नेपाल के इतिहास में महारानी एलिजाबेथ : डा श्वेता दीप्ति
महारानी एलिजाबेथ द्वितीय राष्ट्रमंडल के १६ स्वतन्त्र सम्प्रभु देशों की संवैधानिक महारानी थीं । महारानी का जन्म उस दौरान हुआ जब उनके दादा जार्ज पंचम का शासनकाल था । एलिजÞाबेथ का नामकरण २१ मई को यार्क के त्यउ एबकतयच ऋयकmय न्यचमयल ीबष्लन के द्वारा बर्मिंघम महल में प्रवेश करवाकर किया गया था । उनके पिता राजकुमार एल्बर्ट राजा के दूसरे पुत्र थे, उनकी माता यॉर्क की डचेजÞ स्कॉटिश अर्ल क्लाउडे बोव्स–ल्यॉन की छोटी बेटी थी । वर्ष १९३० में एलिजाबेथ की बहन राजकुमारी मार्गरेट का जन्म हुआ, जिसके बाद दोनों बहनों को अपनी माँ और शिक्षिका मैरियन क्राफोर्ड की देखरेख में घर पर ही संगीत एवं इतिहास से संबंधी शिक्षा प्रदान की गयी । वर्ष १९५० में मैरियन क्राफोर्ड ने एलिजाबेथ और राजकुमारी मार्गरेट की त्जभ ीष्ततभि एचष्लअभककभक टाइटल से एक जीवनी प्रकाशित की थी । इस पुस्तक में एलिजाबेथ के घोड़ो एवं पालतू कुत्तों के प्रति लगाव और आज्ञाकारिता एवं जिम्मेदार स्वभाव का उल्लेख किया गया है ।
निजी तौर पर एलिजाबेथ को शिक्षा के रूप में घर पर ही शिक्षित किया गया था । उनके पिता के द्वारा वर्ष १९३६ में एडवर्ड अष्टम के शासन राज्य त्यागने के बाद राज ग्रहण किया गया था । उस दौरान वह राज्य की उत्तराधिकारी हो गयी थी, क्वीन एलिजाबेथ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पब्लिक सर्विस में हिस्सा लेना शुरू किया, जिसके बाद उन्होंने बगहष्ष्बिचथ चभनष्यलब िकभचखष्अभ में हिस्सा भी लिया था । इसके पश्चात वर्ष १९४७ में उनकी शादी राजकुमार फिलिप से हुई । इनके चार बच्चे हंै चार्ल्स, राजकुमार एँड्रयू,ऐने,और राजकुमार एडवर्ड ।

राजकुमारी से महारानी बनने का सफर
जार्ज किंग–ख्क्ष् के निधन के बाद ब्रिटेन को महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के रूप में एक नई महारानी मिली । यह एक संयोग ही था कि ब्रिटेन से जब वह केन्या के लिए रवाना हुई थीं तो, उस समय केवल वह एक राजकुमारी थी । लेकिन जब वह लौंटी तो ६ फरवरी १९५२ को महारानी द्वितीय के रूप में एलिजाबेथ को नियुक्त हो चुकी थीं । आधिकारिक रूप से २ जून १९५३ को उनका राज्य अभिषेक किया गया । एलिजाबेथ का पूरा नाम एलिजाबेथ एलेक्जेंड्रा मैरी विंडसर था । २५वर्ष की आयु में महारानी एलिजाबेथ ने पिता की मृत्यु के बाद शासन काल संभाला था ।
