बालेन और हर्क के बाद एक और तरंग_रवि लामिछाने : लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम, अंक जून। टेलीविजन पत्रकारिता में एक अलग ही पहचान के साथ स्थापित चर्चित सञ्चारकर्मी रवि लामिछाने ने अन्ततः राजनीति में आने का फैसला किया है । एक वीडियो सन्देश जारी करते हुए उन्होंने कहा है कि वह अपनी इच्छा से संचारकर्मी बने थे, लेकिन अब बाध्यतावस पूर्णकालीन राजनीतिकर्मी बनना पड़ रहा है । अपनी राजनीतिक यात्रा के संबंध में तत्काल उन्होंने अधिक कुछ नहीं कहा है, इसके लिए कुछ दिनों का समय उन्होंने माग किया है ।
अनुमान है कि लामिछाने आगामी संसदीय चुनाव में काठमाडौं निर्वाचन क्षेत्र नं. ३ से स्वतन्त्र उम्मीदवारी देने जा रहे हैं । कुछ लोगों का यह भी मानना है कि स्थानीय चुनाव के बाद देशव्यापी स्वतन्त्र उम्मीदवारों की जो लहर आयी है, उसको देखकर ही लामिछाने ने संचारकर्म को छोड़कर राजनीति में आने का फैसला लिया है और स्वतन्त्र उम्मीदवारों को इकठ्ठा कर एक अलग ही राजनीतिक शक्ति निर्माण करना चाहते हैं । खैर ! यह सब आम लोगों में व्याप्त चर्चा है । रवि किस तरह आगे बढ़नेवाले हैं, कुछ ही दिनों में सब सामने आनेवाला है ।
यहां एक बात स्मरणीय है, स्थानीय चुनाव में काठमांडू महानगरपालिका में बालेन साह और धरान उप–महानगरपालिका में हर्क साम्पाङ की जो जीत हासिल हुई है, उसके बाद मूलधार की परम्परागत राजनीतिक पार्टियों में भूचाल पैदा हो गया है । विशेषतः नेकपा एमाले, नेपाली कांग्रेस और माओवादी केन्द्र जैसे राजनीतिक शक्तियों को बालेन और हर्क की चुनावी जीत एक चुनौती बनी है, जिसने स्पष्ट सन्देश दिया है कि अब आम जनता मूलधार की राजनीतिक पार्टी तथा उनके उम्मीदवारों के प्रति विश्वस्त नहीं हैं । ऐसी ही पृष्ठभूमि में लामिछाने की राजनीतिक यात्रा शुरु होने जा रही है, जो परम्पारगत राजनीतिक पार्टियों के भीतर और एक तरंग लानेवाला है ।
क्योंकि लामिछाने वही संचारकर्मी है, जिनके कारण कई राजनीतिकर्मी, प्रशासक एवं व्यवसायियों को आतंकित होना पड़ा है । विशेषतः भ्रष्टाचार और अपराधजन्य कर्म में सहभागी व्यक्ति तथा संस्थाओं के विरुद्ध खोजमूलक रिर्पोट प्रस्तुत करनेवाले लामिछाने ने पत्रकारिता के माध्यम से ही ऐसा काम भी किया है, जिसके चलते दर्जनों पीडित लोगों ने न्याय प्राप्त किया है । हां, राज्य एवं प्रशासनिक निकायों से न्याय प्राप्त करने में असफल दर्जनों नागरिकों ने लामिछाने द्वारा प्रस्तुत टेलिभिजन कार्यक्रम के कारण ही न्याय प्राप्त किया है । कुछ साल पहले लामिछाने विरुद्ध राजनीतिक तथा प्रशासनिक निकायों से रची गई एक घटना के दौरान हजारों सर्वसाधारण उनके समर्थन में सड़क प्रदर्शन में भी उतर आए थे । उनकी इसी छवि को देखकर संचार क्षेत्र से ही राजनीति में प्रवेश करनेवाले रवीन्द्र मिश्र ने लामिछाने को अपनी पार्टी में प्रवेश कर राजनीति में क्रियाशील होने के लिए आग्रह किया था । उस समय लामिछाने ने मिश्र का प्रस्ताव अस्वीकार किया था । अन्ततः लामिछाने राजनीति में आ गए हैं । निश्चित है कि उनकी राजनीतिक यात्रा को लेकर अब कुछ समय सञ्चार जगत में खूब चर्चा होनेवाली है । चर्चा–परिचर्चा में गिनेचुने राजनीतिकर्मी, विश्लेषक, संचारकर्मी से लेकर आम सर्वसाधारणों की सहभागिता निश्चित हैं ।
