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इक्कीस वर्षों के बाद भी रहस्य के गर्त में दफन ‘दरबार हत्याकांड’

 


डॉ. श्वेता दीप्ति
नेपाल के इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय जो बीतते वक्त के साथ भले ही अतीत के गर्भ में विलीन होता चला गया हो किन्तु एक ज्वलंत प्रश्न नेपाल की आम जनता के मन मस्तिष्क को हमेशा विचलित करती रहेगी । अपने सबसे प्रिय राजा को सपरिवार खो देने का गम आज भी कई आँखों को छलका देता है । ये और बात है कि सत्ता पर काबिज होने वालों के लिए यह घटना भले ही कोई महत्त्व ना रखती हो पर यह भी कटु सत्य है कि जब भी नेपाल के इतिहास के पन्नों को पलटा जाएगा तो दिल को दहला देने वाला एक काला अध्याय हमारे समक्ष होगा ।
राजा वीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या और राजकुमार दीपेंद्र सहित नेपाली शाही परिवार के सदस्यों की अकल्पनीय हत्या को २१ साल हो चुके हैं । यानि पूरे दो दशक के बाद भी यह पन्ना अपने निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा है । देखा जाए तो दरबार हत्याकांड न केवल वंश का अंत था, बल्कि नेपाल के भविष्य को अंधेरे में डुबाने के प्रयास की शुरुआत भी थी । उस प्रयास के देशी और विदेशी योजनाकार और कर्ता कौन थे ? यह अभी भी एक रहस्य है । हालांकि, पिछले दो दशकों में, दरबार हत्याकांड के बारे में कई षड्यंत्र सिद्धांत सामने आए हैं और इस संबंध में लिखी गई साहित्यिक पुस्तकें सबसे अधिक बिकने वाली सूची में सबसे ऊपर हैं ।
कहा गया कि इस दहलाने वाली घटना को युवराज दीपेन्द्र ने नशे में अंजाम दिया था । किन्तु यह भी सच है कि घटना की जांच कर रहे निकाय और जांच के निष्कर्षों पर आबादी के एक बड़े हिस्से को विश्वास नहीं हुआ था । और आज भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता कि युवराज दीपेंद्र ने अपने बल और योजना पर इस घटना को अंजाम दिया ।
नारायणहिटी दरबार हत्याकांड को २१ साल हो चुके हैं । उस दिन भी हर महीने के तीसरे शुक्रवार को आयोजित होने वाली दावत की शाम थी, जब २०५८ जेष्ठ १९ गते(१ जून२००१) एक दावत के रात को दरबार में नरसंहार हुआ था । चौंकाने वाला तथ्य यह है कि तत्कालीन राजा वीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या, युवराज दीपेंद्र और परिवार के अन्य सदस्यों को शाही महल के ‘बहुत सुरक्षित’ स्थान पर मार दिया गया था, और जिसका राज आज तक नहीं खुला है ।
हालांकि, उस समय, नए राजा ज्ञानेंद्र ने जेठ २२ गते की शाम को शाही उद्घोषणा की और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केशव प्रसाद उपाध्याय की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया, ताकि इस दुखद घटना का वास्तविक विवरण जनता तक पहुंचाया जा सके । तत्कालीन अध्यक्ष तारानाथ राणाभट और प्रतिनिधि सभा में विपक्ष के नेता माधव कुमार नेपाल को भी समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था । हालांकि, नेपाल समिति में नहीं बैठे और उन्होंने इस्तीफा दे दिया था ।
शेष दो सदस्यीय समिति ने जेठ २६ को अपनी रिपोर्ट सौंपी । कमेटी ने पूरी रिपोर्ट को तीन भागों में बांटा था । पहले भाग में समिति के गठन और कार्य प्रक्रिया का उल्लेख था । दूसरे भाग में घटना से संबंधित तथ्यों और आंकड़ों की प्रस्तुति थी । और, तीसरे भाग में, घटना के वास्तविक विवरण का उल्लेख किया गया था । लेकिन उस समय में भी समिति की रिपोर्ट को सामान्य स्वीकृति नहीं मिली । और आज भी काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जो इस घटना को साजिश के विभिन्न आयामों का परिणाम मानते हैं ।
