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आज धर्मयुग को बंद हुए 26 साल पूरे हुए, टाइम्स ग्रुप ने धर्मयुग को क्यों बंदकिया ?

 

आलोक श्रीवास्त्व। वह 10 अगस्त, 1996 की दोपहर थी. शनिवार था. 2 बज चुके थे. शनिवार को मैगजीन सेक्सन में हाॅफ डे होता था. धर्मयुग में कुल 15 उपसंपादक, डिजाइनर, टाइपिस्ट, क्लर्क थे. कुछ छुट्टी पर थे उस दिन. जो आए थे, वे घर लौट चुके थे. घर लौटने पर उनको शाम को उसी दिन एक्सप्रेस कूरियर से भेजा गया एक पत्र मिला. सभी चौंके कि आॅफिस में ही थे, पर पत्र वहां न दिया जा कर इस तरह घर क्यों भेजा गया है? इस पत्र में सोमवार 12 अगस्त को मुंबई के अंधेरी ईस्ट के एक पते पर पहुंचने को कहा गया था. उस दिन तो नहीं पर कई दिन बाद जब वहां देखने के लिए धर्मयुग के कुछ लोग गए तो वह 10 x 12 का एक कमरा था. गंदा, अंधेरा, सीलन और बदबू से भरा. वहां बोर्ड लगा था – चंद्रप्रभा प्रकाशन. बाद में मुंबई के कंपनी रजिस्ट्रार के आॅफिस से पता चला कि 15 दिन पहले जुलाई, 1996 के आखिरी सप्ताह में किराए के इस पते पर एक पत्रकार ने चंद्रप्रभा प्रकाशन नाम से एक कंपनी रजिस्टर्ड करवाई थी. यह एक फर्जी कंपनी थी.

टाइम्स ग्रुप को धर्मयुग को बंद करना था. वह यह निर्णय 4 साल पहले ले चुका था. पर धर्मयुग एक बड़ी पत्रिका थी. सिर्फ पाठकों के नजरिए से नहीं, बल्कि देश की ब्यूरोक्रेसी, संसद, विधानसभा, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक उसकी साख और पहुंच हुआ करती थी. सो एकबारगी बंद करना आसान नहीं था. दूसरी प्रमुख बात यह थी कि सिर्फ धर्मयुग को बंद करना और वहां के 15 कर्मचारियों को वहीं से निकलने वाले नवभारत टाइम्स में एब्जार्व करना भी कंपनी के लिए मुश्किल न था. 15 में से कई तो रिटायर ही होने वाले थे.

पर उन दिनों टाइम्स समूह के मुंबई के पर्सोनल डाइरेक्टर थे दर्शनलाल धवन, जो मुंबई की किसी बड़ी मिल से हजारों कर्मचारियों को निकालने और वहां की यूनियन को खत्म कर देने की कीर्ति लेकर टाइम्स आए थे. यहां उनको लक्ष्य दिया गया था मुंबई मजदूर सभा की यूनियन को समाप्त करने का. और कुछ ऐसा करने का जिससे वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट-1955 को निर्मूल किया जा सके. सो 4 साल तक एक लंबी साजिश बुनी गई. इस साजिश के तहत धर्मयुग को साप्ताहिक से पाक्षिक फिर पाक्षिक से मासिक में बदला गया, आकार बड़े से छोटा किया गया. पृष्ठ संख्या कम की गई. विज्ञापन व सर्कुलेशन विभाग को इसकी जिम्मेदारी से हटा दिया गया, एक अयोग्य और अक्षम व्यक्ति को स्टेपनी संपादक के रूप में मुंबई के लोकल हिंदी दैनिक के साथ इस पत्रिका को भी देखने की जिम्मेदारी दी गई.

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फरवरी, 1990 में मैंने उपसंपादक के रूप में धर्मयुग जब ज्वाइन किया था, तब उसका मासिक प्रसार लगभग 5 लाख था. अगस्त, 1996 का अंतिम अंक 30 हजार प्रतियों का छपा था. महीने में आने वाले कई लाख के विज्ञापन अंतिम 4 सालों में 0 हो गए थे. पत्रिका के स्टेपनी संपादक जी अपने मित्रों-परिचितों आदि के लेख-कहानी से पत्रिका को बेहद घटिया स्तर पर ले आए थे.

