प्रतिच्छाया : अयोध्यानाथ चौधरी
प्रतिच्छाया
वह कुछ दिनों के लिए एक उत्साही नर्तकी है,
मंच पर थिरकते हुए उसके पैरों के पायल
जश्न मनाने वाले शीशे की गिलास की तरह झनक उठते ।
कभी-कभी वह अकल्पित कमजोरी का शिकार बन जाती है
जिसके कारक उसकी विनित स्वाभाविक कमजोरियां हैं
फिर तो वह किसी दया की आशा के बिना टूट-फूट जाती है ।
जब उसका प्रेमी पहली बार उससे मिलने आया
उसे फटकारते हुए उसके पैर खुद सिमट आए
स्वत:स्फूर्त, शर्म की एक छिद्र को छिपाने के लिए l
केवल एकांत के अंधकार में चुपके से,
उसने ईश-निंदा की कामुक किताब के पन्ने पलटे,
जब वहाँ उत्सुकतावश देखनेबाला कोई दूसरा नहीं था ।
उसकी यह उदास , शर्मिन्दगी भरी खुशी,
जबकि उसके अन्दर , भीतरी आघात का कोई लक्षण नहीं
सिंदूर और गोमेद , किसी बिश्रान्तपूर्ण अवस्था में हटा दिए गए ।
यह प्रतिच्छाया एक ऊंची आवाज में भौंकता राक्षस-सा है,
जो चांदनी रात के पागलपन में भटक रहा हो
छिपा हुआ , जब तक कि दुनिया उसके बिषाद से उसको उन्मुक्त न कर दे ।
The Shadow
# Jyotirmaya Thakur
हिन्दी अनुवाद
# अयोध्यानाथ चौधरी , नेपाल

जनकपुर


