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अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक जुलाई 022।विश्वशक्ति की केंद्रीय भूमि अमेरिका; आर्थिक, भौतिक, सामरिक और शैक्षिक रूप में सर्वशक्तिशाली देश है । साथ ही औद्योगिक उत्पादन और अन्न–वस्त्र, शस्त्र–शास्त्र, खाद्य–पेय, रोग–व्याधि, औषधि–उपचार, षडयंत्र और संहार के व्यापार में भी सबसे बढ़ चढ़कर है । ५० राज्यों तथा विभिन्न अधीनस्थ क्षेत्रों को मिला कर बना ‘संयुक्त राज्य अमरीका’ के पास दुनिया की कुल संपत्ति का ४० प्रतिशत हिस्सा है । इस लिहाज से विश्व के खुशहाल देशों में गिने जाने के बावजूद आज के समय में वहां का जीवन त्राहिमाम अवस्था में पहुंच गया है । आए दिन गोलीबारी तथा हिंसा लगातार बढनÞे से यहां की धरती खून से लाल हो रही है और देश के लगभग सभी राज्य समान रूप से इसकी चपेट में पड़े हुए हैं । सेना, पुलिस के साथ ही आम नागरिक ‘वृद्घ, युवा के साथ साथ स्कूली बच्चों तक के हाथों में बंदूकें खिलौने की तरह उपलब्ध हैं ।’ जिसके कुछ दुष्परिणाम इस प्रकार प्रकट हो रहे हैं ।



अमेरिकी प्रांत इलिनॉयस शिकागो उपनगर में ४ जुलाई २०२२ की परेड के दौरान गोलीबारी में छह लोगों की मौत तथा ३० से अधिक लोग घायल हो गए । स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, एक बंदूकधारी दुकान की छत से परेड में शामिल लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी करने लगा । अमेरिका के ओकलाहोमा (इपबिजयmब) में गोलीबारी की घटना सामने आई है । ओकलाहोमा के टुलसा में एक हॉस्पिटल कैंपस की बिल्डिंग में हुई फायरिंग में चार लोगों की मौत हो गई । इससे पहले इसी साल २४ मई को अमेरिका के टेक्सास में फायरिंग की घटना सामने आई थी । इसमें १९ स्टूडेंट्स समेत २३ की मौत हो गई थी । २०२१– ६ मई को ‘इदाहो’ के एक मिडल स्कूल में छठी कक्षा में पढनÞे वाली एक छात्रा ने अपने बैग से अचानक हैंड गन निकाल कर क्लासरूम में गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिससे एक व्यक्ति तथा २ छात्राएं घायल हो गईं । ९ मई को सुबह ‘मैरीलैंड’ की ‘बाल्टीमोर काऊंटी’ में हमलावर द्वारा मकान में घुस कर गोलियां चला देने से ४ लोगों की मौत हो गई । १९ मई को ‘सान फ्रांसिस्को’ के ‘बे एरिया फ्री–वे’ पर २ लोगों द्वारा एक बस पर गोलियां चला देने से २ महिलाओं की मौत तथा ५ अन्य घायल हो गईं । हमलावरों ने कम से कम ७० गोलियां वहां चलाईं । २२ मई को ‘मिनियापोलिस’ शहर के मुख्य हिस्से में २ व्यक्तियों के बीच मामूली बहस के बाद हुई गोलीबारी की घटना में २ व्यक्तियों की जान चली गई तथा ८ अन्य घायल हो गए ।

२३ मई को ‘वाशिंगटन’ में २ स्थानों पर हुई गोलीबारी की घटनाओं में ५ लोगों की मौत तथा १७ अन्य घायल हो गए ।
२३ मई को ‘लास एंजल्स’ में एक रेस्तरां के बाहर यहूदियों पर हमला करने के आरोप में एक संदिग्ध को पकड़ा गया ।

