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‘स्वतन्त्र’ की आंधी में साम्यवादी और समाजवादी की हिलती जड़ें

 

नेपाल में सम्पन्न पिछले स्थानीय निर्वाचन में स्वतंत्र उम्मीदवारों के प्रति आम नागरिकों, युवाओं और महिलाओं में जो झुकाव और समर्पण देखा गया; उसने नेपाल जैसे छोटे परंतु पौराणिक धरोहरों से सुशोभित देश के लिए एक विचारणीय माहौल उत्पन्न कर दिया है ।
नेपाल में लोकतंत्र को स्थापित हुए तीन दशक से अधिक हो गया है । लेकिन यहां के नागरिकों को अबतक साम्यवाद और समाजवाद की जरा सी भी भनक नहीं मिल पायी है । इन ३२ वर्षों में हजारों नेता, कार्यकर्ता और कर्मचारी देश और जनता की आत्मा को लूटकर विदेशों में अपनी संतानों को स्थापित करने में सफल हो गए हैं । देश और आम नागरिकों की भावना और गरिमा को बेचकर इन्हें कंगाली के दलदल में धकेल दिया गया है । ताकि इनकी आवाज कभी बुलंद न हो सके । इन्हें रोजी रोटी के चक्कर में ही अपनी जवानी बिताने को मजबूर होना पड़े । उधर उन लुटेरों के संतान विदेश से विद्वान का नकली प्रमाण पत्र लेकर नेपाल में रवि लामिछाने की तरह सत्ता में काबिज होने के लिए कालनेमी की तरह हमें अपनी जाल में फसाकर हमारी भावी पीढ़ी को भी लूटते रहे । उन्हें गुलामी के जंजीरों में जकड़े रहे । स्वतंत्रता के प्रति आम नागरिकों में देखे जा रहे रुझान के पीछे ऐसे ही कुछ और महत्वपूर्ण कारण हैं । जो पहले से सत्ता कब्जाए हुए लोग तथा तथाकथित पार्टी के विवेक शून्य सिद्धांतवादी नेताओं की नींदे हराम करने लगी है ।

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लेखकः अजय कुमार झा

दलीय घोषणा पत्र, विधान, सांगठनिक संरचना, कार्यक्रम, कार्य योजना, सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहरों तथा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति, व्यापार, संधि–समझदारी, आदि हजारों ऐसे क्रियाकलाप जो व्यक्तिवादी अर्थात् स्वतंत्र उम्मीदवार के हक में भीषण समस्या के रूप में दिखाई पड़ रहा है । इस में थोड़ी सी भी गड़बड़ हो जाए तो देश को बर्बाद होते देर नहीं लगेगा । विदेशी षडयंत्रों में फसते देर नहीं लगेगा । और यह भी हो सकता है कि हमारा स्वतंत्र देश का गौरव ही मिट जाए । लेकिन, प्रश्न यह उठता है कि, “क्या हमारा देश अभी स्वतंत्र है ? ” यदि हां, तो भारत, चीन और यूरोप–अमेरिका हमें अपनी बातों को मानने के लिए मजबूर क्यों करता रहता है ? हमें बार–बार प्रधान मंत्री बनाने के लिए उनका आशीर्वाद क्यों लेना पड़ता है ? यहां तो नेपाली लॉवी के नेता है ही नहीं ! कोई भारतीय लॉवी, चिनिया लॉवी, युरोपेली लॉवी तो कोई अमेरिकी लॉवी के नेता लोग हैं । और ध्यान रहे, लॉवी का अर्थ हुआ; उसका गुलाम । अर्थात उसके इशारों पर काम करने वाले लोग । दूसरों के इशारों पर काम करने वाला कभी भी देश और जनता के हित में नहीं सोच सकता । ऐसे लोग मानसिक और शारीरिक रूप से पूर्णतः गुलाम होते हैं । अब कौन किस लॉवी का है ? यह यहां उल्लेख करने की आवश्यक नहीं है । लोग जानते हैं कि हमारी कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका तीनों अंग विदेशी के हाथों की कठपुतली है । कोई होली वाइन पीकर राष्ट्रवाद का झंडा फहराता है । कोई मुजरे की धुन पर तांडव करता है । तो कोई कंगफू कराटे चलाता है । तो कुछ प्राणायाम की फूक मारते दिख रहे हैं । इन सब के बावजूद; लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को देखते ही सब के सब कुत्ते की तरह दुम हिलाते नजर आने लगते हैं । यही है हमारा असली राष्ट्रीय चेहरा ।
