विरोध और विध्वंस पर विमर्श से होगा विराम : अमिय भूषण
अमिय भूषण, हिमालिनी अंक जुलाई 022।भारत इन दिनों अतिवादी मुस्लिमों के निशाने पर है । भारत विरोधी प्रदर्शन और धमकियाँ अब आम हो चली है । ये सब एक खबरिया चैनल के चर्चा कार्यक्रम के बाद से शुरू हुआ । यह चर्चा ज्ञानवापी मंदिर मस्जिद प्रकरण में थी । बहस के दौरान पहले जहाँ मुस्लिम पक्ष प्रवक्ता ने हिंदू देवताओं का मजाक उड़ाया । वहीं इस बीच भाजपा नेत्री नूपुर शर्मा ने पैगम्बर मोहम्मद के बारे में एक आपत्तिजनक बयान दिया । जिसके बाद से चारों तरफ तूफान उमड़ पड़ा है । सांस्कृतिक थाती विरासतों को उनके मूल रूप में लौटाये जाने का मुद्दा कही पीछे छूट चुका है । अब चर्चा में न काशी और ना ही मथुरा है । कश्मीर मे आये दिन हो रही हिंदूओं की सुनियोजित हत्या भी फिलहाल चर्चा का मुद्दा नहीं रहा । नूपुर के बयान के बाद केवल विमर्श ही नही बदला है बल्कि मुस्लिम देशों से हमारे रिश्तों में भी तल्खी आई है । सोशल मीडिया पर पूरे प्रकरण के ट्रेंड करने के बाद से इन मुल्कों में भारतीय उत्पादों का बहिष्कार और भारत एवं भारतीयों के प्रति दुर्भावना भी देखने को मिली है ।
ऐसे में भारत के सहयोग, आपसी व्यापार और कुशल भारतीय कामगारों के भरोसे चलने वाले मुल्क भी अब भारत पर सवाल खड़ा कर रहे है । इनमे भारतीय पर्यटक और पानी पर निर्भरता वाले मालदीव भी है । वही भारतीय खाद्य सामग्रियों के आवक और भारत में बेहतर स्वास्थ्य सेवा का लाभ लेने वाले मुल्क भी है । बाकियों को छोड़ दें तब भी अकसर प्रतिबंधों को झेलने वाले ईरान के साथ भारत सहयोग मे खड़ा रहा है । मलेशिया से लेकर सऊदिया तक के हर मुस्लिम देश से भारत के व्यावसायिक रिश्ते रहे है । इंडोनेशिया से सांस्कृतिक तो मिश्र और तुर्किया से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का वर्षों पुराना नाता रहा है । जबकि बांग्लादेश का अस्तित्व अस्मिता ही भारत के दम पर है । ये सभी देश जानते है की भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ सभी को अपने विचार रखने और अपनी आस्था के अनुसार उपासना की पूरी छूट है । इसके बावजूद इस बयान के बहाने ये मुल्क भी भारत पर आक्रामक है । जबकि चीन से लेकर रूस तक मुस्लिम उत्पीड़न की खबरें अक्सर आती रहती है । चेचन्या और सिक्यांग मे तो शासन द्वारा दमन एवं नरसंहार होते रहते है । इसके बावजूद मुसलमानों के रहनुमा खामोश रहते है ।
दरसल नागरिक अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में इस्लाम और इस्लामिक मुल्कों का अतीत दागदार रहा है । ये सोच एवं व्यवहार के स्तर पर साम्यवादी चीन के समान है । अपने विचारों के अलावा किसी भी और धार्मिक सांस्कृतिक गतिविधि की इजाजत नहीं देते है । दुबई और अबुधाबी जैसे अरेबियन नगर महज अपवाद है । जहाँ व्यापारिक उद्देश्यों के नाते बहुसांस्कृतिक गतिविधियों की सीमित छूट दी गई है । वैसे इस पूरे प्रकरण के कई पक्ष और आयाम है । ये विश्वव्यापी विरोध और हिंसक प्रदर्शन कतई स्वाभाविक नही है । इसे महज पाकिस्तान द्वारा रचा और मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी के बयानों से भड़काया बता खारिज नहीं किया जा सकता है ।
