Mon. Apr 20th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

क्यों ‘नो नॉट अगेन’ ? : लिलानाथ गौतम

 
लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम, हिमालिनी नोवेम्बर अंक। देश में चुनावी माहौल है । प्रतिनिसभा सदस्य और प्रदेशसभा सदस्य पद के लिए मार्गशीर्ष ४ गते चुनाव होने जा रहा है । चुनावी प्रतिस्पर्धा में कई गिनेचुने और पुराने नेता भी हैं । लेकिन इन्हीं पुुराने नेताओं को लक्षित करते हुए कुछ युवा समूह ने ‘नो नॉट अगेन’ का अभियान भी शुरु किया । अभियान हाल ही में शुरु नहीं है, चुनावी तिथि घोषणा होने के पहले से ही अभियान सुक्ष्म रूप में जारी था, चुनाव के दौरान तीव्र बन गया । जिसको लेकर राजनीतिक दल और नेताओं के बीच में ही नहीं, निर्वाचन आयोग और न्यायालय जैसे क्षेत्र में बहस शुरू हो गयी । ‘नो नॉट अगेन’ के विरुद्ध निर्वाचन आयोग और अदालत तक मुद्दा पहुँचा । अर्थात् आयोग की ओर से अभियान के विरुद्ध एक्सन लिया गया, मुद्दा सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गया । फिलहाल सर्वोच्च ने कहा है कि ‘नो नॉट अगेन’ भी अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता है, इसमें प्रतिबंद्ध नहीं लगाया जा सकता है ।
क्या है ‘नो नॉट अगेन’ अभियान ?
हमारे यहां कई ऐसे नेता हैं, जो पंचायतकाल से लेकर आज तक राजनीति में क्रियाशील हैं । अधिकांश प्रमुख दलों के प्रमख नेताओं की उम्र ६० साल से अधिक हो चुकी है । प्रमुख नेता ही नहीं, पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं की उम्र भी इसी के आसपास है, जो युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती । लेकिन राजनीतिक शक्ति उन्हीं के इर्दगिर्द मड़राती है । ऐसे नेता कई बार सांसद्, मन्त्री और प्रधानमन्त्री भी बन चुके हैं, लेकिन आम जनता की चाहत के अनुसार कुछ भी काम नहीं कर पा रहे हंै । देश की आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक हैसियत दिन–प्रति–दिन कमजोर होती जा रही है ।
ऐसी परिस्थिति में बार–बार के परीक्षण में असफल साबित नेताओं के विरुद्ध लक्षित कर सामाजिक संजाल में क्रियाशील युवा समूह ने गुप्त रूप में ‘नो नॉट अगेन’ का अभियान शुरु किया । अभियान में क्रियाशील वे लोग आज भी संचार माध्यम के सामने खुलकर नहीं आते हैं । अभियान में सहभागी लोगों का कहना है कि फिर भी पुराने ही प्रधानमन्त्री को पुनः प्रधानमन्त्री बनाने के लिए चुनाव किया जाता है तो उसका कोई भी अर्थ नहीं है । अर्थात् बार–बार के परीक्षण में असफल साबित नेता को अब प्रधानमन्त्री नहीं बनना चाहिए ।
सरकार, राजनीतिक पार्टी और नेताओं के प्रति असन्तुष्ट लोगों की भावना का प्रतिनिधित्व करते हुए शुरू इस अभियान के प्रति युवाओं की टोली आकर्षित हो गयी । विशेषतः वर्तमान प्रधानमन्त्री और ६ पूर्व प्रधानमन्त्री (शेर बहादुर देउवा, केपी शर्मा ओली, माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल, पुष्पकमल दाहाल और डा. बाबुराम भट्टराई) के विरुद्ध अभियान केन्द्रीत रहा । कहा गया कि अगर फिर भी वही लोग देश के प्रधानमन्त्री बनते हैं तो हमारी परिस्थिति में कोई भी बदलाव आनेवाला नहीं है । बताया गया कि अब इन लोगों को चुनाव में जैसे भी पराजित करना होगा और राजनीतिक जीवन से मुक्त करवाना होगा ।
सच भी यही है कि उल्लेखित नाम कई साल से राजनीति में चर्चा में हैं, इसमें से शेरबहादुर देउवा तो पाँच बार प्रधानमन्त्री बन चुके हैं । फिर भी कहा जाता है कि आगामी चुनाव के बाद देउवा ही प्रधानमन्त्री बनेंगे । दूसरे और तीसरे विकल्प में पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ और केपी शर्मा ओली का नाम है, जो दो–दो बार प्रधानमन्त्री बन चुके हैं, राजनीतिक शक्ति भी कई साल इनके ही हाथ में रही है । इसीलिए राजनीतिक संगठन से बाहर रहे आम जनता इनके प्रति आक्रोशित हैं, ऐसी ही पृष्ठभूमि में शुरु ‘नो नॉट अगेन’ चर्चा में आया । अभियान में सहभागी लोग कहने लगे कि सिर्फ पूर्व प्रधानमन्त्री ही नहीं, बार–बार सांसद् और मन्त्री रह चुके नेतागण और ६० साल से अधिक उम्र वाले नेतागण को भी चुनाव नहीं जीतना चाहिए । अभियान में सहभागी युवाओं ने ऐसे नेताओं की तस्वीर सामाजिक संजाल में रखते हुए उन लोगों को वोट न देने के लिए आग्रह किया । जिसके चलते कई पुराने नेता डरने लगे और अभियान के विरुद्ध बोलने लगे । जिसके चलते मुद्दा निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गया ।
