राष्ट्रपति के ऊपर राजनीति
लिलानाथ गौतम:नपेाली कागं से्र आरै नके पा एमाले ने सबसे बडी पार्टर्ीीन कर दूसरी सं िवधानसभा में नयाँ जनादशे पा्र प्त किया है नयाँ जनादेश के साथ-साथ फिलहाल राष्ट्रपति परिवर्तन की बहस जारी है। 
राजनीतिक खेलाडी मे से कछु दलाने कहा है कि जसै भी राष्टप्रति परिवतर्न हाने चाहिए। लेिकन कछु कहते है यह समय संविधान निर्माण का है, राष्ट्रपति परि वतर्न का नही।विशष्े ातः दसू र े बड ेÞ दल क े रूप मे आग े आए नके पा एमाल े न े यह मद्दु ा उठाया है। उसका कहना है कि नयी सरकार निर्माण तथा संविधान निर्माण प्रक्रिया प्रारम्भ होने से पहले नयाँ जनादेश के अनुसार राष्ट्रपति परि वतर्न हाने ा चाहिए।
एमाल े क े इस मद्दु े म ंे साथ दिन े वाला ंे म ंे एकीकतृ नके पा माआवे ादी सहित कछु छाटे े दल भी ह।ंै उन सभी की माग एक ही है- निर्वाचन ने नयां जनप्रतिनिधि चयन किया है, इसलिए उक्त जनादेश अनुसार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भी परिवर्तन होना चाहिए।
इस मद्दु ंे पर सभी का अपना-अपना स्वाथर् निहित है। लेकिन सबसे ज्यादा स्वार्थ नेकपा एमाले के भीतर दिखाइ देता है। नेकपा एमाले द्वारा उठाइ गई यह मुद्दा विल्कलु राजनीतिक मद्दु ा ह।ै क्यांेि क अन्तरि म संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का पदावधि तब तक है, जब तक संविधानसभा द्वार ा नयाँ संविधान जारी नहीं होता है। अन्तरि म सं िवधान म ंे राष्टप्र ति सम्बन्धी यह व्यवस् था पहले संविधानसभा के लिए किया गया था।
तत्कालीन अवस्था म ंे अन्तरिम सं िवधान म ंे दसू र ी संविधानसभा निर्वाचन की परिकल्पना भी नहीं की गर्इ थी। जिस क े कारण अगर बीच म ंे नया ं निर्वाचन से नयाँ जनादेश प्राप्त होगा तो राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को क्या किया जाएगा – इस विषय म ंे अन्तरिम सं िवधान म ंे कछु भी उल्लख्े य नहीं है। जब पहली संविधानसभा असफल हर्ुइ और दूसरे निर्वाचन से नये जनप्रतिनिधि आए, एसे ी अवस्था म ंे परु ान े जनप्रि तनिधिमलू क सस्ं था द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति को हटाने की बात सामान्यतः राजनीतिक रूप म ंे ठीक ही माना जाएगा। एसे ी व्यावस्था सं िवधान म ंे ही करना चाहिए था,
लेकिन यह नहीं हो पाया। दूसरे संविधानभा निर्वाचन होने से पहले ही र ाजनीतिक दला ंे क े बीच समझदारी कायम कर क े इस विषय म ें सम्बाधे न करना चाहिए था। उस समय यह विषय सक्ष्ू म रूप म ंे उठाया भी गया था। लेकिन सभी राजनीतिक दल राष्ट्रपति परिवर्तन नहीं करने का आशय प्रकट करते हुए दसू र े सं िवधानसभा निवार्च न म ंे चल े गए। संविधानतः अगर वर्तमान राष्ट्रपति ही कायम रहेगें तो कुछ भी व्यवधान होने वाला नहीं है। विल्कुल संवैधानिक पद होने के कारण उक्त पद में आसीन व्यक्ति परिवर्तन नहीं होने से नये जनादेश को कुछ असर नहीं पडÞने वाला है।