बाबूराम भट्टराई सहित, जो उस समय जन संघर्ष में थे, उन्होंने यह दावा किया कि इस घटना की योजना एक विदेशी जासूस द्वारा बनाई गई थी । इस घटना को भव्य साजिश बताने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला नरसंहार के राज को सीने में दफन कर के पहले ही यह दुनिया छोड़ चुके हैं । उस समय प्रचंड बाबूराम, आदि ने राजा ज्ञानेन्द्र को खुलकर कटघरे में खड़ा किया था किन्तु, सत्ता में आने पर दरबार हत्याकांड को याद करने की हिम्मत उन्हें नहीं हुई । इतना ही नहीं उन्होंने तो राजा ज्ञानेन्द्र के साथ सत्तत्ता भी साझा किया । इसी सन्दर्भ में उस समय कांतिपुर दैनिक में बाबुराम भटराई का एक अत्यन्त ही सनसनीखेज आलेख प्रकाशित हुआ था जिसके बाद कांतिपुर के संपादक और प्रकाशक को गिरफ्तार भी किया गया था । जिसका कुछ अंश ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया जा रहा है इस सोच के साथ कि कहा गए वो दावे और कहाँ गए वो वादे ? या उस आलेख में भारत को लपेटना भी सिर्फ सत्ता प्राप्ति का साधन मात्र था जो यहाँ सत्ता प्राप्ति के लिए अक्सर होता आया है । प्रस्तुत है कान्तिपुर दैनिक में प्रकाशित ‘नयाँ कोतपर्वलाई मान्यता नदिउ’ का कुछ अंश—
“नारायण हिटी में जो घटना घटी वह पिछले ‘कोतपर्व’ की एक कड़ी मात्र है यह अब नेपाली देशभक्तों को समझ जाना चाहिए । आखिर इसी वक्त राजा वीरेन्द्र और उनके सम्पूर्ण परिवार की हत्या क्यों हुई ? साम्राज्यवादी और विस्तारवादियों की नजर में आखिर उनका मुख्य अपराध क्या था ? जो भी विचारधारा अपनाए जाएँ किन्तु सभी देशभक्त और ईमानदार नेपाली को यह निधड़क स्वीकार करना होगा कि सामन्ती वर्ग में पैदा होने के बाद भी राजा वीरेन्द्र की सापेक्ष देशभक्ति की भावना और उदार राजनीतिक चरित्र ही साम्राज्यवादी और विस्तारवादी की आँखों में उनकी सबसे बड़ी ‘कमजोरी’ और ‘अपराध’ था ।
२०४६ की एकतरफा भारतीय आर्थिक नाकावन्दी और उसके बाद के जनआन्दोलन के समय विस्तारवादियों के सामने झुकने की अपेक्षा उन्होंने जनता के समक्ष झुकने की जो प्रतिबद्धता दिखाई वही विस्तारवादियों को अच्छा नहीं लगा ।
पिछले चरण में खासकर नेकपा (माओवादी) के नेतृत्व में युगान्तकारी जनयुद्ध की शुरुआत के पश्चात् उसके विरुद्ध में स्वयं के प्रति परम्परागत रूप में वफादार शाही सेना परिचालन करने में उन्होंने जो आनाकानी की वह साम्राज्यवादी और विस्तारवादियों के लिलए उनका सबसे बड़ा ‘अपराध’ था ।
कतिपय मार्क्सवादी पण्डाओं ने इसी आधार पर हमें राजावादी कहा इस पर भी अब हम निधड़क यह कह सकते हैं कि कतिपय राष्ट्रीय प्रश्नों में राजा वीरेन्द्र और हमारे बीच में समान सोच थी और जिसके कारण कई प्रसंग में हमें साथ कर रहा था । इन बातों से विस्तारवादी और उनके दलालों का त्रसित होना बिल्कुल स्वाभाविक था ।
कुछ समय से यहाँ अमेरिका और चीन के बीच बढते गए अन्तरविरोध और अमेरिका और भारत के बीच बढते गए साँठगाँठ की पृष्ठभूमि में चीन और हम माओवादियों के साथ ‘नरम’ दिखने वाले राजा वीरेन्द्र अमेरिकी साम्राज्यवादी और मुख्यतः भारतीय विस्तारवादी की आँखों का काँटो बनना स्वाभाविक था ।
भारतीय विस्तारवाद की नीति नेपाल को सीधे ‘सिक्किम’ बनाने से पहले ‘भुटान’ बनाना और उसके बाद ‘सिक्किम’ बनाने का नया ग्राण्ड डिजाइन में बदला । सिआईए (दिल्ली में शाखा खोले एफबिआई द्वारा) की सहमति में ‘रॉ’ ने इस नीति सम्बन्धी रणनीति का तर्जुमा किया ।
