गोद/(कहानी) : सरोज दहिया
सरोज दहिया
हरदेवा को ईश्वर ने माँ की बजाय उसकी दादी की गोद में दे दिया, माँ तो अपना दूध तक न पिला सकी थी, नन्हें शिशु को जन्म देकर कुछ ही देर में परलोक गामिनी हो चुकी थी, बूढ़ी सास आँसूओं से भरी आँखें और छाती से चिपकाये नन्हें पोते को हर का नाम लेकर पाल रही थी, सम्भवतः शिशु का नाम ‘हरदेवा’ भी इसलिए रख छोड़ा था, ज्यों ज्यों हरदेवा बड़ा होता गया आँगन की मनहूसी तो कम होती गई उसकी बाल लीलाओं से लेकिन बूढ़ी दादी को बहू का अभाव भीतर से तोड़ता जा रहा था, पाँच एकड़ नहरी जमीन खाने पीने रहने की कमी नहीं लेकिन विधुर बेटे को देख देख कर बूढ़ी मन्नो भीतर भीतर कुढ़ती, बेटा तो घर खेत के काम में उलझा रहता लेकिन मन्नो को तो हरदेवा के लिए माँ और बेटे रामसिंह के लिए घरवाली ले आने की धुन सवार हो चुकी थी, मेहनत रंग लाई और जब हरदेवा पाँच साल का हुआ तो उसकी सोलह साल की नई माँ चंदा ने घर में प्रवेश किया ।
सोलह साल की नई बहू की गोद में पाँच साल के पोते हरदेवा को बिठा कर मन्नो आँसूओं से भरी आँखें और काँपती आवाज में बोली, “ले बहू ! आज से तू ही है इसकी माँ, सिर पर हाथ रखकर एक बार बेटा कह दे मेरी चँदा ; साथ ही अबोध हरदेवा को भी दादी ने आदेश दिया, “यह माँ है तेरी, माँ कह तो जरा ।
न बालक हरदेवा माँ बोल पाया और न सोलह साल की दुल्हन चँदा उसे बेटे का सम्बोधन दे सकी, सास की बात का मान रखते हुए उसने गोद में बैठे हरदेवा के सिर पर अपना हाथ रख दिया और घुंघट में मुस्कान बिखेर दी, उसे हरदेवा में अपने छोटे भाई की छवि दिखाई दे रही थी जिसे आज वह मायके छोड़ आई थी । घर आँगन में बहार लौट आई, नई बहू चँदा ने मन्नो को हर चिंता से मुक्त कर दिया था, हरदेवा और चँदा में सगे भाई बहन सा प्रेम नित बढ़ता चला, न जाने कब हरदेवा चँदा को माँ चंदा कहकर बुलाने लगा और चँदा उसके नाम के साथ प्रेम से भाई सम्बोधन लगा बैठी, अब वे एक दूसरे से माँ चंदा और भाई हरदेवा का सम्बोधन पाने लगे, मन्नो की आंखें देख देख तृप्त होती ।
चँदा ने एक एक कर तीन बच्चों को जन्म दिया, दो बेटियों के बाद तीसरा बेटा हुआ तो हरदेवा ने उसे अपनी पसंद का नाम दिया, “रामपाल” । चँदा के तीनों बच्चों में तीन तीन साल का अंतर था; हरदेवा चँदा माँ की सबसे बड़ी बेटी से आठ साल बड़ा था ।
जब हरदेवा ने मिडिल स्कूल पास किया ठीक उसी समय परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट गया, हरदेवा के पिता खेत में जहरीले कीड़े के डंक को न झेल पाये और दादी मन्नो से पुत्र वियोग सहन न हो सका ।
अब तक हरदेवा मात्र पंद्रह साल का किशोर था, परिवार पर आई विपत्ति ने उसे प्रौढ़ जैसा बना दिया था, मांँ चंदा चाहती थी वह हाई स्कूल पास करे लेकिन वह हठ ठान बैठा, “माँ चँदा ! नहीं सम्भाल पाओगी तुम घर –खेत दोनों साथ साथ, धरती बंटाई पर देने से सब आधा मिलेगा, मैं नहीं जाऊंगा स्कूल, रामपाल को खूब पढ़ाऊंगा, अभी खेत को मेरी जरूरत है ।” माँ चँदा उसका मुँह देखने लगी उत्तर रहा ही न था और देखते ही देखते हरदेवा ने हल की मूठ थाम ली, पिता के परिवार की जिम्मेदारी पूरी करना ही अब उसका पहला धर्म था । माँ चँदा उसके खाने पीने का विशेष ध्यान रखती, दूध–दही–घी भरपूर देती, उसका भाई हरदेवा, उसका सौतेला बेटा हरदेवा उसका सबसे बड़ा हिमायती, सबसे बड़ा सहारा बन गया, माँ घर और बच्चे सम्भालती बेटा खेत में सोना उपजाने लगा ।