दूसरी बात- वर्तमान राष्ट्रपति कोई ऐसे विवादित व्यक्ति भी नहीं हैं, जिस के कार ण परिवर्तन करना आवश्यक हो। ऐसी अवस् था में जानकारों का मानना है कि राष्ट्रपति परिवर्तन करने का जो मुद्दा आगे बढÞाया गया है, यह तो नेकपा एमाले के भीतर रहे आन्तरिक गुटगत राजनीति को व्यवस्थापन करने के लिए ही हो रहा है। संविधान निर्माण जैसे मुद्दे के आगे इस को शुभसंकेत नहीं माना जाएगा। वर्तमान अवस्था में राष्ट्रपति परिवर्तन का मुद्दा उलझा कर संविधान निर्माण जैसे कार्यभार को अनदेखा करना और राजनीतिक गतिरोध को और लम्बा करना सिर्फराजनीतिक बेइमानी हैं। हाँ, दूसरी संविधानसभा निर्वाचन ने नेपाली कागं से्र -१९६ सिट) क े बराबर का ही सिट सख्ं या नेकपा एमाले -१७५सिट) को भी दिया है।
एमाले के लिए यह संख्या बहुत ही ज्यादा है। एमाले ने इतना ज्यादा सिट पा कर दूसरी बडÞी बनने का सपना शायद ही दिखा होगा। सिट संख्या के आधार म ंे अभी आकर अनावश्यक सत्ता बागर्र्ेिनङ करना और राष्ट्रपति सम्बन्धी मुद्दा उठाना एमाल े क े लिए शाभे ा नही ं दते ी। ले िकन क्या कर,ंे यह मद्दु ा आग े आन े म ंे एमाल े क े भीतर दसू रा महत्वपर्ूण्ा कारण है। वह यह है कि निकट भविष्य म ंे हाने े जा रह े पार्टर्ी महाधिवशे न। उक्त महाधिवेशन के द्वारा पार्टर्ीीा भावी नेतृत्व हथियाने के लिए तथा पार्टर्ीीध्यक्ष बनन े क े लिए पम्र खु तीन नते ा मदै ान म ंे ह।ंैर्
वर्तमान अध्यक्ष झलनाथ खनाल, पर्ूवमहासचिव माधवकुमार नेपाल और वरिष्ठ नेता केपीशर्मा आले ी, य े तीना ंे ही पार्टर्ी अध्यक्ष क े दावदे ार ह।ंै पार्टर्ी अध्यक्ष होने के लिए तथा कोई उच्च पद हासिल करन े क े लिए य े तीना ंे नते ा अतिमहत्वाकं ाक्षी दिखार्इ दते े ह।ंै जिस कारण उक्त पार्टर्ी क े भीतर गुटगत राजनीति भी जोडÞतोडÞ के साथ हो रही ह।ै बताया जा रहा ह ै कि तीन गटु ा ंे म ंे स े दा े गटु ा ंे की मिलिभगत म ंे एक का े राष्टप्र ति आरै दसू र े को पार्टर्ीीध्यक्ष बनने की व्यवस्था मिलाने के लिए ही एमाले के भीतर राष्ट्रपति परिवर्तन का मुद्दा उठ रहा है।
सामान्य अनुमान किया जा सकता है कि पहली बडीÞ पार्टर्ी नपे ाली कागं से्र कायर्क ार ी पध्र ानमन्त्री का पद ही लगे ा। एसे ी अवस्था म ंे अगर राष्ट्रपति परिवर्तन किया जाए तो उसका दावेदार स्वतः नेकपा एमाले ही होगा। इसीलिए एमाले के उच्च स्रोत कहते है- ‘एमाले के भीतर माधवकुमार नेपाल और झलनाथ खनाल के बीच एक राष्ट्रपति और दूसरा पुनः पार्टर्ीीध्यक्ष बनने का गुटगत राजनीति चल रही है। स्रोत के अनुसार पहले संविधानसभा निर्वाचन के वाद र ाष्टप्र ति क े रूप म ंे चचार् म ंे आए माधवकमु ार नेपाल को राष्ट्रपति बना कर झलनाथ खनाल पनु ः पार्टर्ी अध्यक्ष बनना चाहत े ह।ंै इसक े लिए य े दाने ा ंे गटु क े बीच सहमति भी हर्इर्ु ह।ै इसलिए
