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छठ न केवल मधेश का पर्व है वरन ये नेपाल का पर्व है : कंचना झा

 

कंचना झा, काठमांडू, ३० अक्टूबर – इसबार के छठ का आनंद तो सभी छठ के लोक घुन से उठा रहें हैं । हरबार दशमी और दीपावली के आने से पहले ही एक मंगल घुन सभी के मोबाइल में बजने लगता है जो सच कहें तो बहुत ही मनभावन लगता है । ईश्वर के प्रति आस्था विश्वास और श्रद्धा को जगाती है ये घुन । तो इसबार छठ के अवसर पर हम और आप सभी छठ के इस लोक घुन को सुन रहें हैं अपने अपने मोबाइल पर ।
ये न केवल मधेश का पर्व है वरन ये नेपाल का पर्व है जिससे यहाँ यानी काठमांडू के लोग भी अब अपरिचित नहीं हैं । आज से कुछ वर्ष पहले की यदि बात की जाए तो काठमांडू के लोगों में ये उत्सुकता तो होती थी कि छठ क्या होता है ? इसे कैसे मनाया जाता है ? क्या पकवान बनते हैं इसमें ? मगर ये सब कौतुहलता नहीं आती अगर मधेश के लोग यहाँ रहने के बाबजूद अपने गाँव घर में इसे मनाते । लेकिन कहते हैं न जो होता है अच्छे के लिए ही होता है । गाँव से बहुत से लोग पैसा कमाने के लिए, बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए अपना सबकुछ त्याग कर राजधानी आ जाते हैं फिर इसमें कुछ इस तरह से उलझ जाते हैं कि गाँव वापस जाना मुश्किल हो जाता है । तो माता पिता को भी पर्व त्योहार में यही बुला लेते हैं इस तरह एक अनजान जगह में पूजा की शुरुआत करते हैं और देखते देखते ये चारों ओर फैल जाती है । अब ये केवल तराई मधेश का ही नहीं वरन नेपाल का ही महान पर्व है ।
किसी भी समाज की पहचान होती है उस जगह की संस्कृति से और मिथिला की संस्कृति और पहचान तो त्योहारों से होती है । मिथिला एक ऐसी पावन भूमी है जहाँ शक्ति, जीवजन्तु, बनस्पती , की भी पूजा की जाती है । पूजा त्योहार के क्रम में शुरु हो गया है सूर्य की आराधना । हिन्दू संस्कृति में सूर्यपूजा बहुत प्रचलित है । महिला हो या पुरुष प्रत्येक दिन स्नान ध्यान करने के बाद प्रातःकालिन सूर्य की आराधना हम करते ही करते हैं ।
अब छठ के बारे में जानें तो इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है । छठ, षष्ठी छठि । जगह और भाषा बोली के अनुरुप नामों से पूजा अर्चना की जाती है । छठ पर्व का बहुत महत्व है । नहाय खाय से शुरु होकर यह व्रत तीन दिन तक लगातार चलता है । पंचमी अर्थात खरना दिन व्रत करने वाले सभी दिन भर उपवास कर संध्याकाल मिट्टी के नये चुल्हे पर नये बरतन में अरबा चावल और गुड डालकर खीर बनाई जाती है । कहा ये गया है कि जिनकी जितनी मनता रहती है केले के पत्ते पर उतनी जगह पर नवैद्य रखी जाती है । व्रती उस नवैद्ध को पूजा करने के बाद सबसे पहले स्वयं ग्रहण करती हैं उसके बाद ही ये प्रसाद सबों में बांटा जाता है ।
इस त्योहार की यही खासियत है कि जिनको जहाँ, जिस तरह से सुविधा होती है वो उस रुप में वैसे ही पूजा कर सकते हैं । घर का बना हुआ पकवान ही सूर्य को चढ़ाया जाता है । बाहर का पकबान नहीं चढ़ाया जाता है । वैसे अब लोग मिठाई चढ़ाने लगे हैं ।

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खरना की पूजा करतीं हिमालिनी की सम्पादक डॉ श्वेता दीप्ति

खरना के दिन से ही व्रत शुरु हो जाती है । खरना से लेकर सांझ के अध्र्य और सुबह का अध्र्य होने के बाद ही व्रती का व्रत टूटता है । खरना आप अपनी सुविधा अनुसार कर सकते हैं । बहुत लोग नहि किनारे भी करते हैं और बहुत लोग अपने घर में ।
षष्ठी के दिन पूरी पकवान बनतता है जिसमें ठेकुआ, भुसबा की प्राथमिकता रहती है । इसके अलावे केला, ईख, पान, नारियल, मिट्टी की हाथी ,बाँस का चंगेरा , बाँस का सूप, बाँस का छिटा, कोसिया और दीप आदि नदी के पास लेकर जाया जाता है । सूर्यास्त होने से पहले सभी व्रती नदी के पानी में खडेÞ होते हैं और मनता अनुसार अलग अलग सूप , छिटा और जो कुछ भी रहता है उसे सूर्य को दिखाते हुए अध्र्य देकर भगवान सूर्य को श्रद्धापूर्वक दिखाते हैं । इस दिन सूर्यास्त की पूजा की जाती है इसलिए इस दिन के पूजा को प्रायः शाम का छठ कहा जाता है ।
सप्तमी के दिन सूर्योदय की प्रतीक्षा होती है । सूर्याेदय के बाद अध्र्य दिया जाता है और वहीं नदी के पास ही बैठकर सभी कथा को सुनते है । घर आकर व्रती प्रसाद ग्रहण करती हैं उसके बाद सभी में प्रसाद का वितरण किया जाता है । ये एक ऐसा पर्व है जिसे पुरुष भी बहुत श्रद्धा से करते हैं । वो भी व्रत लेते हैं और पानी में खड़े होते हैं
मधेश के साथ–साथ ही अब यह पर्व काठमांडू में भी हर्षो उल्लास के साथ मनाया जाता है । हम और आप कहीं भी रहें अपनी संस्कृति, अपने पर्व को जरुर मनाए । आप सभी को छठ के इस पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं ।

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