एलिजाबेथ एलेक्जेंड्रा मैरी की शादी राजकुमार फिलिप के साथ वर्ष १९४७ में हुई । इनकी शादी एक शाही विवाह के रूप में हुई थी । महारानी एलिजाबेथ बताया ककरती थीं कि १३ वर्ष की आयु में उन्हें राजकुमार फिलिप से प्यार हो गया था । जिसके बाद उनलोगों ने एकदूसरे को प्रेमपत्र भेजना शुरू कर दिया था । १९३९ में उन दोनों की मुलाकÞात शाही नौसेना महाविद्यालय में हुई थी । फिलिप एक ग्रीक राजकुमार थे और जब वो छोटे थे, तभी उनके परिवार को १९२२ में जबरदस्ती देश से निकाल दिया गया था । वह रॉयल नौसेना में एक रॉयल अधिकारी कैडेट थे । आर्थिक रूप से फिलिप काफी कमजोर थे और एक विदेशी भी थे । जब राजकुमारी एलिजाबेथ के प्रेम और विवाह की चर्चा हुई तो, कुछ लोगों ने उनके विदेशी होने पर अधिक विरोध किया था । एलिजाबेथ की माँ भी फिलीप को पसन्द नहीं करती थीं, किन्तु बाद में फिलिप के प्रति उनकी भावना बदल गयी ।
वर्ष १९५१ में पिता का स्वास्थ्य खराब रहने के बाद से महारानी एलिजाबेथ ने शासन काल संभालना शुरू कर दिया था । स्वास्थ्य खराब होने के कारण अपने पिता की अनुपस्थिति में वह सामूहिक समारोह में उनका प्रतिनिधित्व करती थीं । वर्ष १९५२ में जब एलिजाबेथ के पिता की मृत्यु हुई तो उस समय एलिजाबेथ और फिलिप केन्या होते हुए आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर थे । ६ फरवरी १९५२ को केन्या में अपने आवास पहुंचने पर उन्हें अपने पिता की मौत की खबर मिली । शासन संभालने के लिए उन्हें राजसी नाम चुनने के लिए कहा गया जिसके बाद उन्होंने एलिजाबेथ नाम को ही रखे रहने के लिए कहा । राज्यभिषेक होने तक उन्हें घोषित रानी माना गया और लंदन वापस लौटने पर वह अपने पति फिलिफ के साथ बकिंघम पैलेस में रहने के लिए चली गयी । जैसा कि सभी जानते हैं कि शादी के बाद सभी लड़कियां अपने पति का सरनेम रख लेती हैं । राज्य अभिषेक के दौरान सभी को यह लगा था कि शाही घराने का नाम विंडसर राजघराना से बदलकर उनके पति के उपनाम से माउंटबेटन राजघराना हो जायेगा । लेकिन एलिजाबेथ की दादी रानी मैरी ने और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने विंडसर राजघराना रखे रहने पर ही अत्यधिक दबाव दिया । इसके बाद एलिजाबेथ ने ९ अप्रैल वर्ष १९५२ में विंडसर को ही शाही घराना बने रहने की घोषणा की । इस मामले में ड्यूक ने शिकायत भी की, कि वह देश में एकमात्र ऐसे पुरुष हंै जो अपने बच्चों को अपना नाम नहीं दे सकते हैं ।
इसके बाद वर्ष १९५३ में रानी मैरी की मृत्यु हो गई । १९५५ में चर्चिल के रेजिनेशन लैटर देने के बाद एलिजाबेथ और फिलिप के बेटों वा पुरुष वंशजों को किसी भी तरह की कोई शाही उपाधियाँ नहीं मिली । उनके लिए बाद में माउंटबेटेन–विंडसर का उपनाम अपनाया गया ।
राष्ट्रकुल का विस्तार
