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“बैशाख नन्दनों का खुराफात” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा

 

बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बीरगंज, 3 मई  (व्यंग्य)। बैशाख का महिना है और चुनाव भी ईसी महिने में है ईसी लिए बैशाख नन्दनों की सरगर्मी बढी हूई हुए । यह धोबी घाट मे ‘ढे़चू ढेंचू’ करना छोड कर चुनाव कू मैदान में चरने और चरवाने आ गए हैं । और चरवाहा निर्वाचन आयोग है जो सारे बैशाख नन्दनों को रेलमपेल कर रहा है । चुनाव का महिना है ईसी लिए सारे बैशाख नन्दन घांस खाना छोड कर मास भात खा रहे हैं और मजे से दारु भी पी रहे हैं । अभी बैशाख नन्दनों का ही बोलबाला है ईसी लिए कुछ बौद्धिक घोडे यिनके करतब को चूपचाप निहार रहे हैं । यह बढिया नस्ल के बौद्धिक घोडे हैं ईसी लिए घांस नही खाते बल्कि उन्नत क्वालिटी के चने खाते हैं और पत्रिकाओं में अपने पसंदिदा बैशाख नन्दन उम्मीदवारों के पक्ष में लिख कर शाम के गँगाजल का बन्दोबस्त कर लेते हैं ।
यदि मतदाता बैशाख नन्दन हैं तो उम्मीदवार भी खच्चड है जा न घोडा है न गधा । कमसेकम बैशाख नन्दन मतदाताओं का तो एक गुणस्तर है भले ही वोट के बदले नोट में बिकता हो । पर खच्चड जैसे उम्मीदवार तो ईन्ही बैशाख नन्दनों के पैर में लोटपोट हो कर इन्हें दक्षिणा दे रहा है । जो भी हो बैशाख नन्दनों का भी अभी बोलबाला है । वह अपना वोट का ‘तोल मोल के बोल’ कर रहे हैं । अब कौन कितने में तौला जाएगा यह तो वोटों कि संख्या पर निर्भर है । खच्चरों का पूरा परिवार और रिश्तेदार भी चुनाव में उम्मीदवार बने है । तब तो बैशाख नन्दनों के आगे शीर झुकाना पड रहा है बेचारों को । ईधर बैशाख नन्दन वोंट मागने आए हर उम्मीदवार की बोली कबूल कर रहा है । अब चुनाव के दिन ठप्पा किस पर लगाएगा यह तो चुनाव के अन्तिम दिन और कत्ल की रात ही तय कर पाएगें ।
अभी बैशाख नन्दनों के लिए जिधर देखो उधर हरियाली है । और समय भूखे रहने वाले बेरोजगार बैशाख नन्दनों के लिए चुनाव बढिया रोजगार ले कर आया है । पांच साल में बस दो- तीन बार ही तो कमाने का मौका मिलता है ईसे जाया नही करना चाहिए । अभी के कमाई से ही बाँकी समय पेट भरना है । तो क्यों न कमाए यह बैशाख नन्दन ? बांकी समय तो बोझा ढोने को भी नहीं मिलता । चुनाव ही ऐसा समय है जब यह खच्चर जैसे उम्मीदवार ईन बैशाख नन्दनों को ईंसान समझने की गलती करते है और पैर भी छू लेतें है । बांकी समय ईन बैशाख नन्दनों को पुछेगा तो वह भी अपनी महत्ता जान कर चुनाव के महा-कुंभ मे डुबकी लगा कर अपना ईहलोक सुधार रहे हैं । अब घूष खाए पेसे या अपना वोट बेच कर कमाए पैसे से परलोक तो सुधरेगा नहीं ।
ईस देश में करोडों मतदाता यानी कि बैशाख नन्दन है । अब यह बैशाख नन्दन अपना चेहरा तो आईने में देखते नहीं । बस खच्चर जैसे नेताओं को ही कोसते रहते हैं । और खच्चर नेताओं ने ईन बैशाख नन्दनों कि कमजोरी पकड ली है । अब ईनके सामने परोसा जा रहा है मास, भात और दारु, पहनने के लिए साडी, चलाने के लिए मोबाईल और लैपटॉप और खर्च करने के लिए पैसे । ताकि यह बैशाख नन्दन अपना दिमाग दुसरी पार्टी या नेता पर न लगाएं या खर्च करे । ईन बैशाख नन्दनों कि दारु के नशे में बहकने की भी पूरी उम्मीद है ईसी लिए नेता ईन्हें अपने खूंटे पर ही बांध कर रखना चाहते हैं । बैशाख नन्दनों के पौ बारह है अभी । वह मागेंगे गोभी की सब्जी और खाने को मील रही है मटर पनीर । पाँच सौ उधार मांगने पर खच्चर नेता ईन बैशाख नन्दनों को पांच हजार रुपएं से नवाज रहे है ।
बैशाख नन्दन बहुत ही खुराफाती है । ईन्ही के खुराफातों के कारण देश धोबीघाट जैसा बन गया है गंदा और अस्त-व्यस्त । ईन बैशाख नन्दनों की आंख छोटी है पर सपने बडे देखते है । और अपने दिनदहाड़े देखे बडे सपने को पूरा करने के लिए यह किसी भी हद तक जा सकते हैं । कभी किसी पार्टी के खेमे में चले गए और किसी नेता का फेर पकड कर खुब तर माल उडा लिया और अगले चुनाव में उसी नेता और पार्टी को ठेंगा दिखा किसी दुसरे खेमें में चले गए । चुनाव के समय हर जगह हरियाली और रोजगारी.है तो यह बैशाख नन्दन एक जगह टिकेंगें ही क्यों । यदि मतदाता घोडा हो जाए और अपनी पीठ पर सवार खच्चर उम्मीदवारों को हिनहिनाकर दुलत्ती मार कर निचे पटक दें तो ईनकी मजाल नहीं होगी कुछ गलत करने की । पर अपने देश के मतदाता घोडा नहीं बैशाख नन्दन बने रहने में ही भलाई देखते हैं । जब खालि रहते हैं तब ईन्ही सडे-गले नेताओं के व्यक्तित्व का भारी अपनी पीठ पर उठा कर घुमते है । और जब चुनाव नजदीक आ जाए तो ईनका कहना ही क्या ‘पांचों उंगली घी में शीर कडाही में’ । तब ईन्हे हरी-हरी घांस चरने यानीकि अपने वोटों के मतलब नोटों कि गिनती करने से ही फुरसत नहीं होती । हम मतदाता ऐसे ही है कभी अपना विवेक प्रयोग नहीं करते । बस दुसरों के बहकावें में आ कर वह कर लेते है जो करना नही चाहिए । जैसे गधे कि बुद्धि नही होती वह बोझा ढोने के लिए पैदा हुआ है वैसे ही हम महंगाई और टैक्स का भार ढोने के लिए अभिशप्त हैं । जैसे खच्चर नेता वैसे ही हम बुद्धिहीन नोट के बदले वोट मे बिके हुए बैशाख ननन्द । गर्व से कहें कि हम बैशाख नन्दन हैं ! 👌😊

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