मधेश नेपाल का और मधेशी भारत का, मधेसी शब्द से जलन क्यों ? : अजयकुमार झा
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अजयकुमार झा, जलेश्वर 24 दिसम्बर । विगत कुछ वर्षों से मधेस में भाषा को लेकर चारों ओर हलचल मचा हुआ है। कोई मैथिली भाषा को सब पर थोपना चाहते हैं तो कोई भोजपुरी भाषा को। कोई मगही को लेकर आंदोलन में सक्रिय हो रहें हैं तो कोई बज्जिका को मधेस प्रदेश का सरकारी भाषा बनाना चाहते हैं। इन सब के बावजूद नेपाल के मामले में पहले भी हिंदी संपर्क भाषा थी और आज भी हिंदी पूरे नेपाली को एक सूत्र में पिरोने में सफल होती नजर आती है। सर्वविदित है कि देश के कोने-कोने और गांवों में रहने वाले शुद्ध नेपाली नागरिकों की भावनाओं को संप्रेषित करने के लिए हिंदी भाषा बहुत सर्व सुलभ और सहज है। नेपाल के लाखों नागरिक जो भारत में अपनी रोजी रोटी कमाने जाते हैं; उनके लिए हिंदी भाषा ही जीवनदायी है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कोरोना महामारी के काल में नेपाल भारत बॉर्डर पर देखे गए लाखों की भीड़ से ले सकते हैं। भारत के अलावा देशों में रोजगारी हेतु गए मधेशी तथा नेपालियों के लिए भी हिंदी ही संपर्क भाषा के अभिव्यक्ति का माध्यम बन प्राण वायु प्रदान करता आ रहा है। लेकिन दुर्भाग्य कहां है; एक ओर खस है जो भारत का नमक खाकर मधेसियों को नीचे दिखाने के लिए भारत को ही कोशता रहता है। उसके मानसिकता में मधेस नेपाल का है लेकिन मधेशी भारतीय है। परंतु चन्द पैसों के कारण खुद के इज्जत को बेचने वाला कुछ मधेशी हर हमेशा खस के एजेंडाको समर्थन करते रहते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। किसी ने सच ही कहा है, ” हमें अपनों ने मारा गैरों में कहां दम था! मेरी किस्ती वहां डूबी जहां पानी बहुत कम था।”
नेपाली भाषा में शिक्षा न दे पाने वाले लेकिन नौकरी के दौरान नेपाली में अंतरवार्ता लेकर मधेसियों के योग्यता और क्षमता को अपमानित करने वाले राजा महेन्द्र के शासन काल में योजना बद्ध तरीके से षडयंत्र पूर्वक तैयार किया गया नेपाली राष्ट्रवाद के गूंज 60 साल बाद भी सुनाई दे रहा है।
आज के गणतांत्रिक युग में भी मधेसी के प्रति नेपाल सरकार का दृष्टिकोण शाही संस्कृति से प्रभावित ही दिखाई देता है। दूसरी ओर मधेस के कुछ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग अपने व्यक्तिगत लाभ और जातिगत विशेषाधिकारों के लिए राजशाही प्रवृत्ति का समर्थन करते पाए जाते हैं। मधेशी समुदाय के व्यवहार और विचारों पर पारंपरिक रूप से कुछ वर्गों का जबरदस्त मनोवैज्ञानिक प्रभाव आज भी सक्रिय है। इसी वजह से सिर्फ 3 फीसदी मधेशी 97 फीसदी लोगों पर अपनी भाषा थोपने के लिए शोर मचा रहे हैं। हालांकि इस विरोध अभियान में सक्रिय अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं के निशाने पर मधेस के उभरते नेता सीके राउत हैं। सीके राउत की गरिमा को कम करने के लिए विरोध प्रदर्शन किया गया है।

मिथिला नामकरण और मैथिली भाषा के बदले मधेश प्रदेश नामकरण करने वाली पार्टी की क्षणिक मदद से खुद को ताकतवर समझने वाला वर्ग इस बात से अनभिज्ञ है कि वो भविष्य में अपने ही बच्चों के लिए गड्ढा खोदने का काम कर रहे हैं।
एक महान व्यक्ति की पहचान उन कार्यों को प्राथमिकता देना है जो अधिकांश लोगों की भावनाओं को अपील करने की संभावना रखते हैं। तो चलिए बड़प्पन दिखाते हैं; और सभी मधेसियों के हित में निर्णय लेने का प्रयास करते हैं।
हिमालिनी यूट्यूब चैनल पर श्री सच्चिदानंद जी ने मधेश में चल रहे भाषा संघर्ष के बारे में बताते हुए विरोध के मूल कारण को उजागर किया है। उनका मानना है कि तथाकथित आंदोलनकारियों को अपनी भाषा के नाम पर अपनी ब्रह्म लूट कट जाने तथा जातीय वर्चस्व खत्म हो जाने का भय समाया हुआ है।