चार साल निकल गए, हरदेवा युवा हो चुका था, पूर्ण युवा, खेत के हाड़ तोड़ काम ने युवक हरदेवा को एक अद्भुत सौंदर्य प्रदान किया था, लाल टमाटर सी रंगत, चौड़ी छाती, ऊँचा कद, रिश्ते की कमी नहीं लेकिन हरदेवा रिश्ता लेकर आने वालों के सम्मुख आता ही न था, चँदा को उसके विवाह की चिंता खाए जा रही थी जो अभी तक सिर्फ हरदेवा की उदासीनता के कारण न हो पाया था, एक दिन उसने खाना खाते हरदेवा पर प्रश्न उछाल दिया, सुनकर बोला,“नहीं, नहीं माँ चँदा, घर को नरक मत बनाओ, न जाने कोई कैसी आये, बहनें बड़ी होती जा रही हैं पहले इनका विवाह जरूरी है उसके बाद रामपाल को धूमधाम से ब्याह लेंगे, मेरे विवाह के विचार को मन से निकाल दो। “चँदा कुछ देर चुप रहकर बोली,“रामपाल की बहू से तेरा घर बस जायेगा क्या ? यह समय निकल जायेगा तेरी जिद्द में उसके बाद पछतावा ही रहेगा । हरदेवा चुप रहा, एक दिन आ गई घर में हरदेवा की दुल्हन कांति ।
चँदा और कांति सास बहू नहीं अपितु सगी बहन ही लगती थी, आयु में महज बारह चौदह साल का अंतर, दोनों सुघड़, दोनों समझदार और परस्पर प्यार भी नित बढ़ता चला, एक दूसरी को अच्छी तरह समझती, घर में स्वर्गानन्द आकर विराजमान हो गया, धीरे धीरे कांति भी दो बेटों की माँ बन गई थी, चँदा की दोनों बेटियां विवाहित होकर अपने घर चली गई, चँदा और हरदेवा का सपना तोड़ने के लिए रामपाल ही काफी निकला, बड़ी मुश्किल से मैट्रिक पास की, उसके बाद कालिज की पहली कक्षा में ही दो बार फेल होकर निट्ठल्ला –आवारा लड़कों के संग साथ घूमना, अच्छा खाना, अच्छा पहनना, रौब जमाना उसका जन्मसिद्ध अधिकार क्यों कि हरदेवा ने उसे कभी काम को हाथ लगाने नहीं दिया उसकी हार्दिक इच्छा थी कि रामपाल पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बने लेकिन खेतिहर हरदेवा और भोली माँ चँदा को जब रामपाल के राह रस्ते का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।
देहाती विचार धारा कि सुंदर दुल्हन आवार पति की नकेल होती है, अपना काम कर गई, आ गई रामपाल की नई नवेली सुंदरी दुल्हन सुनीता, नये जमाने की युवती, अपने शौक पर कितना भी खर्च हो परिवार के लिए एक पैसा दुखदाई, पाँच एकड़ नहरी भूमि की उपज आमदनी का मन मन लेखा जोखा चलता और खर्च उनका था ही कितना, सब जेठ हरदेवा का ही तो है, हम दो ये चार, भूमि पर हिस्सा बराबर, रामपाल का रौब तो सभी सह लेते थे लेकिन सुनीता का रौब कौन सहता भला, रामपाल चारों भाई बहनों में सबसे छोटा था शुरू से ही हरदेवा ने उसे सिर आंखों पर रखा था इसलिए हरदेवा की पत्नी कांति भी देवर का पूरा ख्याल रखती थी लेकिन सुनीता ने पूरे घर की दो साल भीतर ऐसी काया पलट की कि भीतर भीतर सुलगने वाली आग ने एक दिन घर में महाभारत करवा ही दी, कांति और सुनीता माँ चँदा के सामने अलग अलग तो अनेक बार एक दूसरी की शिकायत कर चुकी थी लेकिन चँदा दोनों को अलग अलग इस कदर समझाती कि बात दब जाती, काँति माँ चँदा के ज्यादा नजदीक थी और यह बात सुनीता के गले की फाँस, उसे नहीं पता था कि हरदेवा और कांति ने त्याग और तपस्या का बीज माँ चंदा की मनोभूमि पर गहरा बो कर विश्वास और प्रेम की फसल उगा रखी है, उसे तो बस यह लगता कि हरदेवा और कांति सौतेले बेटे बहू हैं और इन्होंने माँ पर अपना जादू किया है अंत में सब ठग लेंगे हमें कुछ नहीं मिलेगा जितना जल्दी हो सके माँ चँदा को इनके चँगुल से मुक्त कराया जाये ।
