जिरा मिर्च (लघुकथा) : राजेन्द्र उपाध्याय
*जिरा मिर्च*
तब हम गाँव में रहा करते थे। उस समय मेरी उम्र 6 या 7 साल रही होगी। हमारे आँगन में जिरा मिर्च का एक पौधा था। हमारे पड़ोस की एक चाची रोज आती और उसमें से चुन-चुनकर बड़ी-बड़ी मिर्च तोड़ती और ले जाती। मैं रोज देखता, लेकिन कुछ नहीं कहता। गाँवों में यह स्वाभाविक था।
एक दिन मैंने उनसे पूछा, “चाची, आप सिर्फ बड़ी-बड़ी मिर्च ले जाती हैं। ये छोटी वाली क्यों छोड़ देती हैं?”
चाची बोली, “बेटा, ये छोटी-छोटी मिर्च में झाल नहीं होती! जब बड़ी होंगी तभी इन्हें खाया जाएगा।”
“लेकिन माँ तो छोटी-बड़ी सब तोड़ती हैं।”
“उन्हें पता नहीं होगा।” मिर्च तोड़ती हुई वह बोल रही थी।
“चाची, आप चखकर देख तो लीजिए! क्या पता इनमें भी झाल होती हो!”
“तुम विश्वास नहीं कर रहे, तो देख लो!” कहती हुई चाची ने एक छोटी सी जिरा मिर्च तोड़कर अपने गाल के अंदर रखा और चबा दिया।
मिर्च इतनी तेज थी कि चाची की साँस बन्द होते होते बची। करीब दस मिनट तक उन्हें पानी पिलाने और पंखा झलने की मेरी ड्यूटी लग गई थी।
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सिलिगुड़ी।
– राजेन्द्र उपाध्याय
सिलिगुड़ी।

