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चुनाव में सुदूर पश्चिम में कांग्रेस की जीत और एमाले की हार, आखिर क्या सन्देश देता है ?

 

नेपाल प्रतिनिधि सभा चुनाव परिणाम के शुरुआती चार दिनों के नतीजे नए राष्ट्र के निर्माण का संदेश दे रहे हैं। चीन से इतर भारत से नए संबंधों के बीच प्रधानमंत्री देउबा व प्रचंड के गठबंधन को बड़ी जीत मिली  है। सबसे अहम संदेश उत्तराखंड से सटे सुदूर पश्चिम  ने इस चुनाव में दिया है।

सभी जानते हैं की पूर्व प्रधान मंत्री ओली क रुझान चीन  से रहा है .  दरअसल भारत विरोध की शुरुआत ओली ने सुदूर पश्चिम से ही की थी .   कालापानी  को अपना बताते हुए चुनाव में विकास का मुद्दा से हट कर उनहोंने जनता को भटकाने की पुरजोर  कोशिश की थी । लेकिन यहां की 16 सीटें में से उन्हें मात्र तीन से ही संतोष करना पड़ा। वहीं, नेपाली कांग्रेस के सहयोगी दलों ने 10 सीटें जीतीं। ऐसे में नेपाल के जागरूक मतदाताओं ने ओली को बता दिया कि उनके लिए भारत की अहमियत चीन से कहीं ज्यादा है।

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चुनाव प्रचार के समय नेपाली कांग्रेस गठबंधन गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और स्वास्थ्य पर बात कर रही थी। लेकिन नेकपा (एमाले) के अध्यक्ष व पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मूलभूत मुद्दे से इतर चार नवंबर से सुदूर पश्चिम से ही भारत विरोध शुरू कर दिया। यहां से उन्होंने कालापानी को अपना बताया और कहा कि जिस तरह से इसे नये नक्शे में शामिल किया उसी तरह से लेकर भी रहेंगे। इसके बाद उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से सटे बैतड़ी व दार्चुला में भी इसी मुद्दे को दोहराया। 14 नवंबर को सुनसरी में हुई सभा में भी ओली के निशाने पर भारत ही रहा। वहीं, प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा और पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड ने अपनी सभाओं में भारत से सभी मुद्दों को बातचीत से सुलझाने पर जोर दिया था। हर मंच से यही कहा था कि भारत हमारा मित्र राष्ट्र है।

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नेपाल की जनता ने इस चुनाव में कई इतिहास रचा है . मधेश की राजनीति ने तो रुख ही बदल दिया है . लोगों का  मधेशी नेताओं पर से उठते  विश्वास के कारण पुराने दिग्गज नेताओं को जीतने के लिए कठिन मेहनत करनी पड़ी है . वहीँ  चुनाव में स्वतंत्र पार्टी ने अपना  जलवा दिखा दिया है . जो यह बताता है की जनता परिवर्तन चाहती है . पूरे चुनाव में  सबसे दिलचस्प मुकाबला सी के राउत और उपेन्द्र यादव के बीच  रहा . सी के राउत की जीत ने बता दिया कि नेता तभी बड़ा होता है जब वह  जनता के दिलों में रहता है . क्यों की नेता किसी जाति विशेष या क्षेत्र विशेष का  नहीं होता है . यह सच अब नेताओं को समझना होगा .

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