आज दोनों देवरानी जेठानियों का क्रोध पूरे उफान पर था, एक दूसरी पर तरह तरह की कीचड़ उछाली जा रही थी, कांति उसे घरतोड़ू बता रही थी तो सुनीता उसे मीठी ठगिनी जिसने पूरे परिवार पर मीठी मीठी बोलकर जादू कर रखा है, जादूगरनी का जादू सुनीता के अनुसार उसे खत्म करना आता है ; माँ चँदा कुछ देर हैरान परेशान सी होकर पूरे हक के साथ बड़ी बहू को बोली, “तू ही ठण्डी रह ले, यह चुप नहीं होने वाली ।”
चँदा ने कांति को समझदार समझ कर उसे ठण्डी रहने के लिए कहा, सुनीता के लक्षण तो उसे सुहाते भी नहीं थे, सुनीता ने कभी परिवार को परिवार जाना ही नहीं, वह अपने और अपने पति तक सीमित थी, जेठ के दोनों बच्चों तक को पास नहीं फटकने देती थी, जो कांति कभी सास के सामने नहीं बोली आज सास की बात ने जले पर मानों नमक छिड़क दिया, बोली, “हां हां, तू भी मुझको ही कहेगी, यह तो तेरी लाडली बहू है न, मेरा क्या? हम तो सौतेले हैं ।” कांति की बात सुनकर माँ चँदा सिर थाम कर बैठ गई, सौतेले शब्द ने उसके हृदय पर दनादन प्रहार करना शुरू किया, आँखों के सम्मुख अँधेरा छा गया, उसे इस तरह अचानक बैठी देख कांति घर से निकल घेर में जा बैठी और रोने लगी, आज उसे रामपाल का बालरूप याद आ रहा था, रामपाल देवर नहीं उसने हमेशा अपना बेटा सा जान उसका हर नखरा हँसते हुए झेला था, आज उसकी बहू उसे ठगिनी जादूगरनी बता रही है, उसकी सेवा का आज यह फल मिल रहा है यह सोच सोच कर वह रोये जा रही थी ।
सुनीता ने माँ को सहारा देकर उठा लिया और चारपाई पर लिटा दिया था आज वह सास को सिर्फ अपनी बनाकर दम लेगी, उसे पानी भी पिलाया, पास में बैठी भी लेकिन चँदा चुप लगा चुकी थी आज उसके पास जैसे किसी को कुछ कहने के लिए एक शब्द भी नहीं था ।
हरदेवा के दोनों बेटे स्कूल में गये थे, हरदेवा खेत में और उसकी पत्नी घेर में बैठी रो रही थी, उधर रामपाल ताश मण्डली से उठकर खाना खाने आया, आहट पाकर चँदा ने ओढ़नी से अपना मुंह ढक लिया मानों सोई हुई हो और सुनीता ने रामपाल को अपने ढ़ंग से भली भांति समझा दिया था ।
हरदेवा खेत से लौटा, कृषि यंत्र घेर में रखे जाते थे, पशुबाड़ा भी घेर में, पत्नी का घेर में दिखाई देना नई बात नहीं थी, कांति ही पशुओं की देखभाल दाना–चारा, खोलना बाँधना, दूध दुहना सब करती थी, आज उसे वहां असमय बैठी देख हरदेवा ने कुछ गौर किया तो उसे रोती पाया, उसने कंधे से कस्सी उतार कर एक कोने में रख दी और पास आकर पत्नी के कंधे पर हाथ रख कर रोने का कारण पूछा, सब सुनने के बाद वह पत्नी को समझाते हुए बोला, “तू बड़ी है इसलिए यकीन करके तुझे चुप रहने को कहा होगा चँदा माँ ने, माँ के मन में खोट नहीं है।” पति की बात सुनकर वह और ज्यादा रोने लगी, हरदेवा ने मिन्नत सी की, वह पत्नी को अच्छी तरह समझता था उसके विवाह को चौदह साल हो चुके थे, न माँ ने कभी काँति की शिकायत की न कांति ने कभी माँ के विषय में कोई ऐसी वैसी बात की, यह सिर्फ गलतफहमी है घर जाकर माँ से सब पता चल जाएगा कि उसके भाव क्या थे और वह पत्नी को साथ लेकर घर की ओर हो लिया ।