२३ मई को दक्षिण कैलिफोर्निया के ‘ आरेंज’ में एक ६ वर्षीय बच्चे की उस समय गोली मार कर हत्या कर दी गई जब उसकी मां उसे स्कूल छोडनÞे जा रही थी । २६ मई को कैलिफोर्निया राज्य के ‘सान जोस’ में एक व्यक्ति ने एक रेल यार्ड में अंधाधुंध फायरिंग करके ९ लोगों की जान ले ली । २९ मई को ‘सैक्रेमैंटो’ के ‘न्यू ओककलयन्स’ में गोलीबारी की २ घटनाओं में एक नाबालिग लड़की सहित ३ लोगों की मौत हो गई । ३० मई को ‘लोरिडा’ में एक बैंक्वेट हाल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान भीड़ पर फायरिंग के परिणामस्वरूप २ लोग मारे गए तथा २५ घायल हो गए । २ जून को ‘लास एंजल्स काऊंटी’ के एक दमकल कर्मी ने दमकल केंद्र के भीतर गोली मार कर अपने एक साथी की हत्या तथा एक अन्य को घायल करने के बाद स्वयं भी आत्महत्या कर ली । २ जून को ‘फोर्ट वायन’ शहर के एक मकान में एक महिला तथा ३ बच्चों की गोली मार कर हत्या कर दी गई । ६ जून को ‘लोरिडा’ में एक पार्टी में फायरिंग से ३ लोगों की मौत व ६ घायल हो गए । उसी दिन ‘न्यू ओककलयांस’ में गोलीबारी में ८ लोग घायल हो गए । ७ जून को ‘मियामी’ के ‘होमस्टीड’ में एक व्यक्ति ने गोली मार कर अपनी प्रेमिका व एक १५ वर्षीय किशोर की हत्या कर दी तथा ३ अन्य को घायल कर दिया । १० जून को ‘लोरिडा’ के ‘रायल पाम बीच’ पर स्थित एक सुपर मार्कीट में फायरिंग के परिणामस्वरूप ३ लोग मारे गए ।

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१२ जून को ‘टैक्सास’ की राजधानी ‘आस्टिन’ में गोलीबारी की विभिन्न घटनाओं में १३ लोग घायल हो गए । १३ जून को ‘आस्टिन’, ‘शिकागो’ तथा ‘जार्जिया’ के सवाना में गोलीबारी की ३ घटनाओं में २ लोग मारे गए । १५ जून को ‘शिकागो’, ‘डेकेटर’ तथा ‘अलबामा’ में गोलीबारी की ३ घटनाओं में ७ लोग मारे गए । इस प्रकार पिछले पांच वर्ष का हिसाब देखें तो सिर्फ अमेरिका में ही हजारों ऐसी घटनाएं मिल जाएंगे जिसमे मारने वाला किसीको पहचानता भी नहीं था; जिसे वो मार रहा था । जिसे उसने गोलियों से भून डाला उससे उसकी कोई दुश्मनी नहीं थी । तो फिर ऐसा हो क्यों रहा है ? हमें उत्तर इसी का खोजना है ।

वैश्विक महामारी कोविड–१९ से जूझ रहे अमरीका में इस वर्ष सामूहिक हत्या की घटनाओं में काफी तेजी आई है तथा अमरीका में फायरिंग करके लोगों की जान लेने की २०० से अधिक घटनाएं हुई हैं । एक सामाजिक सर्वेक्षण के अनुसार अमरीका में २०१६ में ३२ प्रतिशत परिवारों के पास बंदूकें थीं जो इस समय बढ़ कर ३९ प्रतिशत हो गई हैं और प्रत्येक १० परिवारों में से ४ परिवारों के पास बंदूकें पहुंच चुकी हैं ।
अमरीका में बढ़ रही गोलीबारी की घटनाओं पर इंडियानापोलिस के उप पुलिस प्रमुख ‘क्रेग कैकार्ट’ का कहना है कि ‘‘लोगों ने अपनी समस्याएं जल्दी सुलझाने के जुनून में बंदूकों का सहारा लेना शुरू कर दिया है ।’’ अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि देश में बंदूक संस्कृति एक महामारी का रूप धारण कर रही है और यह अमरीका के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी का कारण बन रही है जिसे रोकना जरूरी है । अमरीका में ‘बंदूक संस्कृति’, लोगों में बढ़ रही असहिष्णुता और आसानी से हथियारों की उपलब्धता का दुष्परिणाम है । प्रेक्षकों के अनुसार यदि यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो अमरीका के लोगों में भय एवं असुरक्षा की भावना तो बढ़ेगी ही, इसके साथ–साथ वहां नस्ली दंगे भी शुरू हो सकते हैं जो अमरीका के वजूद के लिए खतरे की घंटी साबित होगी । वास्तव में सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं बल्कि पूरी युरोपेली सभ्यता ही नष्ट हो जाएगी । भारत तो सैकड़ों वर्षों से झेलता आ रहा है । वह अभ्यस्त हो गया है । और वह जानता है कि इस तरह के आतंकी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने का काम विश्व के बड़े–बड़े मुल्क बहुआयामिक तरीके से कर रहे हैं । जिसे कूटनीतिक तरीके से ही परास्त करने होंगे । इस कार्य के लिए मोदी जी शनै–शनै विपक्षियों को नंगा करते हुए आतंकियों का सफाया भी करते जा रहे हैं ।