गौर से देखा जाए तो सारे पार्टी विदेशी के इशारों और पैसे पर स्थापित किया गया है । कांग्रेस का समाजवाद, भारत से आयातित है, कार्ल माक्र्स, लेलिन, माओत्से तुंग ए लोग नेपाल के किस जिला में जन्मे थे ? यह प्रश्न नेपाली जनता को ओली, नेपाल, खनाल, दहाल, कोइराला आदि से पूछना चाहिए । ऐसी हालत में जो पार्टी और सिद्धांत विदेशी धन और बुद्धि से संचालित है; उससे नेपालियों का कल्याण कदापि नहीं हो सकता । भीख में मिला हुआ धन और बुद्धि; दोनो नपुंसकता और दरीद्रता का कारण बनता है । किसी वंश तथा सभ्यता के विनाश का मूल कारण बनता है ।
आकर यहीं हम भूल कर बैठे हैं ।
लुटेरा के हाथों में दिल दे बैठे हैं ।।
अतः अपनी मिट्टी में छुपे संस्कारों से पल्लवित ज्ञानपुष्प को खोजकर दूरगामी विकास के बटवृक्ष लगाने होंगे । जिसकी छाया तले हम नेपालियों की हजारों पीढ़ी शांति, आनन्द और जीवन का मजा ले सके । लेकिन दुर्भाग्य हमारा कि, हमारी राजनीतिक संस्कृति और संस्कार को पल्लवित, पुष्पित होने के लिए हमें विदेशी वृक्षों की छांव प्रिय लग रहे हैं । आज अमेरिका से ‘पी–एच डी’ करने वाले भठियारा भी हमें हमारा तारणहार लगने लगा है । हम खुद को विदेशी मापदंडों से देखने के आदी हो गए हैं । विदेशी तथा विदेश से प्रमाण पत्र लेकर आनेवाला दुष्चरित्र भी हमें श्रीराम से उत्तम लगने लगे हैं । हमें मनोवैज्ञानिक रूप से गुलामी के गर्त में धकेल दिया गया है । इससे निकलने के लिए हमें अपने मौलिक विचार और पहचान को समझना होगा; अन्यथा संभव नहीं है ।
नेपाल के संदर्भ में, “आज के नेताओं में सैद्धांतिक ह्रास, नैतिक पतन और षडयंत्रयुक्त संस्कार होने के कारण वे लोग भस्माशुर के संतान हो गए हैं ।” इसी क्षुद्रता से आक्रोशित नेपाली जन समुदाय पार्टियों से ही घृणा करने लगे हैं । नागरिक के मन में पार्टी, सिद्धांत और नेताओं के प्रति घृणा उत्पन्न करने का काम इन विदेशी पिट्ठूओं का ही है । ध्यान रहे, उन्हें यह कहते देर नहीं लगेगी कि, “कुछ विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के द्वारा राजा को स्थापित करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदनाम करने का षडयंत्र रचा जा रहा है ।” और इस घोषणा के साथ देश भक्त स्वतंत्र विचाराधारा के व्यक्तियों पर आक्रमण शुरू कर दिया जाएगा । जिसे हम और आप राजनीतिक चाल में फस गया बेचारा ! कहकर छुटकारा पाने का आत्मघाती प्रयास करेंगे । यह हमारी बौद्धिकता का पहचान बनेगा । जो जितना चापलूसी और गुलामी करेंगे; उन्हें उतना महान त्यागी, विद्वान और देशभक्त का बिल्ला दे दिया जाएगा । जो बाद में उनकी पार्टी के लिए काम करेंगे । हमें बहकाएंगे; भावनात्मक ब्लैकमेल करेंगे; और हम उन्हें उच्च पदाधिकारी, सम्मानित व्यक्ति, सरकारी विद्वान के रूप में उनकी गुणगान करेंगे । यही है हमारी मानसिक अवस्था ! हमारा वैचारिक संस्कार ! हमारे जीवन का लक्ष्य ! तो प्यारे ! जो खुद ही सत्य से दूर भागने में अपनी सफलता मानता हो; वह दूसरों को असत्य रूपी खाई में न ले जाकर क्या सत्य की उतुंग शिखरों का भ्रमण कराएगा ? असंभव !