देहरी पर कदम रखा ही था कि रामपाल ने गालियों की बौछार कर दी, “अकेले रहे थे अब तक सब मनमर्जी से किया, मेरा विवाह नहीं सुहाया तुमको, बहुत हो गया, अब अलग होना ही होगा । “हरदेवा हक्का बक्का देख सुन रहा था, अलग होने की बात सुनकर बोला, “हो जा न्यारा, दो दिन में पता चल जाएगा। “बंटवारा शुरू हो गया, माँ चँदा जो आज तक घर की मालकिन थीं, खटिया पर बैठी देख रही थी, हरदेवा ने रामपाल को लक्ष्य कर कह दिया था जो तुझे लेना हो ले ले जो बचेगा वह मेरा, रामपाल काठबुद्धि यह सुनकर भी अड़ा रहा था, घेर रहने के लिए चुन लिया, पशु बाट दिये, जमीन का बटवारा हो गया, हरदेवा की माँ का मायके से आया सामान हरदेवा के लिए छोड़ दिया और माँ चँदा की संदूक घेर में पहुंच गई, लाचार माँ भीतर भीतर रो रही थी, बड़ी बहू के मुख से सुना सौतेला शब्द उसे आज ही लीलना चाहता था लेकिन सांस डोर अपने हाथ में नहीं कि तोड़ कर फेंक दी जाये ।
जब सारा सामान घर में पहुंच गया तब रामपाल अकेला घर आया जो अब उसका नहीं अपितु उसके सौतेले भाई हरदेवा का हिस्सा था और माँ को बाजू से पकड़ कर उठाते हुए बोला, “माँ ! चल यहाँ क्यों बैठी है, सौतेले कभी अपने नहीं हुआ करते ।” चँदा लाचार चँदा अपने सगे बेटे के साथ हो ली । शाम को सुनीता ने खाना बना कर सास को थाली पकड़ाई, उसने पूछा, “रामपाल कहाँ है ? उसे आ जाने दे, साथ साथ खा लेंगे । “सुनीता ने जो उत्तर दिया उसने माँ चँदा के हृदय को बुरी तरह चीर दिया था। बोली, “वे क्या कौर बनाकर देंगे, खा पी कर आराम करो । “चँदा जब से ससुराल आई, कभी अकेली ने नहीं खाया, पहले सास और हरदेवा के साथ खाती थी फिर अपने बच्चे भी हो गये तो सभी बच्चों को पहले खिला कर पति को खिलाती तब सास बहू साथ खाती, पति और सास के चले जाने के बाद हरदेवा के खाने पीने का विशेष प्रबंध रखती और खुद अपनी दोनों बेटियों के साथ सबसे पीछे खाती, हरदेवा के साथ अक्सर रामपाल होता, बेटियां गई बहू आ गई, एक बार फिर घर बच्चों से गुलजार हुआ, एक बार फिर सास बहू का प्यार घर में पला लेकिन आज …..।
चुपचाप थाली पकड़ ली आँसूओं को साथ पीते हुए आधी रोटी किसी तरह निगल कर थाली खटिया के नीचे सरका दी गई; घुन गेहूं को जिस तरह थोथा कर देता है इस अलगाव ने माँ चँदा को इस तरह भीतर से थोथी कर दिया, चिंता से बीमारी आई और बैठ चुकी खाट पर, अभी अलग हुए सिर्फ छः महीने हुए थे, छः महीने पहले तक माँ चँदा का दमकता हुआ चेहरा काली काली झुर्रियों से भर गया, अब खाना हर रोज कम होता छुट रहा था, रामपाल को कहा था डरते डरते कि जाकर बहनों को ले आये, मिलना चाहती थी मौत से पहले, वह बहनों को जाकर बता आया था कि माँ ने बुलाया है बीमार है, अलगाव हो चुका, मेरा बसता हुआ घर हरदेवा की बहू को नहीं सुहाया, सौतेले तो सौतेले ही होते हैं ।
दोनों बहनें माँ से मिलने आई, माँ की बुझी बुझी आँखें और झुर्रियों से भरा चेहरा देख दोनों बेटियों को दुख तो होना ही था, पिछले साल जब बेटियां आई थी तो माँ का चेहरा दप दप दमकता था, भरा पूरा परिवार, माँ का पूरा मान सम्मान, लेकिन अबकी जो देखा वह बेटियों को रूला देने के लिए काफी था, किसी तरह दिन कट गया, रात के एकांत में तीनों माँ बेटियों की गुफ्तगू हुई, बेटियां माँ के दर्द को जान चुकी थी, माँ बोली, “मेरे ऊपर तो पहरा है, तुमको