एलिजाबेथ के जन्म के बाद से ही ब्रिटिश अम्पायर का राष्ट्रकुल के देशों में कन्वर्ट होना जारी हो गया था । वर्ष १९५२ में उनके राज्य रोहण के बाद विभिन्न इंडिपेंडेंट नेशन के प्रेसीडेंट के रूप में उनका रोल स्थापित हो चुका था । वर्ष १९५३–५४ के दौरान रानी और उनके पति ६ महीनों की एक विश्वयात्रा पर निकले आस्ट्रेलिया व न्यूजÞीलैंड पर शासन के दौरान वहां जाने वाली वह पहली शासक बनी । अपने शासन काल के समय में एलिजाबेथ ने बहुत सारे देशों वा राष्ट्रकुल राष्ट्रों का आधिकारिक यात्रा की । एलिजाबेथ हेड आपÞm स्टेट के रूप में सबसे अधिक विश्वयात्रा करने वाली शासक हैं । राष्ट्रमंडल समूह के सबसे अधिक देशों के सिक्कों में महारानी की तसवीर है । महारानी एलिजाबेथ ब्रिटेन की वह पहली एम्प्रेस थी जिनके द्वारा सबसे पहले ईमेल का इस्तेमाल किया गया था । उनके द्वारा चाँद पर एक सन्देश भेजा गया था ।
महारानी एलिजाबेथ का निधन
महारानी एलीजाबेथ द्वितीय का जन्म २१ अप्रैल १९२६ को हुआ था, ८ सितम्बर वर्ष २०२२ को एलिजाबेथ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया । इसके साथ ही एक युग की समाप्ति भी हो गई । महारानी एलिजाबेथ की कुछ खास बातें हैं जिनके लिए वो हमेशा याद की जाएँगी । आपने ब्रिटेन में सबसे लंबे समय तक राज किया । एलिजाबेथ ने इस साल ब्रिटेन के सिंहासन पर ७० साल पूरे किए थे । ब्रिटिश इतिहास में सबसे उम्रदराज और सबसे लंबे समय तक राज करने वाली सम्राज्ञी हैं । सितंबर २०१५ में उन्होंने अपनी परदादी रानी विक्टोरिया को पीछे छोड़ दिया, जिन्होंने ६३ साल और ७ महीने तक शासन किया था । २०१६ में, एलिजाबेथ थाईलैंड के राजा भूमिबोल अदुल्यादेज की मृत्यु के साथ दुनिया में सबसे लंबे समय तक राज करने वाली सम्राज्ञी भी बन गई थीं । २०२२ में, वह १७वीं शताब्दी के फ्रांसीसी राजा लुई ह्क्ष्ख् के बाद विश्व इतिहास में दूसरी सबसे लंबे समय तक राज करने वाली सम्राट बनीं, जिन्होंने ४ साल की उम्र में सिंहासन संभाला था । एलिजाबेथ और विक्टोरिया के अलावा, ब्रिटिश इतिहास में केवल चार अन्य सम्राटों ने ५० साल या उससे अधिक समय तक शासन किया है । जिसमें जार्ज क्ष्क्ष्क्ष् (५९ वर्ष), हेनरी क्ष्क्ष्क्ष् (५६ वर्ष), एडवर्ड क्ष्क्ष्क्ष् (५० वर्ष) और स्काटलैंड के जेम्स ख्क्ष् (५८ वर्ष) शामिल हैं ।
घर पर हुई स्कूली शिक्षा
अपने समय और पहले के कई राजघरानों की तरह, एलिजाबेथ कभी भी पब्लिक स्कूल नहीं गई और कभी भी अन्य छात्रों के संपर्क में नहीं आई । इसके बजाय, वह अपनी छोटी बहन मार्गरेट के साथ घर पर शिक्षित हुई ।
उन्हें पढ़ाने वालों में उनके पिता, ईटन कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक के साथ, कई फ्रांसीसी और बेल्जियम के शासनाध्यक्ष थे, जिन्होंने उन्हें फ्रेंच पढ़ाया था । इसके साथ कैंटरबरी के आर्कबिशप ने उन्हें धर्म की शिक्षा दी थी । एलिजाबेथ की स्कूली शिक्षा में सवारी करना, तैराकी, नृत्य करना, ललित कला और संगीत का अध्ययन शामिल था ।
‘महान मिमिकर’
