उपलब्धि बनाम आलोचना : डॉ. मुक्ता
डॉ. मुक्ता, हिमालिनी पत्रिका, अंक फरवरी ।उपलब्धि व आलोचना एक दूसरे के मित्र हैं । उपलब्धियां बढ़ेंगी, तो आलोचनाएं भी बढ़ेंगी । वास्तव मेंं ये दोनों पर्यायवाची हैं और इनका चोली–दामन का साथ है । इन्हें एक–दूसरे से अलग करने की कल्पना भी बेमानी है । उपलब्धियां प्राप्त करने के लिए मानव को अप्रत्याशित आपदाओं व कठिनाइयों से जूझना पड़ता है । जीवन में कठिनाइयाँ हमें बर्बाद करने के लिए नहीं आतीं, बल्कि ये हमारी छिपी हुई सामर्थ्य व शक्तियों को बाहर निकालने में हमारी मदद करती हैं । सो ! कठिनाइयों को जान लेने दो कि आप उससे भी अधिक मजÞबूत व बलवान हैं । इसलिए मानव को विषम परिस्थितियों में धैर्य नहीं खोना चाहिए तथा आपदाओं को अवसर में बदलने का प्रयास करना चाहिए । कठिनाइयां हमें संचित आंतरिक शक्तियों व सामर्थ्य का एहसास दिलाती हैं और उनका डट कर सामना करने को प्रेरित करती हैं । इस स्थिति में मानव स्वर्ण की भांति अग्नि में तप कर कुंदन बनकर निकलता है और अपने भाग्य को सराहने लगता है । उसके हृदय में ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का भाव घर कर जाता है, जिसके लिए वह भगवान का शुक्र अदा करता है कि उसने आपदाओं के रूप में उस पर करुणा–कृपा बरसायी है । इसके परिणाम–स्वरूप ही वह जीवन में उस मुकÞाम तक पहुंच सका है । दूसरे शब्दों में वह उपलब्धियां प्राप्त कर सका है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी ।
‘उम्र जÞाया कर दी लोगों ने÷ औरों के वजूद में नुक्स निकालते–निकालते÷ इतना खÞुद को तराशा होता÷ तो फरिश्ता बन जाते’ गुलजÞार की यह सीख अत्यंत कारगÞर है । परंतु मानव तो दूसरों की आलोचना कर सुकÞून पाता है । इसके विपरीत यदि वह दूसरों में कमियां तलाशने की अपेक्षा आत्मावलोकन करना प्रारंभ कर दे, तो जीवन से कटुता का सदा के लिए अंत हो जाए । परंतु आदतें कभी नहीं बदलतीं; जिसे एक बार यह लत पड़ जाती है, उसे निंदा करने में अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है । वैसे आलोचना भी उसी व्यक्ति की होती है, जो उच्च शिखर पर पहुंच जाता है । उसकी पद–प्रतिष्ठा को देख लोगों के हृदय में ईर्ष्या भाव जाग्रत होता है और वह सबकी आंखों में खटकने लग जाता है । शायद इसलिए कहा जाता है कि जो सबका प्रिय होता है– आलोचना का केंद्र नहीं बनता, क्योंकि उसने जीवन में सबसे अधिक समझौते किए होते हैं । सो ! उपलब्धि व आलोचना एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनका चोली–दामन का साथ है ।
समस्याएं हमारे जीवन में बेवजह नहीं आतीं । उनका आना एक इशारा है कि हमें अपने जीवन में कुछ बदलाव लाना है । वास्तव में यह मानव के लिए शुभ संकेत होती हैं कि अब जीवन में बदलाव अपेक्षित है । यदि जीवन सामान्य गति से चलता रहता है, तो निष्क्रियता इस कÞदर अपना जाल फैला लेती है कि मानव उसमें फंसकर रह जाता है । ऐसी स्थिति में उसमें अहम् का पदार्पण हो जाता है कि अब उसका जीवन सुचारू रूप से चल रहा है और उसे डरने की आवश्यकता नहीं है । परंतु कठिनाइयां व समस्याएं मानव को शुभ संकेत देती हैं कि उसे ठहरना नहीं है, क्योंकि संघर्ष व निरंतर कर्मशीलता ही जीवन है । इसलिए उसे चलते जाना है और आपदाओं से नहीं घबराना है, बल्कि उनका सामना करना है । परिवर्तनशीलता ही जीवन है और सृष्टि में भी नियमितता परिलक्षित है । जिस प्रकार प्रात्रि के पश्चात् दिन, अमावस के पश्चात् पूनम व यथासमय ऋतु परिवर्तन होता है तथा प्रकृति के समस्त उपादान निरंतर क्रियाशील हैं । सो ! मानव को उनसे सीख लेकर निरंतर कर्मरत रहना है । जीवन में सुख दुःख तो मेहमान हैं…आते–जाते रहते हैं । परंतु एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है । मुझे स्मरण हो रही हैं यह पंक्तियां’नर हो ना निराश करो मन को÷ कुछ काम करो, कुछ काम करो’, क्योंकि गतिशीलता ही जीवन है और निष्क्रियता मृत्यु है ।