कौन रोक लेगा, बड़े भाई से मिल कर जाना । “दोनों बहनों को भी हरदेवा से विशेष प्रेम था, अलगाव उन्हें भी कष्ट दे रहा था, माँ की बात को बेटियां कैसे टालती, सुबह सवेरे उठ कर दोनों हरदेवा के घर की ओर हो ली; रविवार का दिन था, दोनों बच्चे अभी सोये थे, हरदेवा और कांति ने दोनों को हाथों हाथ लिया, प्रेम आवेग पर था, तीनों ननद भाभी अलगाव से कष्ट पाकर रो रही थी, हरदेवा सहज भाव से समझा रहा था, “दो बर्तन कभी न कभी तो टकराते ही हैं, रामपाल सुखी रहे माँ चँदा खुश रहे हम इसी में खुश ।” माँ का नाम आया तो माँ की बीमारी का जिक्र होना लाजिमी था, सुनकर हरदेवा चिंतित हो उठा, छः महीने पहले जब माँ रामपाल के साथ चली तब से आज तक माँ याद बनकर रह गई थी, चँदा को यहाँ आने नहीं दिया गया और हरदेवा वहाँ जाता कैसे रामपाल की गालियों की बौछार उसके पैरों की बेडÞियां बन चुकी थी, यहाँ तक कि चाची के खौफ से हरदेवा के लड़के भी दादी के पास नहीं जा पाये थे ।
जब बहनें उठकर चलने लगी तो हरदेवा बोला, “रूको ! मैं भी चलता हूं तुम्हारे साथ माँ चँदा को देखकर आऊँगा, हरदेवा को सुनकर कांति के चेहरे पर भी सचमुच कांति झलक उठी, बच्चे बुआओं की आवाज सुनकर पहले ही जाग चुके थे, बुआओं से सटकर बैठे सारी बात सुनकर समझने की चेष्टा में लगे थे, पिता को सुनकर दोनों चहक उठे, हम भी जायेंगे दादी से मिलने ।
हरदेवा पत्नी बच्चों और बहनों के साथ रामपाल के घर आया और माँ चँदा का चेहरा देखकर सिहर उठा, यही हालत कांति की थी, बच्चों की खुशी दादी को देखकर लगभग काफूर हो चुकी थी, यह वह दादी नहीं थी, जिसे बच्चे जानते थे ।
रामपाल भाई को देखकर स्वयं को छुपा नहीं सका था और हरदेवा के पास आकर बैठ गया था, हरदेवा ने मन ही मन ईश्वर को याद कर लिया, सुनीता चाय की प्याली पकड़ा कर मुड़ गई, जेठानी को देखा तक नहीं, काफी देर इधर उधर की बातें होती रहीं, जब हरदेवा अपने घर लौटने के लिए उठा तो कांति और दोनों लड़के साथ साथ उठ खड़े हुए, हरदेवा ने हाथ जोड़ कर माँ चँदा से विदा मांगी, वह एक पल चुप रही फिर अपने सगे बेटे रामपाल की ओर देखा, अब हरदेवा को लक्ष्य कर बोल उठी, “रे भाई हरदेवा ! एक दिन तेरी दादी ने तुझे मेरी गोद में बिठाया था, आज तेरी इस मांँ चँदा को तेरी गोद की जरूरत है रे । “माँ के शब्द सुनकर एक क्षण में हरदेवा ने माँ चँदा को, अपनी सौतेली माँ चँदा को अपनी गोद में उठा लिया, आज माँ उसकी है सिर्फ उसकी, माँ चँदा को उसके भाई, उसके बेटे हरदेवा से कोई दूर नहीं कर सकता है, तेज तेज कदमों से हरदेवा माँ चँदा को गोद में उठाये अपने घर की ओर बढ़ रहा था, पत्नी बच्चे और दोनों बहनें पीछे पीछे थे, गली के लोग खड़े खड़े देख रहे थे ।
गांव हलालपुर
जिला –सोनीपत, हरियाणा भारत ।
मोबाइल नम्बर –91-9416315606


बहुत ही हृदयस्पर्शी लाजवाब कहानी…
अंत तक बाँधे रखने में पूर्णतः सक्षम
विभिन्न उतार चढाव के बाद सुखान्त बहुत ही अच्छा लगा ।
बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण कहानी पढ़ कर आँखें नम हो गई।लोक जीवन में कुछ साल पहले तक इस तरह के प्रकरण बहुत कहने-सुनने में आते थे।आज ना कोई चंदा माँ है ना कोई हरदेवा सा श्रवण बेटा।बहुत अच्छी लगी कहानी।👌🙏🙏🌹🌹🌺🌺
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