महारानी एलिजाबेथ का व्यक्तित्व अक्सर एक गंभीर साम्राज्ञी के रूप में जाना जाता था, लेकिन जो लोग उन्हें करीब से जानते थे, उनके अनुसार वो एक शरारती हंसमुख और एक बेहतरीन मिमिकर थीं । कैंटरबरी के पूर्व आर्कबिशप रोवन विलियम्स कहते हैं कि रानी “निजी तौर पर बेहद मजाकिया हैं ।”
उनके पिता सम्राट जार्ज ख्क्ष् के घरेलू पादरी, बिशप माइकल मान ने एक बार कहा था कि “कॉनकॉर्ड लैंडिंग की नकल करने वाली रानी बेहद मजाकिया हैं ।” उत्तरी आयरिश पादरी और राजनीतिज्ञ इयान पैस्ले ने यह भी नोट किया था कि एलिजाबेथ उनकी “महान नकल” किया करती थीं ।
हाल ही में, उन्होंने प्लेटिनम जुबली समारोह के दौरान अपना मजाकिया अंदाज दिखाया था, जब उन्होंने एक एनिमेटेड पैडिंगटन बियर के साथ एक कॉमिक वीडियो में अभिनय किया और अपने पर्स में मुरब्बा सैंडविच छिपाने की बात कही थी । उनके व्यक्तित्व की एक खास बात यह भी थी कि, वह रानी थीं लेकिन, उन्होंने १९९२ से करों का भुगतान भी किया था । जब १९९२ में रानी के सप्ताहांत निवास विंडसर कैसल में आग लग गई, तो जनता ने मरम्मत के लिए लाखों पाउंड का भुगतान करने के खिलाफ विद्रोह कर दिया था । लेकिन वह स्वेच्छा से अपनी व्यक्तिगत आय पर कर का भुगतान करने के लिए सहमत हो गईं । उन्होंने कहा कि वह मरम्मत के काम की लागत का ७० प्रतिशत भरेंगी और उसने प्रवेश शुल्क से अतिरिक्त धन उत्पन्न करने के लिए पहली बार बकिंघम पैलेस में अपना घर जनता के लिए खोलने का फैसला किया ।
महारानी को उनकी मां, नानी और नानी के सम्मान में यॉर्क की एलिजाबेथ एलेक्जेंड्रा मैरी विंडसर नाम दिया गया था । बचपन में उन्हें परिवार में युवा लिलिबेट कहा जाता था, क्योंकि तब वह “एलिजाबेथ” का ठीक से उच्चारण नहीं कर पाती थी । अपनी दादी क्वीन मैरी को लिखे एक पत्र में, युवा राजकुमारी ने लिखा था, ‘प्रिय दादी । प्यारी सी जर्सी के लिए बहुत–बहुत धन्यवाद । हमें आपके साथ सैंड्रिंघम में रहना अच्छा लगा । मैंने कल सुबह एक उपर का सामने वाला दांत खो दिया,” अंत में, “लिलिबेट का प्यार ।” उनके उपनाम प्रिंस हैरी और मेघन, डचेस ऑफ ससेक्स के बाद अधिक जाना जाने लगा । उन्होंने २०२१ में अपनी बेटी का नाम लिलिबेट डायना रखा ।
नेपाल और महारानी एलिजाबेथ
नेपाल और बिलायत का सम्बन्ध सदियों पुराना है । भारत में ईस्ट इन्डिया कम्पनी के शासन के समय में ही ब्रिटिस नेपाल के साथ सम्पर्क में आ चुका था । नेपाल ब्रिटिस सम्बन्ध का इतिहास सन् १७९२ मार्च १ के नेपाल और ईस्ट इन्डिया के बीच सम्पन्न वाणिज्य सन्धि से शुरु होता है । सन् १८०१ में नेपाल में ईस्ट इन्डिया कम्पनी का आवासीय प्रतिनिधि रखने के सम्बन्ध में दूसरी संधि हुई थी । जिसके आधार पर कैप्टन नक्स पहले प्रतिनिधि के रूप में उसी वर्ष नेपाल आए थे और करीब एक वर्ष तक नेपाल में रहे थे । सन् १८१४÷१६ में नेपाल अंग्रेज युद्ध के क्रम में हस्ताक्षर हुए सुगौली सन्धि के बाद तो निरन्तर रूप में नेपाल में ब्रिटिस आवासीय प्रतिनिधि रहने लगे थे । सुगौली सन्धि के द्वारा नेपाल और ब्रिटिस सरकार औपचारिक रूप में दौत्य सम्बन्ध में प्रवेश करने के बाद नेपाल द्वारा मित्रता और सद्भाव स्वरूप ब्रिटिस शासक के जन्मदिन, निधन और राज्याभिषेक में हर्ष, शोक एवं सम्मान में तोप दागने का चलन शुरु हुआ था ।