वास्तव में इसके पीछे के मानस को समझने बुझने की भी जरूरत है । अगर इसका विचार करे तो निश्चित रूप से इसके पीछे मुस्लिम संगठनों का बड़ा हाथ है । पहले इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डाल कर प्रचारित किया गया । फिर कतर, कुवैत और ईरान की आपत्तियों को आधार बना कर लोगों को विरोध के लिए उकसाया गया । जहाँ बड़े मुस्लिम उलेमाओं ने इसके लिए माहौल बनाया । वही मौलवियों ने स्थानीय मस्जिद मदरसों के माध्यम से इसे हिंसक प्रदर्शनों मे बदल दिया । जिसकी परिणति सर धर से कलम जैसे नारे है । आखिर एक लोकतांत्रिक देश में किसी समुदाय को लोगों की जान लेने अधिकार कैसे है ? दरसल ये कोई पहली घटना नही है । संविधान और व्यवस्थाओं को धत्ता बताते हुए पहले भी डर का देशव्यापी माहौल खड़ा किया गया है ।

नागरिकता कानून से जुड़े एनआरसी और सीएए के मसले पर ऐसा हो चुका है । ये मुस्लिम आतंकियों की धर पकड़ पर हल्ला मचाते रहे है जबकि उनकी मौतों पर बवाल काटते हैं । इन्हें ट्रिपल तलाक और समान नागरिक संहिता स्वीकार्य नहीं है । देश में अदालत कानून होने के बावजूद इनके अपने शरई कोर्ट और काजी है ? इन्होंने पहले मजहब के आधार पर बाँट अलग मुल्क लिया वही इन्हें यहाँ इस्लामिक कायदे कानून वाली व्यवस्थायें भी चाहिये । इन्हें दूसरे समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने और उनके आराधना स्थलों के कब्जे एवं नुकसान पहुँचाने की खुली छूट हो । किंतु इनके ऊपर कोई सवाल ना उठाये अन्यथा ये हत्या फतवों से लेकर सामुहिक संहार तक कुछ भी कर सकते है । दरअसल इस्लाम का विश्वास और अतीत ही ऐसा है । ऐसे में इसे बजाये घटना मानने की जगह देश और नागरिकों के खिलाफ एक घोषित युद्ध मानना चाहिए । इसी सोच के साथ देश को एक सशक्त राष्ट्रीय कानून की जरूरत है ।

इस दिशा में केंद्र सरकार को झिझक तोड़ सबके विकास से पूर्व राष्ट्रीय अखंडता की सोचनी चाहिये । अन्यथा आज नूपुर की फाँसी की माँग वाले कल किसी के लिए जेल और सरे राह फाँसी की भी माँग उठा और गुंजाइश बना सकते है । मुस्लिम विरोधी बयान गुजरात दंगे और धारा ३७० हटाये जाने के नाते ये सरकार के शीर्षस्थ नेतृत्व से लेकर संघ भाजपा नेताओं की भी हत्याओं का फतवा जारी कर सकते है । हालिया इस घटना के बाद मतांध मुस्लिमों और आतंकी संगठनों की ओर से ढेरों चेतावनी संदेश भी आये है । वही इन सब के बीच देश का आम अवाम डरा है । वो मस्जिदों के आसपास से गुजरने से भी डर रहा है । हर आने वाले शुक्रवार ने उसे डरा रखा है । ऐसे में मुस्लिम समाज के बीच से भी अब कानून को काम करने देने वाला सहमति दिखना चाहिए । अन्यथा हिंसक प्रदर्शन और किसी अप्रिय घटना की प्रतिक्रिया गुजरात दंगों जैसे दुखांत घटना मे बदल सकती है । वही ऐसी हर प्रतिक्रिया देश के अमन शांति विकास और वैश्विक पहचान के लिए बुरा होगा । ऐसे में मुस्लिम समाज को अमन की पहल और सरकारों को भी दोषियों पर सख्ती बरतनी चाहिए । क्योंकि कई प्रादेशिक सरकार ने इसपे नरम रुख अपना रखा है । वैसे इस घटना क्रम को लेकर केंद्रीय विदेश एवं गृहमंत्रालय के सक्रियता की भी समीक्षा हो । आखिर महज एक बयान को लेकर हमारे राजदूतों को तलब करना और सार्वजनिक रूप से भारत सरकार द्वारा माफी जैसी माँग भला कोई देश कैसे कर सकता है । इन सबके बीच