वर्तमान में चल रहा रूस यूक्रेन युद्ध, जो नर संहार का ज्वलंत उदाहरण बना हुआ है; क्या इसमें अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अपना व्यापारिक और आर्थिक उल्लू सीधा करने का षडयंत्र नहीं रचा है ? कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि कोई पशु अपनी जाति के पशु पर हमला नहीं करता, भूखा हो, रक्षा करनी हो, तो आक्रमण करता है । लेकिन आदमी बेजरूरत मारता है । कभी–कभी तो ऐसा लगता है कि मारना होता है, इसलिए जरूरत पैदा करता है । कभी वियतनाम में जरूरत पैदा करता है, कभी कोरिया में जरूरत पैदा करता है, कभी कश्मीर में जरूरत पैदा करता है । कभी अफगान में, इराक में, श्रीलंका में तो कभी भारत, पाकिस्तान और यूक्रेन में; राष्ट्रवाद का उन्माद, धार्मिक भावनाओं भड़काना, कही जातीय, क्षेत्रीय तथा व्यापारिक षडयंत्र तो कहीं साम्राज्यवादी नरसंहारक प्रवृत्ति के कारण हिंसा करवाता है । वह हिंसा के लिए तर्क प्रस्तुत करता है । सब के सब अपनी अपनी तर्क की पोटली लिए बैठे है । आखिर हिंसा क्यों करना है । इसका कोई मौलिक और सर्वाग्राह्य तर्क को देना पड़ेगा न । यही से शुरु होता है षडयंत्र के झूठे तर्कपूर्ण जाल । काफिरों को मारो; जन्नत मिलेगा । विधर्मियो को मारो; स्वर्ग मिलेगा । धर्म परिवर्तन के लिए विध्वंश का तांडव मचाओ और फिर सेवा के नामपर धर्म परिवर्तन कर प्रभु के आशीष प्राप्त करो । और ध्यान रहे । करोड़ों लोग इस पुण्य कार्य में तन मन धन से समर्पित हैं । भाड़ में जाय । शिक्षा, समझ और प्रज्ञा । खुद को बदल नहीं सकते; चले संसार बदलने । ध्यान रहे । दूसरों को बदलने की प्रवृति ही हिंसा का जन्मदाता है ।

गौर से अध्ययन किया जाय तो हम पाएंगे की मनुष्य प्रकृतिगत स्वभाव से हिंसक प्राणी नहीं है । जबकि मांसाहारी पशु स्वभावगत रूप से हिंसक है । पशु की हिंसा उसकी आवश्यकता पूर्ति के लिए है । इसलिए वह भीषण हिंसा नहीं करता । परंतु मनुष्य ने हिंसा को अपनी शान और शोहरत के साथ जोड़ लिया है । इसीलिए कोई हिटलर लाखों लोगों को मौत के घाट उतार देता है । जापान के अणु प्रहार को याद करें । भारत में विदेशी आक्रांताओं के बर्बरता को याद कीजिए । नादिर शाह, स्टेलिन, माओत्से तुंग, ऐसे लाखों लोगों की कतार लगी है, जिस ने हिंसा अपनी मौज के लिए किया था । और मानवता को शर्मसार कर दिया था ।

कारण है; जीवन–ऊर्जा जब सृजन की राह पर गतिशील नहीं हो पाती है, तो वही अनायास ही विध्वंस में संलग्न हो जाती है । फिर उसकी अभिव्यक्ति के लिए विनाश ही विकल्प है । जो स्वयं को सृजनात्मक नहीं बनाता है, वह न चाहे तो भी उसकी जीवन–दिशा विनाशोन्मुख हो जाती है । आज व्यक्ति–व्यक्ति में, समाज में, राष्ट्र में––सभी में विनाश के लिए आकुलता है । यह विनाशोन्मुखता अंततः आत्मघात भी बन जाती है । विनाश का रस पैदा हो तो अंततः वह स्वयं को ही नष्ट करके मानता है । हत्यारे में और आत्मघाती में बहुुत फासला नहीं है । हिंसा की चरम परिणति आत्म–हिंसा है । मनुष्य के लिए हिंसा एक बीमारी है, मनुष्य के लिए हिंसा पशु से मिला हुआ संस्कार है । लेकिन उसकी विकसित चेतना के लिए रोकने वाली बीमारी है । चेतना जैसे ही विकसित होती है, वैसे ही उसका अतीत भी उसके लिए जंजीरें बन जाता है । जो विकासमान है, उसके लिए रोज ही उसका अतीत बंधन बन जाता है ।