सन् १९३४ में नेपाल द्वारा बेलायत के लन्दन में पहला कूटनीतिक नियोग (लिगेसन) खोलने के समय वहाँ के राजा जॉर्ज पञ्चम थे । इसके साथ ही लन्दन में नेपाल सरकार का आवासीय प्रतिनिधि (राजदूत) रहने लगे थे । उसके बाद ब्रिटिस सरकार एवं शाही समारोह में नेपाल सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वो अपनी सहभागिता दर्ज कराते थे । सन् १९३५ में राजा जॉर्ज पंचम के शासनसत्ता के २५ वर्ष पूरा होने के अवसर पर आयोजिते रजतजयन्ती समारोह के समय से नेपाल के प्रतिनिधि औपचारिक रूप में भाग लेने लगे थे । सन् १९३६ जनवरी में राजा जॉर्ज पंचम के निधन पर अन्त्येष्टि समारोह में वहाँ स्थित नेपाली राजदूत कृष्णशमशेर शामिल हुए थे ।
जॉर्ज पंचम के बाद कम ही समय के लिए रहे राजा एडवार्ड आठवें के औपचारिक राज्याभिषेक समारोह नहीं हुआ । किन्तु उसके बाद सन् १९३७ में सम्पन्न राजा जॉर्ज छठे के राज्याभिषेक समारोह में इतिहास में पहली बार नेपाल ने अपना प्रतिनिधि भेजा था । उस समय कमान्डिङ जनरल केशरशमशेर के नेतृत्व में नारायणशमशेर और सुरेन्द्रशमशेर सहभागी हुए थे । एलिजाबेथ का विवाह सन् १९४७ नोभेम्बर में हुआ था । उनके विवाह में नेपाल सरकार की तरफ से तत्कालीन नेपाली राजदूत केशरशमशेर जबरा ने प्रतिनिधित्व किया था । विवाह समारोह में नेपाल के प्रधानमन्त्री पद्मशमशेर जबरा ने उन्हें चाँदी को फूलदान उपहार भेजा था । मोहनशमशेर के समय में राजगद्दी की उत्तराधिकारी राजकुमारी एलिजाबेथ को नेपाल का सर्वोच्च सम्मान ‘ओजस्वी राजन्य’ तक्मा प्रदान किया गया था ।
उसी दौर में संसार के सबसे ऊँचे हिमशिखरे सगरमाथा हिमाल पर पहली बार मानव ने कदम रखा था । यह घटना सन् १९५३ मई २९ की है जब तेन्जिङ नोर्गे शेर्पा और एडमन्ड हिलारी सर्वप्रथम सगरमाथा के शिखर पर पहुँचे थे । किन्तु इस की जानकारी नेपाल में किसी को नहीं दी गई । इस बात को २ जून तक गोप्य रखा गया । इसकी जानकारी एलिजाबेथ द्वितीया के राज्याभिषेक समारोह में बेलायत से सार्वजनिक की गई थी ।
ब्रिटिस राजपरिवार के उस राज्याभिषेक समारोह में नेपाल की ओर से पहली बार राजपरिवार के सदस्य शामिल हुए थे । नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन के प्रतिनिधि के रूप में अधिराजकुमार हिमालय और उनकी पत्नी अधिराजकुमारी प्रिन्सेप (गृह राज्यलक्ष्मी) शामिल हुए थे । ब्रिटिस राजपरिवार के राज्याभिषेक समारोह में सहभागिता की यह घटना नेपाल के राजपरिवार की पहली और अंतिम थी ।
