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मतदान आपका अधिकार है, इसका सही उपयोग करें : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक नोवेम्बर। देश में एक नई सरकार के लिए मतदान होने जा रहा है । वैसे देखा जाए तो नया कुछ भी नहीं है । क्योंकि नए और उर्जावान चेहरे को हम चुनते नहीं हैं । पता नहीं जनता कब इस मोहजाल से बाहर आएगी ? ऐसे में हमारे समक्ष वही थके चेहरे और वही पुराने वायदे पर नई लीपापोती है । जो इनके घोषणापत्रों के रूप में सामने आ रहे हैं । गली, मोहल्ला पार्टियों के घोषणापत्रों और आश्वासनों की बाढ़ से रंग–बिरंगी हो गई हैं । यही नहीं प्रतिनिधियों के घोषणापत्र जनता के हाथों से अधिक सड़कों पर बिखरे मिल रहे हैं । क्योंकि यकीन न इनके चेहरे पर है, न फितरत पर और न ही इन चोंचलों पर । यही वजह है कि, आम जनता घोषणापत्र को गंभीरता से नहीं ले रही क्योंकि उन्हें पता है कि ये महज शगुफा है जनता को लुभाने का और कुछ नहीं । अलबत्ता इस पर अध्ययन÷चर्चा करने के लिए बुद्धिजीवी और विशेषज्ञों को नया काम मिल गया है । ऐसे वादे जिसे हमारा देश कभी कार्यान्वयन नहीं कर सकता, उसके सपने दिखाए जा रहे हैं । जबकि पिछले चुनावों में किए गए वादे आज भी सफेद हाथी ही है । पार्टियों के घोषणापत्र में वर्णित स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, छोटी सड़कों का निर्माण, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा, देश में स्वास्थ्य चौकियां, अस्पताल और मुफ्त इलाज कैसे मुहैया कराया जाए; वृद्धावस्था भत्ता कितना और किस उम्र में दिया जाएगा; कितनी यूनिट तक बिजली सब्सिडी दी जाएगी और किस स्तर तक शिक्षा मुफ्त होगी ये सभी दिवा स्वप्न प्रतिनिधि जनता को दिखा रहे हैं ।
अब सवाल यह है कि मतदान दिया जाए या बेचा जाए । मतदान का शाब्दिक अर्थ है अपने मत का दान करना जो राष्ट्रहित में होता है जहाँ ‘स्व’ के लिए सम्भावनाएँ नहीं होती । जनता मत का दान करती है और जिसे यह प्राप्त होता है वह इसका उपभोग करता है । ऐसे में हमें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए क्योंकि दान दी हुई चीज भूल जाने के लिए होती है । यह शिकायत तभी लाजिमी है जब मत का दान नहीं किया जाए बल्कि अपने मत दिए जाएँ और उससे सही परिणाम हमारे समक्ष आए । इसलिए समय इस बात का है कि चंद रुपयों या स्वार्थ सिद्धि के लोभ में हम अपने मत को ना बेचें और जातिगत आधार को परे रख कर मत सही व्यक्ति को दें । हम आकलन करें उन दावों का, उन घोषणापत्रों का जो हमें दिग्भ्रमित करने के लिए बनाया गया है और बनाया जाता रहा है ।
कुछ दिनों पहले सोशल नेटवर्क पर एक स्लोगन ने धूम मचाया, ‘नो नॉट अगेन’ । इन तीन शब्दों ने राजनीतिक हलकों में एक बैचेनी ला दी थी । हम जानते हैं कि सोशल मीडिया वह स्थान है जहाँ लोग खुल कर अपने विचारों को व्यक्त करते हैं । सोशल मीडिया को ‘प्रत्यक्ष लोकतंत्र’ का नाम दिया गया है । नवीनतम जनमत को समझने के लिए सोशल मीडिया बहुत हद तक सहायक सिद्ध होता है । इसलिए, आज का लोकतंत्र सामाजिक नेटवर्क पर आसानी से परिलक्षित होता है ।
देश के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के प्रति आम जनता की खिन्नता और आक्रोश इस ‘नो नॉट अगेन’ स्लोगन के साथ खुल कर सामने आया । इस स्लोगन ने मुख्य पार्टी और उनके प्रतिनिधियों के दिलो दिमाग को विचलित कर दिया और परिणाम स्वरूप इस पर मुद्दा भी दायर हुआ । इसे अपवाह फैलाने वाला कहा गया । जो भी हो मुद्दा दायर होना ही यह बताता है कि स्लोगन का असर, पुरअसर था, जिसने एक अज्ञात भय नेताओं के दिलों में पैदा कर दिया था । यह सच्चाई है कि पार्टी नेताओं के रवैये ने लोगों को निराश किया है । यद्यपि सभी समान हैं, सभी अक्षम हैं और कोई भी नेता और दल काम नहीं करेगा, यह सच नहीं है । किन्तु जब हम समग्र में आकलन करते हैं तो हमें निराशा ही हाथ आती है क्योंकि नेताओं ने जनमत के अनुसार काम ही नहीं किया है ।