क्योंकि मनुष्य का अतीत है, उसकी पशुता; उसका भविष्य है, उसका परमात्मा होना । लेकिन जो पशुता को अतिक्रमण न कर पाये, तो वह परमात्म भाव में प्रवेश ही नहीं कर सकता । और जिसे भविष्य को उपलब्ध करना है, उसे रोज अतीत के प्रति मरना होता है । और जो अतीत के प्रति नहीं मर पाता है, वह रुग्ण हो जाता है, वह बीमार हो जाता है । जैसे आज फिर से बैल गाड़ी से दिल्ली जाना पड़े; और चरखे से कपड़ा का उत्पादन करना पड़े तो को हमारी हालत होगी वही हालत भूत में अटके मनुष्यों की होती है । जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण अब अमेरिकी और यूरोपीय देशों में भी देखने को मिल रहा है ।

पशुता मनुष्य का अतीत है । हम सभी उस यात्रा से गुजरे हैं जहां हम पशु थे । वैज्ञानिक भी कहते हैं, और जो आध्यात्मिक हैं, वे भी कहते हैं । डार्विन ने तो अभी–अभी थोड़े ही समय पहले ही घोषणा की कि मनुष्य पशु से आया है । लेकिन महावीर ने, बुद्ध ने, कृष्ण ने तो हजारों वर्ष पहले यह घोषणा की थी कि मनुष्य की आत्मा पशु से विकसित हुई है । मनुष्य की पिछली कड़ी पशु की थी । और अगली कड़ी परमात्मा का है; पर कदम रखने के पहले उसे पिछली कड़ी को तोड़ देना पड़ेगा । इसके लिए विश्वव्यापी रूप में पाठ्यक्रमों में संशोधन करने होंगे । प्राणी मात्र के कल्याण को केंद्र में रखकर पाठ्यक्रम का निर्माण करना होगा । जो सृजनशीलता, सद्भाव, प्रेम, करुणा, आदि से ओतप्रोत होगा ।
ओशो कहते हैंः हिंसा का मतलब है ऐसा चित्त, जो लड़ने को आतुर है; जिसका रस लड़ने में है; जो बिना लड़े बेचैन हो जाएगा; जो बिना किसी को चोट पहुंचाए, दुख पहुंचाए सुख का अनुभव न कर सकेगा । जरा सोचिए, अब इसका क्या मतलब निकाला जाए ?

हिंसा आत्महिंसा का विकास है । भीतर जब हम अपने साथ हिंसा कर रहे होते हैं, तब वही हिंसा ओवरफ्लो होकर, बाढ़ की तरह फैलकर, किनारे तोड़कर स्वयं से दूसरे तक पहुंच जाती है । इसलिए हिंसक कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता, भीतर अस्वस्थ होगा ही । जो दूसरे के साथ हिंसा करना चाहता है, उसे अपने साथ बहुत पहले हिंसा कर ही लेनी पड़ेगी । वह पूर्व तैयारी है ।