बहरहाल, अब टाइम्स समूह को इसे बंद तो करना ही था. साथ ही उन्हें इसका ऐसा उपयोग भी कर लेना था, जो तेजी से बदल रहे टाइम्स समूह की एम्प्लायमेंट योजनाओं को नया रूप देने में उनके लिए मददगार हो. यानी स्थायी कर्मचारियों का सिस्टम बंद हो, कांट्रेक्ट प्रणाली लागू हो. टाइम्स में उन दिनों पूरे देश में 10 हजार से ज्यादा स्थायी कर्मचारी थे, जिनकी नौकरियां 60 वर्ष की रिटायरमेंट आयु तक वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के तहत सुरक्षित थीं. सो दिल्ली के एक पत्रकार से 15 दिन पहले एक फर्जी कंपनी बनवाई गई. और धर्मयुग को एक कंपनी के रूप में इस फर्जी कंपनी को बेच दिया गया. सभी 15 कर्मचारियों से कहा गया कि अब उनकी नौकरियां नई कंपनी के साथ होंगी.

अब नई कंपनी में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट या भारत सरकार के श्रम कानून लागू नहीं होते, क्योंकि यह 100 की संख्या से कम कर्मचारियों वाली कंपनी होती. 100 की संख्या भारत सरकार के कानूनों में इस बात की निर्धारक थी, कि कंपनी बड़ी है या छोटी. इस अनुसार उनके लिए कानून के दायरे थे. लिहाजा नई कंपनी इन कर्मचारियों को किसी भी दिन नौकरी से निकाल देती. अगर इस प्रयोग पर अदालत की मुहर लग जाती तो इसका मतलब यह होता कि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट व्यावहारिक रूप से शक्तिहीन हो जाता. टाइम्स समूह अपने 10 हजार से अधिक कर्मचारियों को इस तरह से नौकरी से निकाल सकता था. यही नहीं पूरे भारत के किसी भी हिस्से के अखबार समूह में फिर वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट का कोई मतलब नहीं रह जाता. यानी यह लाखों कर्मचारियों की नौकरियों से जुड़ा मसला था· इस पर उन लोगों को प्रायः बुरा भी लगा है जो उनके महान कृत्यों से नावाकिफ हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अगस्त, 1997 के अपने निर्णय में वैदिक की कंपनी और उस कंपनी द्वारा किए गए टाइम्स समूह से एग्रीमेंट को फ्राॅड कहा था.

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बहरहाल, मुंबई जर्नलिस्ट यूनियन और उसके तत्कालीन पदाधिकारी एम जे पांडे के सहयोग से हमने वह मुकदमा लड़ा और 1 साल 4 दिन में मुंबई के लेबर कोर्ट, मुंबई हाईकोर्ट सिंगल बेंच, मुंबई हाई कोर्ट डबल बेंच और अंत में सुप्रीम कोर्ट से विजय हासिल की. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट निर्मूल होने से तब बच गया. यद्यपि पिछले 25 सालों में कांट्रेक्ट प्राणाली से क्रमशः प्रबंधन ने उस एक्ट को निष्प्रभावी बना ही दिया है.

परंतु धर्मयुग पत्रिका बंद हो गई. यह पत्रिका पाठकों की कमी के कारण बंद नहीं हुई थी. टाइम्स समूह का छोटे लाभ से विशालकाय लाभों में संक्रमण इसका कारण था. हालांकि मैंने जिन साढ़े सात सालों में वहां काम किया, उसका एक पहलू यह भी था कि इन साढ़े सात सालों में इस पत्रिका ने अपना स्तर बुरी तरह खो दिया था. यह संपादकीय टीम के कुछ प्रभावशाली लोगों की अयोग्यता और निहित स्वार्थों का मंच बन कर रह गई थी. लोग धर्मयुग को उसके जीवनकाल में ही भूलने लगे थे. हर अंक को मैं दयनीय सामग्री से भरा देखता था, और उन लेखों-कहानियों आदि के प्रकाशन के कारणों की श्रृंखलाएं भी मेरे सामने सुस्पष्ट होती थीं. अतः धर्मयुग की अंतर्कथा के दो स्तर हैं – एक तो अदालतों में चले एक बेहद सनसनीखेज कहानी जैसे संघर्ष का उसमें प्रबंधन, संपादकीय टीम के वरिष्ठ सदस्यों की भूमिकाओं और माननीय न्यायमूर्तियों द्वारा निरंतर टाइम्स के पक्ष में निर्णय देने की आतुरता का और अंततः उस विवशता का कि वे पूरे प्रयास के बाद भी ऐसा नहीं कर सके.

