जीवन राग के अनुपम गायक महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री : डॉ. संजय पंकज

डा संजय पंकज, हिमालिनी अंक फरवरी । बेसुरे समय में सुरीले जीवन– सौंदर्य, अंतर–आलोक और सामाजिक सद्भाव के लिए महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनाओं को पढ़ते हुए हम अपने मनुष्य को विस्तार और उत्कर्ष दे सकते हैं । महाप्राण निराला की प्रेरणा से संस्कृत के आचार्य हिंदी लेखन में प्रवृत्त हुए और जिनकी रचनात्मक प्रतिस्पर्धा विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर से सदा रही ऐसे साहित्य साधक जानकीवल्लभ शास्त्री संवेदना, स्वाभिमान, शिल्प वैशिष्ट्य और भाव वैभव के श्रेष्ठ रचनाकार थे । साहित्य की सभी विधाओं में महत्वपूर्ण लिखते हुए आचार्य जी मूलतः कवि–गीतकार के रूप में संपूर्ण हिंदी संसार में समादृत हुए । इनकी विद्वता और सुकंठ गीत प्रस्तुति के कायल हिंदी काव्य मंचों के दिग्गज भी हुआ करते थे । छात्रप्रिय शिक्षक के साथ ही धाराप्रवाह व्याख्यान के लिए भी आचार्य जी जाने माने जाते थे । इनकी सूक्ष्म और पारदर्शी आलोचनात्मक दृष्टि तथा वाग्मिता से नाट्य सम्राट पृथ्वीराज कपूर ही केवल प्रभावित नहीं थे बल्कि पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, नलिन विलोचन शर्मा, महादेवी वर्मा जैसे अनेक नाम हैं जो आचार्य जी को बड़े ही प्यार और सम्मान से सुनते पढ़ते थे । कामायनी महाकाव्य के रचयिता जयशंकर प्रसाद युवा जानकीवल्लभ शास्त्री को कामायनी के अंशों को सुनाते हुए उनसे मंतव्य मांगते थे, और उनके परामर्श से यथास्थान संशोधन भी किया । मेधावी छात्र के रूप में शास्त्रीजी हर परीक्षा में टा‘पर बने । स्वर्ण पदक प्राप्त किए । संस्कृत, हिंदी, बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी के विद्वान और अध्येता शास्त्री जी ने बंग साहित्य सम्मेलन, कोलकाता की एक बड़ी सभा में सुनते हुए बंगाली विद्वानों को और उनके प्रतिपादन को कि रवींद्रनाथ ठाकुर का हिंदी साहित्य पर कितना प्रभाव है, जब धाराप्रवाह बंगला में बोलना शुरू किया तो सब आश्चर्यचकित रह गए ।
इतना ही नहीं अपने व्याख्यान में इन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर पर हिंदी कवियों के प्रभाव को उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया । प्रकृति, प्रेम, मूल्य, मनुष्यता, संस्कार और संस्कृति के बड़े कवि जानकीवल्लभ शास्त्री से ज्यादा संख्या और गुणवत्ता में किसी हिंदी कवि ने गीतों का सृजन नहीं किया । कालिदास (उपन्यास), राधा (महाकाव्य) हंस बलाका (आत्मकथा संस्मरण) जैसी कालजयी कृतियों के रचयिता आचार्यश्री ने तरुणावस्था में अपनी प्रथम संस्कृत काव्यकृति ‘काकली’ से अपनी प्रतिभा तथा लेखनी का लोहा मनवाया । पंडित मदन मोहन मालवीय के कहने पर रायगढ़ के राजकवि के रूप में विद्यमान जानकीवल्लभ शास्त्री साहित्य साधना के लिए उस पद से मुक्ति लेते हुए नौकरी के प्रयोजन से मुजफ्फरपुर आए तो धर्म समाज संस्कृत का‘लेज में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए । फिर राम दयालु सिंह कॉलेज में प्राध्यापक होकर कॉलेज को भी बड़ी पहचान दिलाई । मानवेतर प्राणियों से भी स्नेह और करुणा रखने वाले आचार्य जी ने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया । अनेक पुरस्कारों से सम्मानित आचार्यश्री ने बिहार सरकार के राजभाषा पुरस्कार को कभी ठुकराया तो जीवन के अंतिम वय में भारत सरकार के पद्मश्री सम्मान को भी यह कहकर अस्वीकृत कर दिया कि इस उम्र में यह झुनझुना लेकर क्या करूंगा ! मेरे लिए मेरे साहित्य और पाठकों का ही प्यार सबसे बड़ा सम्मान है । भारतीय समृद्ध परंपरा को आत्मसात कर आचार्य जी ने समकालीन चुनौतियों को भी अपने लेखन का विषय बनाया । सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार करते हुए हमेशा जनजीवन तथा न्याय के पक्ष में दृढ़ता से खड़े होकर सच को अभिव्यक्त किया । शताधिक कृतियों के रचनाकार आचार्य जी की आधी से ज्यादा कृतियां अप्रकाशित हैं जिसे उन्होंने आनेवाली पीढÞियों के लिए विरासत के रूप में अपने साधना स्थल साहित्य तीर्थ निराला निकेतन में सहेज कर रख छोड़ा है । हिंदी भाषा साहित्य के गौरव शिखर आचार्य जी की अनेकानेक पंक्तियां सूक्तियों के रूप में उद्धृत की जाती हैं । बार–बार संसद में भी सुनी जाती हैं –
‘ऊपर ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं,
कहते, ऐसे ही जीते हैं जो जीने वाले हैं ।’
‘जागो निद्रा तंद्रा के कर बिके हुए बेमोल’ – जैसी पंक्तियों को स्वतंत्रता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में लिखने वाले युवा जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनाधर्मिता अपनी विकास–यात्रा में राष्ट्रीय चेतना, प्रकृति संवेदना और सत्य दर्शन से संयुक्त होकर निरंतर परवान चढ़ती रही । शास्त्री जी अपने समय से जुड़े हुए एक बड़े रचनाकार के रूप में आज भी अपनी रचनाओं के माध्यम से हमें संस्कारित और प्रेरित कर रहे हैं । आजादी की लड़ाई में अपनी रचनात्मक उपस्थिति अग्निधर्मा रूप में अंकित करने वाले शास्त्री जी ने चीन को आक्रमण पर हिमालय के माध्यम से शौर्य के साथ ललकारा –‘ठंडे–ठंडे देख हिमालय, खून हिंद का गर्म है ।’ निरंकुश सत्ता जब अपनी मनमर्जी से देश को तबाह करने लगी तो आचार्य जी ने प्रतिवादी स्वर में गाया – ‘और कसो तार, तार सप्तक में गांऊं ।’ वे प्रकृति, प्रेम, मूल्य, मनुष्यता, संस्कार और संस्कृति के समर्थ कवि थे । उन्होंने कभी अपने जीवन मूल्यों तथा उच्च आदर्शों से समझौता नहीं किया । स्वाभिमान के साथ वे जीवनपर्यंत दृष्टि संपन्न लेखन करते रहे ।