मतदान एक सचेत नागरिक के लिए उसका अधिकार है । क्योंकि इसके द्वारा ही हम देश को चलाने के लिए जनप्रतिनिधि चुनते हैं । लोकतंत्र में पार्टी का विकल्प पार्टी ही होती है । लोकतंत्र से अधिक सुंदर व्यवस्था आज तक प्रयोग में नहीं आई । इसलिए लोकतंत्र को जिन्दा रखना हमारा दायित्व होता है । यही वह व्यवस्था है, जो दुनिया भर में सबसे बेहतर व्यवस्था के रूप में जानी और अमल में लाई जाती है । आज इसका विकल्प तलाशने का समय नहीं है, लेकिन इस प्रणाली की कमजोरियों और त्रुटियों को कम करने के लिए सुधार करने की आवश्यकता अवश्य है ।
नेताओं के औचित्य और योग्यता के आधार पर भी उनक ाचयन होना चाहिए । इस चयन का विश्वसनीय साधन चुनाव है । यह लोगों पर निर्भर है कि वे किसे चुनते हैं ? सभी नेताओं का बहिष्कार नहीं किया जा सकता है और सभी नेताओं का चुनाव नहीं किया जा सकता है ।
हमारे द्वारा दिया गया वोट हमारे मौलिक अधिकारों, प्रजनन अधिकारों, महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य अधिकारों, लिंग और यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों और अन्य संबंधित मुद्दों सहित महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर हमारे दरवाजे पर आने वाले उम्मीदवारों के लिए एक प्रतिबद्धता बनाने में सक्षम होना चाहिए । .
हमें यह समझना होगा कि हम चुनाव में ‘मत दान’ नहीं करने जा रहे हैं, बल्कि हम मत देने जा रहे हैं, ताकि हम अपने मत की कीमत मांग सकें, जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बना सकें । पिछले चुनावों पर नजर डालें तो ग्रामीणों में तरह–तरह के सपने साझा किए गए । वो बस्तियां आज भी सपनों में जी रही हैं । सड़कें, पुलपुलेसा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुविधाजनक स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षित आवास, रोजगार, आर्थिक प्रगति, जीवन स्तर एक काल्पनिक रंगीन दुनिया में सिमट कर रह गए हैं ।
शायद इसीलिए सोशल मीडिया पर हर तरफ गुस्सा और गुस्से के भाव नजर आ रहे हैं । यह स्थिति मतदाताओं को उनके मतदान के अधिकार का प्रयोग करने से हतोत्साहित करती प्रतीत होती है । प्रत्येक नागरिक किसी न किसी रूप में राज्य को करों का भुगतान करता है। ज्यादा लोगों को पता नहीं है कि उस टैक्स का इस्तेमाल कैसे हो रहा है ? मतदान यह चुनने का एक अवसर है कि हम राज्य को जो कर का पैसा देते हैं, उसे कैसे खर्च किया जाए । उदाहरण के लिए, यह नागरिकों की स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, भौतिक बुनियादी ढाँचे और विकास, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास, और आर्थिक उन्नति जैसी सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही प्राप्त करने का एक अवसर है । हमारे समुदायों में आवश्यक महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध नेतृत्व का चुनाव करने के लिए विशेष प्रस्तावों और मतदान उपायों पर हमारे वोट एक विशेषाधिकार हैं ।
चुनाव प्रक्रिया में भाग लेना सामाजिक परिवर्तन का एक अवसर है । हमारा वोट समुदाय पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए अनुकूल है । चुनाव से प्रभावित कई सामाजिक मुद्दे हैं जिनमें लिंग और यौन अल्पसंख्यकों के आत्मसम्मान का अधिकार, समान–लिंग विवाह, प्रजनन अधिकार, पर्यावरण संबंधी मुद्दे, सार्वजनिक शिक्षा (लेकिन यहीं तक सीमित नहीं) शामिल हैं । चूंकि नेता सामाजिक एजेंडे को कम करने और हल करने की पहल करेगा, इसलिए चुनाव को सही नेतृत्व चुनने के अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए । हमारे समुदाय का विकास वर्ग, जाति, लिंग, भूगोल, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों की जागरूकता पर निर्भर करता है । इसलिए, समुदाय के कुछ लोगों को यह नहीं पता होगा कि मतदान कितना महत्वपूर्ण है । कई लोग मतदान शिक्षा से अनभिज्ञ हो सकते हैं, ऐसे समुदायों में मतदाता शिक्षा का समर्थन करना महत्वपूर्ण है । लोगों को अपने और अपने समुदाय के समग्र विकास के लिए आवाज बनने के लिए वोट करने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है । अतीत गवाह है, नियम, कानून, नीतियां और कार्यक्रम कितने भी अच्छे क्यों न हों, लोगों को सरकार से कितनी सेवाएं और सुविधाएं मिलेंगी, यह उन लोगों की जागरूकता, क्षमता, क्षमता और इच्छा पर निर्भर करता है जो उन्हें लागू करते हैं । यदि जिम्मेदार लोग अक्षम, अज्ञानी, लालची, पक्षपाती हैं, तो लोगों की विकास की इच्छा कभी पूरी नहीं होगी । एक सक्षम, ईमानदार और मेहनती जन प्रतिनिधि होना उस क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में एक कायाकल्प है । इसलिए वोट डालने से पहले हजारों बार सोचना जरूरी है ।
