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नसीबों से मिलती है : किरण अटल

 

रोटी

सुनते ही लगती भूख
चाहे हो आमिर गरीब
या हो कोई किट पशु
रहे चाहे दुख या सुख
चाहत सबको गंदुम तेरी
सुरत गोल आड़ी बांकी
छोटी मोटी चपटी कच्ची
स्वाद लेकर जिव्हा बोली
मुझे प्रसन्न करने हेतु
हुवे तेरी पिटाई मथाई
गरमा गर्म और सिकाई
खुद चुल्हे में तपाती
छाती को छलनी करती
तृप्त होती पेट कि अग्नि
एक तेरे दर्शन को तरसे
दुजा कचरे में फैंके
नसीबों से मिलती है
मेहनत कि बस दो रोटी
खुन पसीजे उपजे कनक
जो बर्साता है धर्म-करम

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किरण अटल’आत्मकिरण’
विराटनगर नेपाल

 

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