अभियान का प्रभाव ः स्वतन्त्र उम्मीदवार और पार्टी
गत वैशाख ३० गते सम्पन्न स्थानीय चुनाव में देशभर स्वतन्त्र उम्मीदवारों की जो लहर आयी, उसमें भी ‘नो नॉट अगेन’ अभियान का प्रभाव रहा है । प्रभाव स्वरूप काठमांडू महानगरपालिका में बालेन साह, धरान और धनगढी उप–महानगरपालिका में हर्कराज साम्पाङ और गोपाल हमाल जैसे स्वतन्त्र उम्मीदवारों ने चुनाव जीत लिया । मार्गशीर्ष ४ गते के लिए तय प्रतिनिधिसभा सदस्य और प्रदेशसभा सदस्य चुनाव में भी इसका काफी प्रभाव दिखाई दे रहा है । नो नॉट अगेन अभियान, स्वतन्त्र उम्मीदवारों की लहर, परम्परागत मूलधार की राजनीतिक पार्टी और नेताओं के प्रति बढ़ती वितृष्णा जैसे परिस्थितियों को मध्यनजर करते हुए सञ्चारकर्मी रवि लामिछाने ‘राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी’ गठन कर चुनावी प्रतिस्पर्धा में उतर आए । दूसरी तरफ ‘लौरो’(लाठी) अभियान भी जारी है । बताया जाता है कि स्वतन्त्र पार्टी संबंद्ध उम्मीदवार कई निर्वाचन क्षेत्र में गिनेचुने नेताओं को चुनौती दे रहे हैं । अब देखना यह है कि मार्गशीर्ष ४ गते के बाद चुनावी परिणाम क्या होता है !
‘नो नॉट अगेन’ ठीक या गलत ?
वैसे तो सर्वोच्च अदालत ने ही कह दिया है कि ‘नो नॉट अगेन’ अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता का एक माध्यम है, इसको नहीं रोका जाए । हां, लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था के लिए यह अभिव्यक्ति स्वतन्त्र का एक माध्यम है । लेकिन इससे भी अधिक यह आम जनता की ताकत भी है । सामान्यतः बड़े–बड़े राजनीतिक पार्टी और नेताओं के सामने आम जनता निरीह प्राणी हैं, लेकिन वही जनता अगर विवेकशील हो जाते हैं तो चुनाव के समय उनको ऐसी शक्ति मिलती है, जो जितने भी शक्तिशाली नेताओं को धूल चटा देती है । हां, हमारे यहां ‘नो वोट’ की कानूनी व्यवस्था नहीं है । ऐसी परिस्थिति में राजनीतिक पार्टी की ओर से जो भी नेता चुनावी मैदान में खड़े हो जाते हैं, आम जनता उनको ही वोट देने के लिए बाध्य हो जाती है । ‘नो नॉट अगेन’ अभियान के पीछे भी यह एक कारण है । मतपत्र के माध्यम से खराब नेताओं को बहिष्कार करने की सुविधा ना होने के कारण विवेकशील युवाओं ने ‘नो नॉट अगेन’ अभियान शुरु कर दिया । आज यह प्रभावकारी भी दिखाई दे रहा है ।
लेकिन यहां एक स्मरणीय बात है, क्या ‘नो नॉट अगेन’ के नाम से सभी पुरानी पार्टी और नेताओं का बहिष्कार किया जाना चाहिए ? क्या सभी पुरानी पार्टी और नेता असक्षम और भ्रष्ट ही हैं ? यह प्रश्न जरूर सोचनीय है । सच भी यह है कि सभी पुराने नेता असक्षम और भ्रष्ट नहीं हैं । मूलाधार के पुराने पार्टी में कई ऐसे पुराने नेता हैं, जिनके पास राजनीतिक अनुभव और क्षमता भी हैं । वहीं पार्टी में कई जोशीले और दूरदृष्टि वाले युवा भी हैं, जिनके पास देश–निर्माण की योजना है । लेकिन ऐसे व्यक्ति अवसर से वंचित हैं या पार्टी के ही शीर्ष, शक्तिशाली और खराब नेताओं से दबे हुए हैं ।
दूसरी ओर ! स्वतन्त्र अभियान संचालन करनेवाले और नयी पार्टी से आबद्ध सभी नेता सक्षम और इम(ानदार हैं ? यह भी प्रश्न है । सच कहे तो विकल्प के रूप में खड़े कई उम्मीदवारों के पास कुछ भी राजनीतिक अनुभव नहीं है । इसमें से कई उम्मीदवार खराब एवं भ्रष्ट भी हो सकते हैं । इसीलिए ‘नो नॉट अगेन’ के नाम से सभी पुराने नेताओं के विरुद्ध कीचड़ उछालना ठीक नहीं है । इसका मतलव ‘यस मोर अगेन’ भी नहीं है । बस ! बार–बार के परीक्षण में असफल साबित नेताओं को अब विदा करना होगा । अगर पुरानी ही पार्टी से ईमानदार, जोशीले और दूरदृष्टि वाले योग्य उम्मीदवार चुनावी प्रतिस्पर्धा में हैं तो उनको जरूर अवसर मिलना चाहिए ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *