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मधेशियों के लिए नागरिकता विधेयक कहीं पेण्डोरा का बक्सा तो नहीं ? : कैलाश महतो

 
कैलाश महतो, पराशी। काठमाण्डौ में कल्ह दिनभर कुछ बौद्धिक विश्लेषक और राजनीतिक चिन्तक लोगों से मुलाकातवौर बातचित हुई । देश के चर्चित आसन्न निर्वाचन, दलों की गठबन्धन, मधेश की राजनीति और नागरिकता विधेयक विषयों पर विशेष चर्चा रहा ।
नागरिकता विधेयक मधेश के लिए एक ललिपप और पेण्डोरा का बक्सा दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह चुनाव का एक मसालेदार चटनी बन चुका है । संसद के दोनों सदनों से पारित नागरिकता विधेयक पर मधेश आधारित दल तथा उसके नेता लोग धोती फहराते हुए शानदार फेसबुकिया प्रचार यह करना शुरु किया था कि अगर वे सडक, मंच और सदन से मांग नहीं किये होते तो नागरिकता विधेयक पास नहीं होता । उसका सारा श्रेय फिर ऐसे मधेशी नेताओं ने लेने के कोशिश कर रहे थे, जिनका मधेश आन्दोलन और उसके मांग के समय या तो वे राजनीति में थे नहीं, थे भी तो मधेश आन्दोलन के विरोधी पार्टियों में ।
दोनों सदनों से पास नागरिकता विधेयक राष्ट्रपति के टेबल पर जाकर झक मार रहा है । यह गौर करने की बात है कि जो नागरिकता विधेयक देश के सर्व शक्तिशाली दो स्थानों और निकायों से पास हो जाता है, वह राष्ट्रपति के पास अटक क्यों जाता है । जिस सदन का उत्पादन तक राष्ट्रपति हो, उस राष्ट्रपति का यह औकात कि सदन का निर्णय न मानें ?
दर असल मौजूदा राजनीतिक और संसदीय प्रणाली से मधेशी और जनजाति पक्षीय कोई भी विधेयक पास होना असंभव प्रायः है । हो भी जाये तो वह गम्भीर षड्यन्त्रके आलावा और कुछ नहीं हि सकता । कथम कदाचित कल्ह राष्ट्रपति द्वारा सदर भी हो जाता है तो वे ही नेपाली पार्टी बाले नेता लोग किसी वकिल या अपने कारिन्दा से उसके विरोध में सर्वोच्च अदालत में मुद्दा दायर करवा देंगे । यह पक्का है ।
मधेश आधारित राजनीतिक दलों को भी यह मालूम है कि वह मधेश का नागरिकता समस्या का स्थायी समाधान  देना नहीं चाहते । उन्हें यह डर है कि अगर समस्या स्थायी रुप से समाधान हो गया तो फिर मधेश के नाम पर मधेशियों से चुनाव में मत लेना पत्थर का चना चवाना जैसा हो जायेगा ।
मधेशी दल‌ जितना चिल्ला लें, हल्ला कर लें, वे मधेश का एक भी समस्या समाधान नेपाल के मौजूदा राजनीतिक और संसदीय प्रणाली से नहीं करवा सकते । हमें यह लग सकता है कि मधेशी दलों के दवाब के कारण नागरिकता विधेयक पास हुआ है । मगर बात इसके ठीक विपरीत है । वास्तविकता यह है कि यह विधेयक चुनाव के करीब पास किया गया है जिसका कूल कारण यह है कि मधेश में अपना शाख कमजोर कर चुके काँग्रेस पुनर्जीवित होना चाहता है । कल्ह काँग्रेस मधेश में जाकर यह कहेगा कि सालों अटका नागरिकता विधेयक काँग्रेस नेतृत्व मात्र के सरकार ने पास कर मधेशियों को उद्दार किया है । काँग्रेस के इस बात पर मधेशी ताली ठोकेगा और आँख मुंदकर उसे भोट देगा ।
विचार करने बाली बात यह है कि जिस नागरिकता विधेयक को अपने सरकारी काल में एमाले ने संसद में पेश किया था, वह न पास किया, न करवाया । वह भी मधेश को गुमराह में रखकर भोट के लिए उस विधेयक के जरिये मधेश में पैर फैलाने के दांव में रहा । आज उसी विधेयक को काँग्रेस नेतृत्व की सरकार ने जब दोनों सदन से पास करवाया है, तो एमाले इसके विरोध में खडा है । यहाँ तक कि उसके पार्टी में रही देश की राष्ट्रपति तक उसके विरोध में हैं । इसके पीछे के दरवाजे को खोलकर देखें तो काँग्रेस और एमाले – माओवादी सारे पार्टी बालों का एक ही दांव है कि मधेश के पास रहे उसके मत शक्ति को अपने तरफ कैसे आकर्षित किया जाय । मधेशियों के नागरिकता समस्या समाधान करने का रणनीति और चाहत किसी का नहीं है । यहाँ तक कि मधेशी दलों का भी नहीं ।

काँग्रेस बाला चुनाव में मधेश से यह कहकर उसका मत लेने का दांव लगाया है कि मधेशी जनता की पीडा काँग्रेस के आलावा अन्य कोई दल नहीं समझता । उधर एमाले अब मधेशी मत के लिए परेशान दिख रहा है कि मधेश कहीं काँग्रेस के खेमे में न चला जाय । मधेश के लिए समस्या फिर यह है कि मधेश आन्दोलन के जड पर नागरिकता पाने बाले अधिकांश नागरिकताधारी लोग मधेशी दलों को मत देंगे नहीं । क्योंकि उनमें अधिकांश मतदाता राज्य से मिलकर व्यापार, तस्करी, रियल स्टेट के धन्धे आदि करेंगे जिसके लिए उन्हें राज्य का सहयोग चाहिए, और वो सहयोग राज्य, सरकार, शासन और प्रशासन में कमजोर मधेशी दल कर नहीं पायेंगे । अन्ततः मधेशी दल राज्य के सामने बौने पडे रहेंगे और उसीके भक्ति भाव में रहकर केवल मधेश का बात करेंगे और अपने रोजीरोटी को जिन्दा रखेंगे ।
मधेश को इस बात से वाकिफ होना बेहद जरुरी है कि मधेश का मत अगर काँग्रेस कब्जा करता है तो उसके विरोध में राष्ट्रवाद का नारा देकर, भारतीय विवाहित महिलाओं के तुरन्त दिये जाने बाले नागरिकता पर सवाल खडा कर अपना मत बरकरार रखने का खेल एमाले खेल रहा है ।
मधेश को यह भी याद करना चाहिए कि नागरिकता ले लेने से ही वह नेपाल का नागरिक नहीं बन सकता । यह सब चुनावी स्टण्ट है । हमें याद करना चाहिए कि इस राज्य ने सन् १९९७ में कुछ मिनेट के निर्णय से चन्द सेकेण्ड में हजारों मधेशी नेपाली नागरिकों की नागरिकता रद्द कर दिया था । आज भी अगर मधेशियो को नागरिकता मिल जाय तो यह जरुरी नहीं कि वह नागरिकता कायम ही रहेगा । दूसरी बात यह कि इस राज्य ने लाखों मधेशी युवाओं का भविष्य बिगाड चुका है । यह परम्परा तबतक कायम रहेगा, जबतक मधेश की राजनीति मजबूत नहीं बनेगा ।
यह भी तय है कि नेपाल के जो सही नागरिक अनागरिक बनकर रोजीरोटी तक सीमित हैं, उन्हें नागरिकता महत्व की जानकारी ही नहीं है और वे कल्ह भी नागरिकता से वञ्चित रहने का प्रवल संभावना है । वैसे लोगों को राज्य उनके घर पर जाकर उन्हें उनका नागरिकता दें तो बाहरी गैर नागरिकों को नेपाली नागरिक बनाये जाने पर बन्देज लगाया जा सकता है ।
मधेश के नागरिकता लगायत कृषि, व्यापार, शिक्षा, अवसर, भाषा, विज्ञान, मनोविज्ञान, आदि समस्याओं को समूल समाधान के लिए मौजूदा निर्वाचन प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर इसे पूर्ण समानुपातिक करना एक मात्र अन्तिम राह है । दूसरा तीसरा कुछ नहीं ।
कैलाश महतो, नवलपरासी |

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