अब हमें सोचना चाहिए कि, “क्या हम पार्टी, जाति, धर्म और व्यक्ति विशेष के निर्देशन पर ही उम्मीदवार÷खलनायक चुनेंगे ? अथवा इसमें मूलभूत संशोधन कर नैतिकवान, क्षमतावान, चरित्रवान, विद्वान, संतुलित विचारवाला, सम्यक व्यवहारवाला, प्राणी के प्रति करुणा और सहिष्णुता रखनेवाला, सद्भावयुक्त समाजसेवी, जीओ और जीने दो के पक्षधर, शिक्षा और समृद्धि के लिए लड़नेवाला, संपूर्ण देशवासी के भावना को कदर करनेवाला, राष्ट्रीय अस्मिता का परिचायक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उन्नायक, महामानव राम – कृष्ण सरीखे हमारे बीच छुपे हुए महान चेतना को पहचान कर अपना नायक उन्हें चुनेंगे ? इतना तो अनिवार्य है, कि, या तो हम मानव कल्याण हेतु नायक चुने अन्यथा खलनायक तो सत्ता छीन लेगा ही । वो काला काग है; झपट्टा मारकर लूटते देर नहीं लगेगा ।
जितने भी तथाकथित लोकतांत्रिक देश हैं उनमें भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रणालीवाला देश है । लेकिन जातीय और अप्रत्यक्ष धार्मिक तुष्टिकरण के षडयंत्र तथा सत्ता लिप्सा के कारण वह दिनहीन राष्ट्र के रूप में विवश था । सन २०१४ में प्रधान मंत्री के रूप में मोदी के आने के बाद से असली भारतियों को आंतरिक राहत मिल रही है । राष्ट्रहित में एक भरोसा उमड़कर विश्व के समक्ष प्रस्तुत हुआ है । जीवन, धन और अपनी विरासत तथा सभ्यता के संरक्षण और संवर्धन हेतु एक विश्वास पैदा हुआ है । और वह विश्वास है, ‘मोदी’ अतः एक व्यक्ति पर आज १०० करोड़ भारतीयों का विश्वास टीका हुआ है । बीजेपी पार्टी और उसकी सरकार तो पहले भी थी । विद्वान नेता पहले भी थे; लेकिन मोदी नहीं थे । वैसे ही हमारे यहां नेता नहीं है । बुद्ध के बाद कोई एक हर्क साम्पाङ्ग, बालेन् जैसे व्यक्ति का जन्म हो पाया है । जिसे कमजोर करने के लिए चारों ओर से नंगी तलवारें भांजी जा रही है । ऐसे अवसर पर हमें उनका साथ देना चाहिए, न की मौन धारण करना चाहिए । हमारी चुप्पी इन भ्रष्टों के लिए ताकत का काम करेगा । इस कारण हमें हमेशा चौकन्ना रहने की आवश्यकता है । अपने स्वतंत्र नेतृत्व का संरक्षण और आवश्यक मार्ग निर्देशन करते रहना होगा ।
पार्टी के भीतर हम चाहकर भी अच्छे लोग नहीं खोज पाएंगे । हरेक पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व अपनी पार्टी के लिए गुलाम चरित्र को ज्यादा पसंद करते हैं । आप खुद ही अध्ययन कर लीजिए; कोइराला के बाद देउवा लगातार प्रधान पद पर विराजमान हैं । माधव नेपाल, खनाल, ओली, प्रचण्ड, थापा, उपेंद्र यादव, महंत ठाकुर बस यही लोग पिछले ३२ वर्षों से नेपाल की राजनीति को दबोचे हुए है । इनमे से किसी से भी सुंदर भविष्य की कल्पना करना आत्मघात को दावत देने जैसा है । साथ ही पार्टी में जो शुभ लोग हैं, उन्हें ये लोग कभी नहीं आगे बढ़ने देंगे । कृष्ण प्रसाद भट्टराई को गिरिजा कोइराला ने और बाबूराम भट्टराई को प्रचंड ने जैसा व्यवहार किया है वह अन्य पार्टियों के लिए भी नमूना के रूप में विद्यमान है ।
पिछले स्थानीय तह के निर्वाचन में ७ सौ ५३ स्थानीय तह में ८ हजार ७१ लोग स्वतन्त्र उम्मीदवारी दिए थे । जिसमे ३ सौ ८७ लोग विजय प्राप्त करने में सफल रहे । ध्यान रहे, २०७ के स्थानीय निर्वाचन में सिर्फ २३३ स्वतंत्र उम्मीदवार विजयी हुए थे । पालिका प्रमुख में २०७४ में ४ लोग विजय प्राप्त किए थे । तो इस बार १३ लोग विजय प्राप्त किए हैं । यह संकेत आगे की ओर इशारा करता है । जिसे पार्टी नेतृत्व ने भांप लिया है । और उन नामी मेयर को असफल बनाने का षडयंत्र रच रहे हैं । जो पार्टी नेतृत्व के लिए घातक ही सिद्ध होनेवाला है । जनता के नेता को यदि सभी पार्टियां मिलकर असफल बनाने का प्रयास करता है; तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि, “हम पार्टी नेतृत्व जो कहते हैं उसे मानो; वरना फुटबाल की तरह लुढ़काते रहेंगे । हम अपने भ्रष्ट मंत्री शर्मा को भी नागरिक की भावना को कुचलते हुए पुनः मंत्री बनाएंगे; तुम हमारा कुछ नही उखाड़ सकते । तुम्हें हर हाल में हम में से ही किसी को चुनना होगा ।” तो क्या हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए ? क्या हम नया मोर्चा अथवा प्रणाली निर्माण नही कर सकते ? आइए, आगे बढ़ते हैं !