महारानी एलिजाबेथ के साथ राजा महेन्द्र और राजा वीरेन्द्र का निकट सम्बन्ध था । एलिजाबेथ ने लन्दन में राजा महेन्द्र (सन् १९६०) और राजा वीरेन्द्र (सन् १९८०) का राजकीय अतिथि के रूप में स्वागत किया था । उन्होंने बकिंघम राजदरबार में शंकरशमशेर जबरा से लेकर वर्तमान में ज्ञानचन्द्र आचार्य को लेकर नेपाल सरकार के प्रतिनिधि के रूप में १८ राजदूतों का स्वागत किया था ।
जब राजा महेन्द्र ने महारानी एलिजाबेथ द्वितीया को नेपाल आमंत्रित किया था तो, उन्हें नेपाल में शिकार खेलने के लिए भी आमंत्रित किया था । उस समय २०१७ पुस १ गते राजा महेन्द्र ने संसद् विघटन कर के प्रजातन्त्र को नजरअंदाज करते हुए निर्वाचित प्रधानमन्त्री सहित बहुतों को जेल में बंद करवा दिया था । ऐसे समय में एलिजाबेथ के उक्त भ्रमण को अत्यन्त महत्त्व के साथ देखा गया था । विश्लेषक यह मानते हैं कि राजा महेन्द्र ने उस समय महारानी को नेपाल बुलाकर अपने द्वारा उठाए गए कदम को नैतिक समर्थन प्रदान करने का संदेश देना चाहा था । उस समय इसका विरोध भी हुआ था किन्तु महारानी का नेपाल भ्रमण नहीं रुका था । शाही परिवार को शिकार का शौक था जिसके लिए भी नेपाल भ्रमण का क्रम जारी रहता था । सन् १९८० के नवम्बर में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के निमन्त्रण में तत्कालीन राजा वीरेन्द्र ने बिलायत का राजकीय भ्रमण किया था । राजा वीरेन्द्र के उक्त भ्रमण में उन्हें एलिजाबेथ द्वितीय ने ब्रिटिस सेना का फिल्ड मार्सल की पदवी प्रदान की थी । राजा वीरेन्द्र के बेलायत भ्रमण के बाद ही उनके निमंत्रण पर महारानी एलिजाबेथ दूसरी बार नेपाल आई थीं और यही उनकी नेपाल की अंतिम यात्रा थी ।
नेपाल–यात्रा की कुछ मधुर यादें
महारानी के निधन के पश्चात् नेपाल सरकार ने तीन दिनों का राजकीय शोक घोषित किया, यह बताता है कि नेपाल के लिए महारानी एलिजाबेथ का क्या महत्त्व है । नेपाल में महारानी एलिजाबेथ का २०१७ में दो दिनों का और २०४२ में चार दिनों का भ्रमण हुआ था । जिसे आज भी बहुत आदर और सम्मान के साथ याद किया जाता है । चार दिन के राजकीय भ्रमण के क्रम में महारानी द्वितीय अपने पति प्रिन्स फिलीप के साथ जब ६ फागुन २०४२ में दूसरी बार नेपाल आई थीं तो उनका स्वागत राजा वीरेन्द्र और रानी ऐश्वर्य ने किया था । रानी एलिजाबेथ की नेपाल यात्रा को इतने वर्षों के बाद भी यहाँ के नागरिक याद करते हैं । चमकीले पीले कोट और टोपी पहने हुए महारानी एलिजाबेथ और फिलिप पूर्ण सैन्य पोशाक में, विशेष ब्रिटिश एयरवेज ट्राइस्टार से त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल पहुँची थीं । नेपाली राजपरिवार द्वारा