राष्ट्रपति के ऊपर राजनीतिर् वर्तमान अवस्था में राष्ट्रपति परिर् वर्तन का मुद्दा उलझा कर संविधान निर्माण जैसे कार्यभार को अनदेखा करना और राजनीतिक गतिरोध को और लम्बा करना सिर्फराजनीतिक बेइमानी हैं। द्दण् हिमालिनी l दिसम्बर/२०१३ ही एमाले के भीतर राष्ट्रपति परिवर्तन का मुद्दा जोडÞतोडÞ का साथ उठ रहा है। लेकिन एमाले के यह मुद्दा पर नेपाली कांग्रेस विल्कुल सहमत नहीं हैं।
कांग्रेस के एक उच्च स्रोत के अनुसार यदि नेकपा एमाले द्वारा राष्ट्रपति सम्बन्धी मुद्दा इसी तरह अनावश्यक रुप में उठाया जाएगा तो नेपाली कांग्रेस प्रतिपक्ष रहेगा और नेकपा एमाले को ही सर कार बनाने की जिम्मेदारी दी जाएगी। अगर ऐसा ही होगा तो तो एमाले के नेपाल-खनाल गुट के बीच जो योजना बनी है, वह बुरी तर ह असफल होगी। दूसरी तरफ नेपाल-खनाल बीच का यह खेल और सम्भावित परिणाम का आकलन कर के बैठने वाले दूसरे गुट अर्थात् केपीशर्मा ओली समूह के भीतर सूक्ष्म रूप से दूसरे ही प्रकार से बहस शुरु होने लगा है। बहस यह है- राष्ट्रपति परिवर्तन तो किया ही जाएगा, लेकिन उस पद में नेपाली कांग्रेस के सभापति सुशील कोइर ाला को विराजमान किया जाएगा और ओली प्रधानमन्त्री का दावी करेंगे। इस के लिए नेपाल तथा खनाल- जो उनको साथ देंगे, उसी को ही भावी पार्टर्ीीध्यक्ष के लिए ओली र्समर्थन करेंेगे। एमाले के भीतर गुटगत राजनीति के कारण किस को, कौन पद प्राप्त होगा,
यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन एक पार्टर्ीीे स्वार्थ के कार ण देश की समग्र राजनीति को बन्धक बनाना जनता का अभिमत नहीं है। क्योंकि अन्तरिम संविधान में राष्ट्रपति परिर् वर्तन करना कोई बाध्यात्मक व्यावस्था नहीं है। यह तो सिर्फराजनीतिक मुद्दे है। अगर राजनीतिक दलों का प्रमुख उद्देश्य संविधान निर्माण करना हैं तो संविधान निर्माण के बाद ही राष्ट्रपति सम्बन्धी मुद्दा को उठाना जायज होगा। अभी हाल इस मुद्दे को आगे बढÞाएंगे तो कम से कम ६ महने तक संविधान निर्माण प्रक्रिया शुरु भस् नहीं हो सकती है। जिसके कारण एक वर्षके भीतर संविधान जारी कर ने का जो प्रण राजनीतिक दलों ने किया है, वह पूरा नहीं होने वाला है। समग्र में इतना ही कहा जा सकता है कि इस तरह सत्ता केन्द्रित राजनीति को प्रथामिकता देते रहेंगे तो फेरि भी संविधान निर्माण नहीं हो पाएगा। और फिर तीसरी संविधानसभा