सामान्यतः एक संचारकर्मी का राजनीति में क्रियाशील होना कोई बड़ी बात नहीं है । सिर्फ नेपाल में ही नहीं, विश्व के कई दिशों में पूर्व पत्रकार देश के मन्त्री, प्रधानमन्त्री से लेकर राष्ट्रपति तक बन चुके हैं । आज भी कई सञ्चारकर्मी मूलधार की राजनीति में क्रियाशील हैं । यूं कहें तो पत्रकार के रूप में परिचित प्रायः सभी व्यक्ति किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से संगठित रूप में आबद्ध हैं, हर राजनीतिक पार्टी ने पत्रकारों को लक्षित कर एक अलग ही संगठन निर्माण किया है, अधिकांश पत्रकार ऐसे ही संगठन में आबद्ध होकर राजनीतिक पार्टी से निकट रहते हैं, जो अवसर मिलते ही संचारकर्म को त्याग कर राजनीति में पूर्णकालीन बन जाते हैं । हाल ही में सम्पन्न स्थानीय चुनाव में विजयी होनेवाले कहीं स्थानीय जनप्रतिनिधि उम्मीदवार बनने से पहले पत्रकारिता ही कर रहे थे । ऐसी पृष्ठभूमि में आखिर रवि लामिछाने पूर्णकालीन राजनीतिक कार्यकर्ता बन जाते हैं तो खास चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए था, लेकिन हो रहा है । यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हो जाता है– आखिर स्वतन्त्र उम्मीदवारों के प्रति आम लोगों में इतना आकर्षण क्यों बढ़ रहा है ? उत्तर सहज है– परम्परागत राजनीतिक पार्टी के प्रति बढ़ती अविश्वास और वितृष्णा ।
नीतिगत भ्रष्टाचार, कुशासन, दण्डहीनता आदि ऐसी कई घटनाएं हैं, जिसके चलते आम जनता पुरानी पार्टियों के प्रति नफरत करने लगे हैं । विकास और समृद्धि एवं सुशासन संबंधी मुद्दों को लेकर एक ही व्यक्ति कई बार मन्त्री तथा प्रधानमन्त्री बन चुके हैं, तब भी आम जनता में सुशासन की अनुभूति नहीं हो रही है । कटु सत्य यही है कि १५ साल की अवधि में आम जनता ने गणतन्त्र की अनुभूति प्राप्त नहीं की है ।
हां, वर्तमान में जो राजनीतिक पार्टी तथा नेता सत्ता और प्रतिपक्ष में हैं, वे लोग १५ साल पहले कहते थे कि जब तक नेपाल में राजतन्त्र रहेगा, तब तक यहां विकास और समृद्धि एवं सुशासन संभव नहीं है, राजतन्त्र के कारण ही जनता को अधिकार और सुशासन प्राप्त नहीं हो पा रहा है । इसी नारे के साथ २३८ साल से कायम शाहवंशीय राजतन्त्र के विरुद्ध आन्दोलन हुआ, आन्दोलन के ही बल पर राजतन्त्र को विधिवत अन्त भी किया गया है । १४ साल से नेपाल में लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था लागू है । लेकिन आम जनता में गणतन्त्र की अनुभूति नहीं है । राजतन्त्रकालीन व्यवस्था में जनता की दैनिकी जिस तरह चलती थी, उनकी हालत वेसी ही है । उलटा भ्रष्टाचार और कुशासन में वृद्धि हो रही है, राष्ट्रीयता पहले की तुलना में और भी कमजोर होता जा रहा है, ऐसी अनुभूति आम लोगों में है । इसके प्रमुख जिम्मेदार मूलधार के राजनीतिक पार्टी को ही माना जाता है । जिसके चलते आज शहरी क्षेत्र में रहनेवाले युवा वर्ग मूलधार के राजनीतिक पार्टियों को घृणा की नजर से देखते हैं । काठमांडू में बालेन तथा धरान में हर्क जैसे उम्मीदवारों की चुनावी जीत के पीछे मूल कारण यही है । ऐसे ही पृष्ठभूमि में रवि लामिछाने जैसे पात्र राजनीति में उतर आते हैं तो आम लोगों में चर्चा होना स्वभाविक बन जाता है ।
राजनीति में लामिछाने की इन्ट्री संबंधी बहस होते ही मूलधार के राजनीतिक पार्टियों से आबद्ध कुछ व्यक्तियों ने कहा है– ‘लामिछाने राजावादी व्यक्ति हैं, उनका उद्देश्य नेपाल में राजतन्त्र को वापस करना है ।’ यह एक सिर्फ आरोप है । स्मरणीय है कि हमारे यहां खुद को क्रान्तिकारी कहनेवाले अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए दूसरे के ऊपर ‘राजावादी’ और ‘विदेशी दलाल’ करार करते हैं । लामिछाने के ऊपर राजावादी होने का आरोप लगाना भी ऐसा ही है । क्योंकि आज तक लामिछाने ने कहीं भी नहीं कहा है कि वह नेपाल में राजतन्त्र वापस करना चाहते हैं । लामिछाने निकट स्रोत का कहना है कि लामिछाने राजतन्त्र वापस करने के पक्ष में नहीं हैं, उनकी राजनीतिक यात्रा संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र को स्वीकार कर होनेवाला है । अगर लामिछाने अपनी राजनीतिक दर्शन का केन्द्रविन्दू राजसंस्था पुनः स्थापना को ही मानते हैं तो उनकी राजतीतिक यात्रा बहुत दूर तक जानेवाली भी नहीं है, यह भी निश्चित है । क्योंकि आज की नयी पीढ़ी नेपाल में राजतन्त्र की वापसी भी नहीं चाहते हैं ।