एक न्यायमूर्ति थे, आर एम लोढ़ा, जो बाद में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी बने, जिनकी निष्पक्षता मिसाल बनी तो एक न्यायमूर्ति थे, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पुंछी जिनका व्यवहार संदेहास्पद था, पर चूंकि चार जजों की बेंच थी, तो बहुत प्रयास के बावजूद उनको निर्णय कर्मचारियों के पक्ष में ही सुनना पड़ा था. हालांकि इस निर्णय के ठीक छह माह बाद सुप्रीम कोर्ट की बार काउंसिल ने उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया था और उनके भ्रष्टाचार के विरुद्ध छह शीर्षस्थ वकीलों ने दस्तावेज जारी किए थे.

इस अंतर्कथा का दूसरा स्तर उन साढ़े सात सालों के अपने अनुभव का है जब मैंने उस धर्मयुग को रोज वहां के संपादक व उनके प्रियपात्रों द्वारा जिबह किए जाते देखा जो धर्मवीर भारती के समय में हिंदी की पत्रकारिता का गौरव था, और जिसे बहुत उम्मीदों से 21 साल की उम्र में मैंने ज्वाइन किया था. आज चैनलों के युग में यह कल्पना करना मुश्किल है कि धर्मयुग में काम करने का तब क्या महत्व था. मुंबई पहुंच कर रघुवीर सहाय को जब मैंने यह सूचना दी कि मैंने मुंबई में धर्मयुग ज्वाइन कर लिया है, तो वे बहुत खुश हुए और पत्र में लिखा कि ‘अरे अभी एक सप्ताह पहले ही तो दिल्ली में आप मिले थे और आपने बताया भी नहीं कि आप धर्मयुग ज्वाइन करने जा रहे हैं.’
दरअसल दिल्ली में अचानक उस दिन बोट क्लब के पास बस-स्टाॅप पर सहाय जी से सड़क पर मुलाकात हो गई, जिस दिन मैं मेरठ से दिल्ली पहुंचा था. उन्होंने सड़क पर एक ठेले से ब्रेड पकौड़ा खिलाया था.

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मुझे अगले दिन वहां से मुंबई की ट्रेन लेनी थी. लखनऊ स्थित टाइम्स के कार्यालय में 20 दिन पहले 4 घंटे की मशक्कत वाली लिखित परीक्षा हुई थी. अब मुंबई धर्मयुग में इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. सहाय जी धर्मयुग के संपादक गणेश मंत्री के पुराने मित्र थे, और वैचारिक रूप से एक दूसरे के मिजाज के भी यानी समाजवादी. मैंने सहाय जी से यह नहीं बताया कि मैं दिल्ली सें मंबई धर्मयुग का इंटरव्यू देने के लिए ट्रेन पकड़ने आया हूं. कि कहीं वे यह न समझें कि मैं उनसे गणेश मंत्री से किसी सिफारिश करने की उम्मीद में यह बता रहा हूं.

बहारहाल धर्मयुग की दोनों ही अंतर्कथाएं काफी रोचक हैं, सनसनीखेज भी हैं और अपने समय के सांस्कृतिक संक्रमण की गवाही देने वाली भी. लंबे समय से इसका लिखना टलता रहा हैं. मुंबई से मेरे मित्र हरि मृदृल का प्रबल आग्रह रहता है कि इसे अवश्य लिखूं. मेरा भी मन है. उम्मीद है कि आने वाले दो-एक सालों में लिखने का वक्त मिलेगा. यह कहानी हिंदी के सांस्कृतिक दर्द की कहानी भी है और एक विरासत के समाप्त होने और हिंदी के उस चरित्र की भी जिसमें अभी सार्वजनिक चीजों के बने और बचे रहने का जज्बा पैदा नहीं हो सका है.

आलोक श्रीवास्त्व
आखिर धर्मयुग क्यों बन्द हुआ

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