दन्त्य कथा के चालाक सियार द्वारा ‘ चील आया’ हल्ला कर के मुर्गा चुराने की तरह ही आईएसआई का हौवा खड़ा कर के ‘रॉ’ ने दरबार के भीतर अपनी पहुँच बनाई और ‘भुटानीकरण’ के निमित्त नया ‘जिग्मे सिंघे’ द्वारा दरबार भीतर इस ‘कोतपर्व’ का मञ्चन किया । पहले ही गिरिजा के रूप में ‘लेण्डुप दोर्जे’ पाए हुए ‘रॉ’ ने अब ‘जिग्मे सिंघे’ और ‘लेण्डुप दोर्जे’ का नया गठबन्धन नेपाल में कराकर ‘भुटानीकरण’ होते हुए ‘सिक्किमीकरण’ करने की बृहत् रणनीति कार्यान्वयन करने की बात में अब कोई शंका किसी को नहीं होनी चाहिए ।
इस स्थिति में देशभक्त नेपालियों का नयां दायित्व क्या होना चाहिए ? हमारे पार्टी के अध्यक्ष क. प्रचण्ड द्वारा जारी प्रेस वक्तव्य सम्पूर्ण देशभक्त नेपाली को नए ढंग से सोचने और नए आधार में नया एकता कायम कर आगे बढने का आह्वान कर चुके हैं ।
इस बात को गम्भीरतापूर्वक लेने के लिए जोर देते हुए हम सभी देशभक्त, जनवादी और वामपन्थी शक्तियों के साथ विनम्र आग्रह करते हैं और जिस तीव्रता के साथ हम आगे बढ रहे हैं उसी तीव्रता में हमें हमारी सोच और गतिविधि को भी ऊँचाई पर पहुँचाना होगा ।
आज के इस ऐतिहासिक मोड़ में हम अगर थोड़ी भी गलती करते हैं तो उस गलती से देश और जनता के निमित्त भयङ्कर दुष्परिणाम आ सकता है । हमारी एक बुद्धिमतापूर्ण कदम नेपाल और नेपाली को इक्कीसवीं शताब्दी में गर्व करने लायक स्थान पर पहुँचा सकता है ।
इस लिए सर्वप्रथम हम इस नए ‘कोतपर्व’ के पीछे के ‘ग्रायण्ड डिजाइन’ और उनके सूत्रधारों को अच्छी तरह से पहचान कर जनता के समक्ष नंगा करना होगा और अब इस ‘ कोतपर्व’ को वैधानिकता देने से दृढतापूर्वक अस्वीकार करना होगा ।”
ये दावे थे या यूँ कहूँ कि महज खोखले दावे थे मर्माहित जनता को उकसाने के लिए क्योंकि सत्ता में आने के बाद इनकी ओर से और उसके बाद आज तक के सभी शासकों की ओर से नेपाली जनता को मौन ही मिला । जनता आज भी उस सच को जानना चाहती है ।
१९४६ के राजनीतिक परिवर्तनों के बाद, राजा बीरेंद्र ने संवैधानिक दायरे और गरिमा के भीतर रहकर नेपाली लोगों को लोकप्रिय संरक्षकता की गारंटी दी थी । हालाँकि, राजा और शाही परिवार की मृत्यु ऐसे समय में हुई जब नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार अपनी अलोकप्रियता और विवाद के चरम पर थी, जबकि देश में माओवादी नेतृत्व वाला गृहयुद्ध गति पकड़ रहा था
मूलधार के राजनीतिक पार्टियों का एक समूह उस समय आन्तरिक द्वन्द्व का राजनीतिक समाधान के लिए प्रयत्नशील था । द्वन्द्वरत माओवादी के प्रतिनिधि भी सगोत्री एमाले नेताओं के साथ विभिन्न सम्पर्क द्वारा राजदरबार के साथ कार्यगत एकता के नाम में संवाद में मशगूल थे । देश के भीतर राजनीतिक स्थिरता के लिए हो रहे प्रयत्न के बीच ०५८ जेठ १९ गते नेपाली सेना की मजबूत सुरक्षा घेरा के बीच राजपरिवार की इहलीला समाप्त हो गई ।
सबसे दुखद बात यह है कि गणतंत्र के आगमन के बाद, प्रधान मंत्री बनने वाले शीर्ष नेता पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की सक्रियता और सार्वजनिक असंतोष के उनके भावों के जवाब में ही शाही महल हत्याकांड की जांच करने की धमकी देते रहे हैं । विडंबना यह है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस मामले की जांच के लिए तैयार ही नहीं है । उन नेताओं की चुप्पी, और भी रहस्यमय है जो एक समय नेपाली शब्दकोश के सभी अप्रिय और असहिष्णु शब्दों का इस्तेमाल करते थे और राजा ज्ञानेंद्र को शाप देते थे । वास्तव में इस घटना की विश्वसनीय जांच के अभाव में राजा ज्ञानेंद्र के साथ सबसे बड़ा अन्याय हुआ है । वह खुद भी कुछ हलकों द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब देने के अवसर से वंचित रहे हैं ।