आसन्न चुनाव में मधेशी नेताओं के प्रति भी मधेश की जनता का रोष दिखाई देता है । नेताओं को वोट की चिन्ता है और मधेशी जनता के पुराने जख्म हरे हो रहे हैं । उनकी पीडा अपनी जगह कायम है । जबकि मधेशी प्रतिनिधि की सम्पन्नता आसमान छू रही है । मधेस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के सात साल गुजर चुके हैं, लेकिन उससे पीडि़त लोग आज भी दर्दनाक जिंदगी जी रहे हैं । लगभग सभी दलों के नेताओं ने उनके पुनर्वास और उन्हें मुआवजा देने के वादे किए, लेकिन उन पर किसी ने अमल नही किया । अब जबकि देश में आम चुनाव का माहौल है, तो इस मसले ने फिर सबका ध्यान खींचा है ।
२०१५ में नए संविधान को लागू करने के समय मधेश समुदाय के लोग आंदोलन पर उतर आए थे। उस दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई में कई लोगों की जान गई, अनेक लोग घायल हुए और संपत्ति का भी भारी नुकसान हुआ । मधेश आंदोलन का नेतृत्व तब सद्भावना पार्टी ने किया था । नए संविधान में मधेस आबादी के हितों की अनदेखी को लेकर आन्दोलन करने वाली पार्टी ने ऐन मोके पर अपने हाथ पीछे खींच लिए थे । सरकार ने जमकर दमन किया था । सैकड़ों की जानें गई और सैकड़ों की जिन्दगियाँ अपाहिज हो गईं । जो अपनी जगह आज भी कायम है । आंदोलन के दौरान हिंसा पीडि़त हुए लोगों का अब मधेश पार्टियों से भरोसा डिग चुका है । उन्हें शिकायत है कि हर पार्टी ने उन्हें राम भरोसे छोड़ दिया । मधेश की जनता का आरोप है कि मधेशी पार्टियां किसी के लिए कुछ नहीं करतीं । वे सिर्फ संघीय सरकार में हिस्सा पाने की सौदेबाजी करने में लगी रही हैं और अनैतिक गठबन्धन कर के अपने स्वार्थ को हर बार की तरह सिद्ध करने के प्रयास में लगी हुई है ।
आंदोलन के बाद सद्भावना पार्टी ने कहा था कि वह हर जख्मी का पुनर्वास कराएगी । साथ ही सबको १५ लाख रुपये मुआवाजा सरकार से दिलवाया जाएगा । यह १५ लाख उन लोगों को तो नहीं मिला जिन्होंने अपनों को गँवाया था जिनकी मौत इन नेताओं के लिए सत्ता प्राप्ति का साधन बनी थी, हाँ इनके बारे–न्यारे जरूर हो गए । हजारपति कैसे करोड़पति बन गए, पता ही नहीं चला । २०१७ के आम चुनाव के लिए जारी घोषणापत्र में राष्ट्रीय जनता पार्टी और संघीय समाजवादी फोरम ने भी ऐसे ही वादे किए । लेकिन इनमें से कोई भी पार्टी उन वादों को पूरा करने के प्रति गंभीर नहीं दिखी है । बस सत्तामोह में टूटते रहे और बिखरते रहे ।
राष्ट्रीय जनता पार्टी और संघीय समाजवादी फोरम ने २०१७ में १७ संसदीय सीटों पर जीत हासिल की थी । जबकि मधेश प्रांत में नेपाली कांग्रेस, माओवादी केन्द्र और एमाले मिल कर १३ सीटें जीत पाई थीं । प्रांतीय विधायिका में भी इन दोनों दलों को बहुमत मिला और उनकी सरकार बनी । लेकिन बीते पांच वर्षों में मधेस इलाके के राजनेता आपसी टकराव, पार्टियों में विभाजन और नई पार्टी के गठन में जुटे रहे । इस बीच वे उन लोगों को भूल गए, जिनकी वजह से उन्हें सियासी ताकत मिली ।
अब हो रहे आम चुनाव में मधेश इलाके की नुमाइंदगी करने की होड़ में जनता समाजवादी पार्टी और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी मैदान में हैं । लेकिन इनमें भी कुल मिला कर वे नेता ही हैं, जिन्होंने पहले मधेसवासियों को निराश किया है । यानि परिणाम वही ढाक के तीन पात । जनता के जख्म पर नेताओं की समृद्धि । मोहरे भी वही हैं मैदान भी वही, खेल भी वही है खिलाड़ी भी वही ऐसे में किसी नए परिणाम की उम्मीद करना जनता की नादानी ही होगी ।

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