विगत पांच वर्षों में वाम एकता के नाम पर भारत विरोधी राष्ट्रीयता का पुरजोर नारा दिया गया । लोगों ने आकर्षित हो कर वाम एकता को बहुमत दिया; लेकिन जनता को महंगाई, भ्रष्टाचारी और धोखा के अलावा कुछ नहीं मिला । इधर बूढ़ा हो चुका कांग्रेस भी इनका विरोध न कर सत्ता हथियाने में ही लगा रहा । इससे आजित हो कर जनता राजनीति के नए आयामों की खोज कर रहे है । नई प्रणाली को स्थापित करना चाहते हैं । सभी पार्टियों के प्रति आम नागरिकों के मनोविज्ञान में तीव्र बदलाव का भाव देखा जा सकता है । जनता की इस भावना को बौद्धिक और प्राज्ञिक रूप से व्यवस्थापन हेतु हमारा यह दायित्व बनता है ; कि हम उनकी भावनाओं को शब्द देकर देश समक्ष प्रस्तुत करें । उनकी भावनाओं को उजागर कर समाज में वैचारिक क्रांति हेतु प्रसारित करें । नेपाल को समृद्ध बनाने के लिए यहां के राजनीतिक दल और नेतृत्वों में क्षमता नहीं है । इसीलिए आवश्यक है कि हम स्वतंत्र व्यक्ति को राजनीति में लाने का प्रयास करें । उन्हें सम्मान के साथ नेतृत्व पंक्ति में पहुंचाएं ताकि देश के समृद्धि और समरक्षण में वह अपने बौद्धिकता और इमानदारी का प्रयोग कर सकें, उपयोग कर सके । स्वतंत्र युवा शक्ति को आगे लाने के लिए जनता में जिस प्रकार से एक उत्साह और उमंग की भावना उत्पन्न हुई है वह पार्टियों के प्रति विद्रोह है; आज देश भर में हजारों युवा अपने को राजनीति में लाने के लिए उत्सुक दिख रहे हैं । ये ईमानदार, बुद्धिमान, प्रज्ञावान युवा लोग कल जाकर प्रतिनिधि सभा को सुशोभित करेंगे; देश हित में उत्तमोत्तम कदम उठाएंगे ।
उम्मीदवार स्वतंत्र हो या पार्टी के अधीनस्थ हो; उन्हें हर हाल में शिक्षित होना आवश्यक है । अतः सांसद के लिए स्नातकोत्तर शिक्षा अनिवार्य हो । विश्वमंच पर नेपाल के अस्तित्व को सुरक्षित और विकसित करने के लिए भी शिक्षा अनिवार्य है । ऐसे ही ६०–६५ के बीच का रिटायर्ड का समय अनिवार्य रूप से निर्धारित किया जाय । विकास के लिए की गई प्रतिबद्धता को यदि पूरा नहीं करता है तो ऐसे व्यक्ति और पार्टी को वैधानिक रूप में किसी भी सामाजिक कार्य के लिए आजीवन अयोग्य घोषित कर दिया जाय । तथा व्याजसहित का स्वतः दंड का प्रावधान हो । पार्टी के हक में केंद्रीय नेतृत्व को उपरोक्त दंड का अधिकारी बनाया जाय । प्रतिनिधि सभा के प्रत्येक सदस्य के पास इतना अधिकार होना चाहिए कि वह राष्ट्रहित में पूर्ण तर्क के साथ कानून निर्माण, सरकार गठन, संविधान संशोधन, जनमत संग्रह सम्बन्धी निर्णय, सरकार की कार्यनीति और बजट पारित, सरकार और संवैधानिक आयोग के कार्य को नियमित निगरानी, सरकार को आवश्यक सुझाव और निर्देशन, अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि–सम्झौता अनुमोदन के साथ–साथ सरकार को नागरिक के प्रति उत्तरदायी होने के लिए बाध्य कर सके । इसके बावजूद सरकार की गतिशीलता पर कोई आंच न आने पाए; इसके लिए संसद को वैधानिक और वैज्ञानिक तथ्य, तर्क तथा प्रमाण के साथ प्रस्तुत होने की बाध्यात्मक विधान हो ।