पूर्व राजा ज्ञानेंद्र ने पिछले साल इसी समय ट्विटर पर दिल को छू लेने वाली लाइन लिखी थी, ‘एक ऐसा हृदय का चोट जो कभी भूल नहीं सकता । साथ और सम्बन्ध के खत्म होने का अधिकार सिर्फ नियति को है । अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर पाने के लिए अब भी समय ना जाने कितने करवट बदलेगा पता नहीं ।’
वो अनुत्तरित प्रश्न जो आज भी सामान्य जनमानस के हृदय को परेशान करते हैं कि, आखिर हत्याकांड में मारे गए किसी भी व्यक्ति को बिना पोस्टमार्टम के जल्दबाजी में क्यों जला दिया गया ? इतने बड़े हत्याकाँड के जाँच के लिए बनी तीन सदस्यीय समिति ने सात ही दिन में कैसे जाँच कर लिया ? जबकि तत्कालीन एमाले सचिव माधव नेपाल ने तीन सदस्यीय समिति से पहले ही इस्तीफा दे दिया था जिसकी वजह से वह समिति ही अवैधानिक हो गई थी । नरसंहार की जगह त्रिभुवन भवन को क्यों आनन–फानन में ध्वस्त कर दिया गया ? आखिर घटना के सबूतों को क्यों छुपाया गया ?
जांच कमेटी ने पुष्टि की थी कि हत्या में कई तरह की गोलियां चलाई गईं । लेकिन केवल एक व्यक्ति की पहचान शूटर के रूप में हुई यह कैसे संभव था ? वहीं दूसरी ओर कहा गया कि शूटर तत्कालीन राजकुमार दीपेंद्र थे । हालांकि, किसने और कैसे गोली मारी, यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है । तत्कालीन राजा बीरेंद्र के वंश के विनाश के बाद राजा बने ज्ञानेंद्र शाह ने मृतक की संपत्ति को उसके नाम पर हड़बड़ी में स्थानांतरित करने और लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की बागडोर लेने की जल्दबाजी को सकारात्मक रूप से नहीं देखा जा सकता । यह बात भी दरबार नरसंहार की एक श्रृंखला के रूप में देखा जा सकता है ।
राराताल में परिवार के सदस्य प्रेक्षा शाह (धीरेंद्र शाह की पत्नी) की मौत भी रहस्यमय तरीके से हुई थी । इस घटना को आज भी आम लोग भी दरबार हत्याकांड की कड़ी में ही जोड़ते हैं । तथ्य यह है कि दरबार हत्याकांड पूरी तरह से आज भी एक रहस्य बना हुआ है, इसकी ठीक से जांच हुई होती तो आज यह सवाल बार–बार नहीं उठता । जनता अपने प्रिय राजा को याद तो करते किन्तु इस कसक के साथ नहीं करते कि आखिर दोषी कौन है और कहाँ है ?
०५८ जेष्ठ १९ गते की रात नेपाल के इतिहास की वो काली रात है जिसमें कई निर्दोष जान चली गई थी । अतीत के गर्भ में छुपे इस रहस्य के खुलने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती । जानकार के अनुसार राजपरिवार के दस व्यक्तियों ने अपनी जान गँवाई थी पर सम्भावना इससे अधिक की है जिसका खुलासा भी नहीं हो पाया । तत्कालीन राजा वीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्या, युवराज दीपेन्द्र, अधिराजकुमार जिराजन, अधिराजकुमारी श्रुति, शान्ति राज्यलक्ष्मी, शारदा राज्यलक्ष्मी, शहजादी जयन्ती राजलक्ष्मी,शाह कुमार खड्ग विक्रम शाह,धीरेन्द्र शाह आदि इस हत्याकाण्ड के शिकार हुए थे । नेपाल का इतिहास जब भी पलटा जाएगा तो इस मर्माहत कर देने वाली घटना लोगों को जरूर सोचने पर विवश करेगी कि आखिर इसके पीछे का राज क्या है ?

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– हिमालिनी मासिक, मई (२०२२) अंक से

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