जब बयानों को लेकर माहौल बिगड़ा तो गृह मंत्रालय क्या कर रहा था ? जबकि इससे सप्ताह दिन पूर्व ही ज्ञानवापी प्रकरण को लेकर पीएफआई जैसे संदिग्ध संगठनों ने देश व्यापी प्रदर्शन किये । जिसमें हिंदू और ईसाइयों के खिलाफ उत्तेजनक नारे लगाए गए । वही इसी समय मुस्लिम जमीयत के मुस्लिम उलेमाओं सम्मेलन मे हिंदुओं के देश छोड़ने के बारे में कहा गया । जमीयत के एक गुट के अध्यक्ष मिया मदनी ने कहा जिन्हें हम से दिक्कत वो मुल्क छोड़ कर जा सकते है । वैसे अब राहत भरी खबर भी आ रही है । इस मुद्दे पर पड़ोसी देश नेपाल मे भारत समर्थक वातावरण बना है । यहाँ विभिन्न स्थानों पर मुस्लिम पक्ष के रवैये को ले विरोध प्रदर्शन किये गए है । जबकि पाश्चात्य जगत से भी इस अतिवादी रवैये के खिलाफ स्वर उठे है । नीदरलैंड के सांसद गिर्ट विल्डर्स ने अपने ट्वीटो से मुस्लिम अतिवाद की आलोचना की है ।
हत्या की धमकियों के बावजूद उन्होंने भारत पक्षधर बयान दिया है । इस बीच बदलते परिस्थितियों में कुवैत ने भारत विरोधी गैर नागरिक प्रदर्शनकारी को मुल्क निकाला दिया है । वही भारत में जमीयते उलेमा के एक धरे ने मौलाना काजमी के नेतृत्व में आगे आकर इसके लिए मुस्लिम संगठन एवं मजहबी नेताओं को दोषी बताया है । किंतु ये सनद रहे की अब तलक ये चुप थे । वही आने वाले वक्त में ये भी देखना होगा की इनका प्रभाव तंजीम और कौम पर कितना है । इसके बीच संघ एवं भाजपा के नेताओं के बिगड़े बोल पर भी रोकथाम की जरूरत है । इनके अटपटे और उत्तेजनक बोल अंततः संगठन के लिए परेशानी का ही सबब बन रहे है ।
इस नाते हर कोई बग्गा सा ट्वीट और गिरिराज सा बयान दे सफलता प्राप्त करना चाहता है । ऐसे में अब आवश्यक विमर्श निष्कर्षो तक नही पहुँच पा रहे है । आरक्षण को लेकर पुनर्विचार,एससी एसटी एक्ट,नागरिकता और कृषि सुधार कानून ऐसे तमाम मुद्दों पर ऐसा हो चुका है । भारतीय धर्म संस्कृति और मूल्यों के संरक्षनार्थ अखिल भारतीय कानून से देश अब भी वंचित है । वही हिंदूओं के पुरातन धरोहर विरासत सरकारी नियंत्रण में या फिर मुस्लिम समुदाय के कब्जे में है । इसको लेकर कोई शासकीय पहल नहीं है । देशव्यापी संपर्क कार्यकर्ताओं की फौज के बावजूद इन विमर्शों को स्थापित करने और बढ़ाने में संगठन और सरकार असमंज मे दिख रही है । इसके उलटे रूढि़वादी इस्लाम को समरस सह अस्तित्व वाले मजहब मे तब्दील करना अब प्राथमिकताओं में हो चला है । इसके लिए संवाद और सरकारी योजनाओं का पुरजोर उपयोग भी हो रहा है । जबकि इस्लाम की पहचान और जान ही आतंक एवं अतार्किक तथ्यपरक विचारों में है । यह सभ्यताओं को नष्ट और दूसरी नस्ल कौमों को नेस्तनाबूद करने के लिए बनी है ।
ऐसे में समस्याओं के फौरी हल की जगह ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है । इस दिशा में उत्तरप्रदेश में योगी सरकार के कदम एक नजीर है । किंतु आवश्यकता मुस्लिम संगठनों और मस्जिद मदरसों के गतिविधियों को सीमित करने की है । वही उपद्रवी एवं आतंकियों को परिवार सहित नागरिक अधिकार से वंचित करने की भी है । तभी जाकर भारत शांति और विकास के राह पर बढ़ पायेगा । अन्यथा ये समूह कभी ईशनिंदा तो कभी अग्निपथ योजना के नाम सार्वजनिक संपत्तियों को जलाता और देश को नुकसान पहुँचाता रहेगा ।

