाता है किंतु आजकल ये कम हो गया है। तराई में भी धूमधाम से होलिका दहन के बाद होली मनाई जाती है। पुआ और मांस जरूर बनाया जाता है। लोग टोली बना कर गीत गाकर घूमते हैं और एक दूसरे को रंग लगाते हैं तथा शाम को नए कपड़े पहन कर एक दूसरे के घरों में जाकर बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। होली जो वैमनस्य को दूर करती है और प्रेम तथा सद्भाव को बढावा देती है। कुछ विकृतियां भी हैं पर होली का महत्व हमेशा से रहा है।

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