अभिवादन के बाद उन्होंने गोरखा सेना के सम्मान गार्ड का निरीक्षण किया था । नेपाली पोशाक से सजी पाँच युवतियों ने उनका फूलों की माला से स्वागत किया । अपने चार दिनों की यात्रा में महारानी ने करीब दो सौ सेवानिवृत्त गोर्खा सैनिकों के साथ मुलाकात भी की थी । महारानी से मुलाकात के कार्यक्रम में बिलायत का सर्वोच्च बहादुरी पुरस्कार भिक्टोरिया क्रस के सात धारक और मिलिट्री क्रस या मिलिटरी मेडल प्राप्त करने वाले ५० व्यक्ति थे ।
सन् १८१४ के एङ्ग्लो नेपाल युद्ध के बाद गोर्खा सैनिकों को बिलायत ने अपनी सेना में भरती किया था । गोर्खा सैनिकों ने पहला विश्व युद्ध, दूसरा विश्वयुद्ध और सन् १९८३ का फकल्याण्ड टापु युद्ध सहित कई प्रमुख युद्धों में अपनी सेवा दी है । नेपाल आने पर पहले दिन रानी एलिजाबेथ और फिलिप ने राजधानी के दरबार स्क्वायर क्षेत्र का अवलोकन किया था । काष्ठमण्डप मन्दिर की सीढी पर रंगीन पोशाक पहने हुए विद्यार्थियों ने नेपाली झण्डा के साथ उनका वहाँ पर स्वागत किया था । बैगनी साड़ी से सजी नेपाली युवतियों ने उनपर फूलों की वर्षा की थी । नेपाल का काष्ठमण्डप मन्दिर विश्व चर्चित मंदिर है जो पैगोडा शैली में निर्मित है । महारानी एलिजाबेथ के दूसरे भ्रमण से ही काठमाडौं कका चाभी हस्तान्तरण की परम्परा की शुरुआत हुई थी । राजकीय भ्रमण के क्रम में महारानी एलिजाबेथ दम्पती को नेपाल के पुराने राजदरबार हनुमानढोका क्षेत्र का निरीक्षण करने के साथ ही काष्ठमण्डप में नगर की चाभी हस्तान्तरण के लिए तत्कालीन राजा वीरेन्द्र, अधिराजकुमार ज्ञानेन्द्र तथा राजपरिवार के अन्य सदस्यों के साथ ही सरकार और स्थानीय निकायों ने दो वर्ष पहले से ही तैयारी शुरु की थी ।

उस समय काठमाडौं के नगर पञ्चायत के प्रधान पंच कमल चित्रकार थे । महारानी एलिजाबेथ ने आगन्तुक पुस्तिका में हस्ताक्षर किया था और मेयर कमल चित्रकार ने शहर की चाबी दी थी । महारानी एलिजाबेथ को काष्ठमण्डप में काठमाडौं नगर का परम्परागत चाबी का प्रतीक हस्तान्तरण करने की जिम्मेदारी उनको ही दी गई थी । महारानी एलिजाबेथ को नेवाः परम्परा के अनुसार दुल्हन की तरह काष्ठमण्डप में लाकर चाबी हसतान्तरण की योजना थी । यह सोच राजा वीरेन्द्र की थी । उसके बाद महारानी और प्रिन्स फिलिप का राजा वीरेन्द्र ने नारायणहिटी दरबार में स्वागत किया था ।
महारानी एलिजाबेथ का जाना निःसंदेह एक युग का समाप्त होना है । नेपाल हमेशा महारानी एलिजाबेथ को एक सच्चे मित्र के रूप में स्मरण करेगा । नेपाल सरकार द्वारा उनके निधन पर तीन दिनों का राजकीय शोक घोषित करना उनके लिए नेपाल के सम्मान को दर्शाता है और यह बताता है कि नेपाल का बिलायत और महारानी एलिजाबेथ के साथ कितना आत्मीय रिश्ता रहा है ।
– हिमालिनी, (सितम्बर, २०२२ अंक) से