इसलिए, हिंसा मेरे लिए अंतर्द्वंद्व है । दूसरे पर फैलकर दूसरों का दुख बनती है और अपने भीतर जब उसका बीज अंकुरित होता है और फैलता है, तो स्वयं के लिए द्वंद्व और अंतर–संघर्ष, और अंतर–पीड़ा बनती है । हिंसा अंतर–संघर्ष, अंतर–असामंजस्य, अंतर– विग्रह, अंतर–कलह की स्थिति है । हिंसा दूसरे से बाद में लड़ती है, पहले स्वयं से ही लड़ती और बढ़ती है । प्रत्येक हिंसक व्यक्ति अपने से लड़ रहा है ।
स्वभावतः जो चित्त दूसरे को दुख पहुंचाने को आतुर है, या जिस चित्त का दूसरे को दुख पहुंचाना ही एकमात्र सुख बन गया है, ऐसा चित्त सुखी नहीं हो सकता । ऐसा चित्त भीतर गहरे में दुखी होगा । एक बहुत गहरा नियम है कि हम दूसरे को वही देते हैं जो हमारे पास होता है; अन्यथा हम दे भी नहीं सकते । जब मैं दूसरे को दुख देने को आतुर होता हूं, तो उसका इतना ही अर्थ है कि दुख मेरे भीतर भरा है और उसे मैं किसी पर उलीच देना चाहता हूं । जैसे, बादल जब पानी से भर जाते हैं, तो पानी को छोड़ देते हैं जमीन पर; ऐसे ही, जब हम दुख से भीतर भर जाते हैं, तो हम दूसरों पर दुख फेंकना शुरू कर देते हैं । जो अंधकार हम दूसरों के घरों तक पहुंचाना चाहते हैं, वह अपने दीये को बुझाए बिना पहुंचाना असंभव है । अतः एक विक्षिप्त, जीवन से हारा हुआ, थका हुआ, दिशाहीन, पशु मानव से अकारण हिंसा के अलावा कोई दूसरा अपेक्षा भी हम नहीं कर सकते । उपरोक्त सभी हिंसक प्रदर्शन के पीछे का मानसिक कारण यही है । इस पर आधुनिक तरीके से ईमानदारी पूर्वक विश्व कल्याणार्थ शोध होना चाहिए । और अविलंब आवश्यक कदम उठाया जाना चाहिए । ऐसे कार्यों में देरी करना विश्व विनाश का कारण बन सकता है ।

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घृणा, स्वयं के जीवन को आनंद के शिखरों तक न पहुंचा पाना तथा अपनी कमजोरी और आत्मग्लानि को छुपाने के लिए दूसरों से किया प्रतिशोध जनक व्यवहार को कहते हैं । ऐसे ही शत्रुता, स्वयं से हारा हुआ व्यक्ति के भीतर उत्पन्न हीनता ग्रंथि के बाहरी प्रकाट्य है । ध्यान रहे । शत्रुता शत्रु के मिटने से समाप्त नहीं होता है । क्योंकि शत्रु बाहर है और शत्रुता चित्त में विद्यमान है । अतः शत्रुता के भाव को ही निर्मूल करना होगा । इसके लिए शिक्षा और संस्कार के आधार में परिवर्तन लाना होगा । गन संस्कृति के विरुद्ध अध्यात्म और प्रेम के संस्कृति को बढ़ावा देना होगा । जिससे युवावर्ग और समाज में शांति, अपनत्व का माहौल तयार होगा । लोगों में जीवन के प्रति आकर्षण और समर्पण का भाव पैदा होगा । निराशा, हताशा और असफलता जैसी कोई चीज नहीं रहेगी । सिर्फ जीवन के आनंद और प्रेम के उमंग रहेंगे ।
हमने अगर नादिरशाह, स्टैलिन और माओ की खाइयां देखी हैं, तो हमने महावीर, कृष्ण और क्राइस्ट की ऊंचाइयां भी देखी हैं । वे दोनों हमारी संभावनाएं हैं । खाइयां, हमारे अतीत का स्मरण है; ऊंचाइयां, हमारे भविष्य की आकांक्षाएं हैं । अतः ध्यान, प्रेम, शांति, धैर्य और सृजनशीलता भविष्य के आकांक्षाओं को पूर्ण करने का अकाट्य संबल है ।

सनातनियों ने ऐसे जीवन की तलाश की, जो दूसरे के जीवन के विरोध में न हो । उसको हमने परम जीवन कहा है । एक ऐसे सत्व की खोज, एक ऐसी स्थिति की खोज, जहां मेरा होना किसी के होने में बाधा न बनता हो । और अगर मेरा होना किसी के होने में बाधा बनता है, तो सनातनी इस होने को दो कौड़ी का मानता रहा है । ऐसे जीवन का क्या करेंगे, जो लाश पर ही खड़ा होता हो दूसरे की ? जो दूसरे को मिटा कर ही बनता हो; परंतु अमेरिका और यूरोप सदा दूसरों को मारने में ही अपनी सुरक्षा मानता आया है । इन्होंने आर्थिक, भौतिक और सामरिक लाभ के लिए प्रकृति और प्राणियों के साथ बर्बरतापूर्ण दोहन की सारी सीमाओ को पार कर चुका है । वही बर्बरता आज सामुहिक संस्कार में परिणत होकर आम व्यक्ति में सक्रिय हो चला है । जो महाविनाश का शंखनाद है । कमोवेश यही कारण अन्य देशों के साथ भी है । अतः विश्व मानवता को प्राणीमात्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए ईमानदारी पूर्वक गहन चिंतन करना ही होगा ।



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