तीन बार से ज्यादा एक व्यक्ति किसी भी मंत्री पद पर नहीं रह सकता । इसी प्रकार जिस पर किसी भी प्रकार की अदालती कार्रवाई हो चुकी हो और वह दोषी करार दिया गया हो; तो भी ऐसे व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते । भ्रष्टाचार के किसी भी कार्यवाही में फंसे व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होना चाहिए । मंत्री बनने के लिए संबंधित विषय में मास्टर्स अथवा पी–एचडी का डिग्री होना अनिवार्य किया जाए । विदेशी नागरिकता लिए हुए व्यक्ति भी यहां चुनाव नहीं लड़ सकते हैं । इस तरह की अनेक सावधानियां हम बरत सकते हैं । वैसे स्वतंत्र उम्मीदवारी किसी भी देश के लिए अंतिम समाधान नहीं है; और किसी प्रणाली के लिए अंतिम समाधान हो सकता है । परंतु हम वर्तमान समस्या को देखते हुए और पार्टी भीतर के राष्ट्रीय षडयंत्र को मध्य नजर करके स्वच्छ छवि के स्वतंत्र उम्मीदवार को आगे ला सकते हैं । और यह एक नया प्रयोग हो सकता है । इसमें सफलता की अधिकतम आशा की जा सकती हैं ।

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हिमालिनी (सितम्बर २०२२ अंक)

नेपाल के संसद भवन में नेपाली जनता कुछ चेहरों को अब देखना नहीं चाहती हैं । उन्हें इन चेहरों से घृणा हो गयी है । और वह सारे के सारे चेहरे हर एक पार्टी के केंद्रीय नेता लोग हैं; जो देश को लूटना ही अपना लक्ष्य समझ चुके हैं । जनता को दुख देना ही इनका संस्कार बन गया है । इसका मतलब यह नहीं लोकतंत्र के विकल्प में राजतंत्र को स्थापित किया जाय । लोकतंत्र का विकल्प लोकतंत्र ही रहेगा । परंतु इसमें कुछ समय सापेक्ष परिवर्तन लाने होंगे; जैसे प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रधानमंत्री हो । और मंत्रिमंडल के सारे सदस्य विशेष उपाधि से सुशोभित हो । सांसद कभी भी मंत्री नहीं बनेंगे, अपनी संसद क्षेत्र को संवर्धित और विकसित करेंगे । मंत्री, संबंधित विभाग के विशेषज्ञ ही बनेंगे । दोबारा प्रधानमंत्री कोई नहीं बनेगा । दो बार से अधिक मंत्रिमंडल में कोई नहीं जाएगा । इस तरह प्रमोशन हो अथवा डिमोशन सभी एक प्रणाली के तहत चलेंगे । जिसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं चलेगा । और आधिकारिक व्यक्ति चाहे वह कर्मचारी हो अथवा मंत्रिमंडल के अंग; इनके द्वारा किया गया गलती हजार गुना माना जाएगा और उसी अनुपात में उन्हें दंडित किया जाएगा । इस तरह के कुछ संशोधन संविधान में करने के लिए हमें स्वतंत्र विचारधारा के स्वतंत्र उम्मीदवार आगे बढ़ा कर ही करना होगा । क्योंकि पार्टी के लोग अर्थात नेता लोग एक प्रकार के ठेकेदार हैं । इनकी पार्टी ठेके की कंपनी है; और यह किसी भी हालत में अपना घाटा कबूल नहीं करेंगे । अपने लिए गड्ढा नहीं खोदेंगे; वो चाहेंगे कब्र में जाते समय तक प्रधानमंत्री बना रहूं । इसीलिए स्वतंत्र व्यक्तित्व को राजनीति में आगे लाना आज की हमारी मजबूरी है ।

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– हिमालिनी, (सितम्बर, २०२२ अंक) से

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