सम्मान हमेशा समय व स्थिति का होता है । परंतु इंसान उसे अपना समझ लेता है । खुशियां धन–संपदा पर नहीं, परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं । एक बच्चा गुब्बारा खरीद कर खुश होता है, तो दूसरा बच्चा उसे बेचकर फूला नहीं समाता । व्यक्ति को सम्मान, पद–प्रतिष्ठा अथवा उपलब्धि संघर्ष के बाद प्राप्त होती है, परंतु वह सम्मान उसकी स्थिति का होता है । परंतु बावरा मन उसे अपनी उपलब्धि समझ हर्षित होता है । प्रतिष्ठा व सम्मान तो रिवाल्विंग चेयर की भांति होता है, जब तक आप पद पर हैं और सामने हैं, सब आप को सलाम करते हैं । परंतु आपकी नजÞरें घूमते ही लोगों के व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन हो जाता है । सो ! खुशियां परिस्थितियों पर निर्भर होती हैं, जो आप की अपेक्षा होती हैं, इच्छा होती है । यदि उनकी पूर्ति हो जाए, तो आपके कदम धरती पर नहीं पड़ते । यदि आपको मनचाहा प्राप्त नहीं होता, तो आप हैरान–परेशान हो जाते हैं और कई बार वह निराशा अवसाद का रूप धारण कर लेती है, जिससे मानव आजीवन मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता ।
मानव जीवन क्षण–भंगुर है, नश्वर है, क्योंकि इस संसार में स्थायी कुछ भी नहीं । हमें अगली सांस लेने के लिए पहली सांस को छोड़ना पड़ता है । इसलिए जो आज हमें मिला है, सदा कहने वाला नहीं; फिर उससे मोह क्यों? उसके न रहने पर दुःख क्यों? संसार में सब रिश्ते–नाते, संबंध– सरोकार सदा रहने वाले नहीं हैं । इसलिए उन में लिप्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि जो आज हमारा है, कल मैं छूटने वाला है, फिर चिन्ता व परेशानी क्यों?’दुनिया का उसूल है÷ जब तक काम है÷ तेरा नाम है÷ वरना दूर से ही सलाम है ।’ हर व्यक्ति किसी को सलाम तभी करता है, जब तक वह उसके स्वार्थ साधने में समर्थ है तथा मतलब निकल जाने के पश्चात् मानव किसी को पहचानता भी नहीं । यह दुनिया का दस्तूर है इसका बुरा नहीं मानना चाहिए ।
समस्याएं भय और डर से उत्पन्न होती हैं । यदि भय, डर,आशंका की जगह विश्वास ले ले, तो समस्याएं अवसर बन जाती हैं । नेपोलियन विश्वास के साथ समस्याओं का सामना करते थे और उसे अवसर में बदल डालते थे । यदि कोई समस्या का जिÞक्र करता था, तो वे उसे बधाई देते हुए कहते थे कि’यदि आपके पास समस्या है, तो निःसंदेह एक बड़ा अवसर आपके पास आ पहुंचा है । अब उस अवसर को हाथों–हाथ लो और समस्या की कालिमा में सुनहरी लकीर खींच दो ।’ नेपोलियन का यह कथन अत्यंत सार्थक है ।’यदि तुम खÞुद को कमजÞोर सोचते हो, तो कमजÞोर हो जाओगे । अगर खÞुद को ताकतवर सोचते हो, तो ताकतवर’ स्वामी विवेकानंद जी का यह कथन मानव की सोच को सर्वोपरि दर्शाता है कि हम जो सोचते हैं, वैसे बन जाते हैं । इसलिए सदैव अच्छा सोचो; स्वयं को ऊर्जस्वितत अनुभव करो, तुम सब समस्याओं से ऊपर उठ जाओगे और उनसे उबर जाओगे । सो ! आपदाओं को अवसर बना लो और उससे मुक्ति पाने का हर संभव प्रयास करो । आलोचनाओं से भयभीत मत हो, क्योंकि आलोचना उनकी होती है, जो काम करते हैं । इसलिए निष्काम भाव से कर्म करो । सत्य शिव व सुंदर है, भले ही वह देर से उजागर होता है । इसलिए घबराओ मत । बच्चन जी की यह पंक्तियां’है अंधेरी रात÷ पर दीपक जलाना कब मना है’ मानव में आशा का भाव संचरित करती हैं । रात्रि के पश्चात् सूर्योदय होना निश्चित है । इसलिए धैर्य बनाए रखो और सुबह की प्रतीक्षा करो । थक कर बीच राह मत बैठो और लौटो भी मत । निरंतर चलते रहो, क्योंकि चलना ही जीवन है, सार्थक है, मंजिÞल पाने का मात्र विकल्प है । आलोचनाओं को सफलता प्राति का सोपान स्वीकार अपने पथ पर निरंतर अग्रसर हो ।

