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मधेश का दर्द ही, मधेशी नेताओं की समृद्धि की सीढी बनती रही है : श्वेता दीप्ति

 

आगामी चुनाव को लेकर मधेशी नेताओं की मधेशी जनता के घरों के चक्कर लगाने जारी हैं । नेताओं को वोट की चिन्ता है और मधेशी जनता के दर्द हरे हो रहे हैं । उनकी पीडा अपनी जगह कायम है जबकि मधेशी प्रतिनिधि की सम्पन्नता आसमान छू रही है ।  मधेस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के सात साल गुजर चुके हैं, लेकिन उससे पीड़ित लोग आज भी दर्दनाक जिंदगी जी रहे हैँ। लगभग सभी दलों के नेताओं ने उनके पुनर्वास और उन्हें मुआवजा देने के वादे किए, लेकिन उन पर किसी ने अमल नही किया। अब जबकि देश में आम चुनाव का माहौल है, तो इस मसले ने फिर सबका ध्यान खींचा है।

2015 में नए संविधान को लागू करने के समय मधेश समुदाय के लोग आंदोलन पर उतर आए थे। उस दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई में कई लोगों की जान गई, अनेक लोग घायल हुए और संपत्ति का भी भारी नुकसान हुआ। मधेश आंदोलन का नेतृत्व तब सद्भावना पार्टी ने किया था।  नए संविधान में मधेस आबादी के हितों की अनदेखी को लेकर आन्दोलन करने वाली पार्टी ने ऐन मोके पर अपने हाथ पीछे खींच लिए थे । सरककार ने जमकर दमन किया था । सैकडों की जानें गई और सैकडों की जिन्दगियाँ अपाहिज हो गईं । जो अपनी जगह आज भी कायम है । आंदोलन के दौरान हिंसा पीड़ित हुए लोगों का अब मधेश पार्टियों से भरोसा डिग चुका है। उन्हें शिकायत है कि हर पार्टी ने उन्हें राम भरोसे छोड़ दिया। मधेश की जनता का आरोप है कि मधेशी पार्टियां किसी के लिए कुछ नहीं करतीं। वे सिर्फ संघीय सरकार में हिस्सा पाने की सौदेबाजी करने में लगी रही हैं।

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आंदोलन के बाद सद्भावना पार्टी ने कहा था कि वह हर जख्मी का पुनर्वास कराएगी। साथ ही सबको 50 लाख रुपये मुआवाजा सरकार से दिलवाया जाएगा। 2017 के आम चुनाव के लिए जारी घोषणापत्र में दो अन्य पार्टियों राष्ट्रीय जनता पार्टी और संघीय समाजवादी फोरम ने भी ऐसे ही वादे किए। लेकिन इनमें से कोई भी पार्टी उन वादों को पूरा करने के प्रति गंभीर नहीं दिखी है।

राष्ट्रीय जनता पार्टी और संघीय समाजवादी फोरम ने 2017 में 17 संसदीय सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि मधेश प्रांत में नेपाली कांग्रेस, माओवादी केन्द्र और एमाले मिल कर 13 सीटें जीत पाई थीँ। प्रांतीय विधायिका में भी इन दोनों दलों को बहुमत मिला और उनकी सरकार बनी। लेकिन बीते पांच वर्षों में मधेस इलाके के राजनेता आपसी टकराव, पार्टियों में विभाजन और नई पार्टी के गठन में जुटे रहे। इस बीच वे उऩ लोगों को भूल गए, जिनकी वजह से उन्हें सियासी ताकत मिली।
अब हो रहे आम चुनाव में मधेश इलाके की नुमाइंदगी करने की होड़ में जनता समाजवादी पार्टी और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी मैदान में हैं। लेकिन इनमें भी कुल मिला कर वे नेता ही हैं, जिन्होंने पहले मधेसवासियों को निराश किया है। यानि परिणाम वही ढाक के तीन पात । जनता के जख्म पर नेताओं की समृद्धि । मोहरे भी वही हैं मैदान भी वही, खेल भी वही है खिलाडी भी वही ।

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