गौरतलब है कि भारत में मैथिली, भोजपुरी, मगही, बज्जिका और थारुहाट भाषाओं को बोलने वालों की संख्या नेपाल के मधेश से हजारों गुना ज्यादा है। ऐसे में जब हिंदी भाषा को भारतीय भाषा के रूप में विरोध किया जाता है, तो कल सरकार उपरोक्त भाषाओं को विदेशी भाषा के रूप में प्रतिबंधित भी कर सकती है, है ना? हाँ, तो आइए समय पर सद्बुद्धि प्रदान कर दूरगामी लाभ प्राप्त करने का निश्चय करें। भावी मधेसी भाषा हमारे समुदाय में बोली जाने वाली भाषाओं और बोलियों का सामूहिक रूप होगी। इसके बजाय, आइए इस कार्य को सरल और आसान बनाने के लिए अपने-अपने स्थानों से बौद्धिक समर्थन के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। सिके राउत की पार्टी एक ऐसी पार्टी के रूप में सक्रिय नजर आती है जो किसी जाति या वंश की मोहताज नहीं है; बल्कि सभी मधेसियों की भावनाओं को संबोधित कर सकने का सामर्थ से ओतप्रोत है। तो आइए वर्षों की गुलामी से दीर्घकालीन मुक्ति और सशक्तिकरण के लिए भावनात्मक एकता की संस्कृति विकसित करें।
नेपाली भाषा में प्रयुक्त अधिकांश शब्द मैथिली, हिंदी, भोजपुरी, दुर्गा, थारुहट, ब्रज, संथाली, थीठी, उर्दू, बज्जिका भाषाओं से एकत्र किए गए है। इस कारण नेपाली भाषा भी हम नेपालियों के लिए दूसरी संपर्क भाषा ही है। यद्यपि मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारू, राजवंशी, संथाली, ठेठी, उर्दू, बज्जिका आदि राष्ट्रीय मधेसी भाषाएँ हैं, मधेश में बोली जाने वाली ये सभी भाषाएँ समग्र रूप से मधेसी भाषाएँ हैं। लेकिन अब मधेश की सभी राष्ट्रीय भाषाओं को एक में जोड़ने के लिए एक मधेसी भाषा को बड़ी सूझबूझ से विकसित किया जाना चाहिए। मधेश प्रांत और पूरे मधेशी भुखंड के सरकारी कार्यालयों और कार्यों में इस भाषा का उपयोग करने की तैयारी की जानी चाहिए। नहीं तो हम भ्रमित हो जाएंगे। और ध्यान रहे! भ्रमित व्यक्ति या समाज का विघटन तेजी से होता है। इसलिए स्थिति से निर्मित तथ्यों को बिना जाति या दलगत रंग दिए सुनहरे भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
जनमत पार्टी के नेता सिके राउत लगायत के सांसदों के द्वारा शपथ के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा मधेसी भाषा के रूप में एक नया आयाम जुड़ गया है। पांच-सात साल पहले मैंने पोस्ट किया था कि (मधेशी हिंदी) हमारी भाषा होनी चाहिए। उस समय बहुत से लोग हैरान थे। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। आइए ध्यान से देखें; नेपाली भाषा क्या है? यह कहां से आया? इसे कौन लाया? इसका उपयोग क्यों किया हुआ? किस लक्ष्य के साथ इसे देश भर में इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया गया ? इन सवालों के संतोषजनक जवाब तलाशना हमारा कर्तव्य है। इस पर विश्लेषण किया जाना चाहिए। संक्षिप्त में, नेपाली भाषा गोरखा में बोली जाने वाली भाषा है। साह वंश के राजाओं ने अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए काठमांडू उपत्यका पर सत्ता पर कब्जा करने के बाद इसे राजकाज की भाषा के रूप में इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया था। इसी प्रकार मधेशी भाषा मैथिली, भोजपुरी, अवधि, मगही, बज्जिका, राजवंशी, ठेठी, उर्दू, हिन्दी आदि भाषाओं का सामूहिक रूप है जो मधेस में बोली जाती है। किसी भी वर्ग को इससे घबराने की जरूरत नहीं है। उपरोक्त भाषाओं में हिन्दी के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में समूचे मधेश को जोड़ने की क्षमता नहीं है।
हिंदी के प्रति जन्मजात शत्रुता रखने वाली नेपाली संस्कर से सतर्क होकर ही मधेस के आदरणीय युवा नेता ‘ कोहिनूरे मधेश ‘ डॉ. सीके राउत ने मधेसी भाषा का नाम लेकर मधेस को समग्र रूप से संबोधित करने की शपथ ली है। साथ ही यह भी लगता है कि मधेस सरकार को मधेशी भाषा के विस्तार के लिए सार्वभौम पहल करनी चाहिए। ( पर्यायवाची, अनेकार्थक, श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द, विलोम, सार शब्द, संक्षिप्त, समूहवाची शब्द) ऐसे ही हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं के व्याकरण के साथ साथ हिंदी, मैथिली, मगही, भोजपुरी और थारू भाषाओं के शब्द से उपरोक्त शब्द भंडार को कुछ ही हफ्तों में एकत्रित करके मधेसी भाषा नाम की एक सर्वाग्राह्य, सशक्त, शक्तिशाली, सर्व, सरल और संपन्न भाषा के रूप में पूर्णता को सत्यापित किया जा सकता है। इसलिए लगता है कि हमारा ध्यान इस ओर खींचा जाना चाहिए।
भाषा एक बड़े क्षेत्र में बोली जाती है, बोली आम लोगों द्वारा अपने घरों, आंगनों और पड़ोस में बोली जाती है। सुरु सुरु में भाषा भी बोली के रूप में ही जन्म लेती है; जो आगे चलकर जब इसमें व्याकरण का प्रवेश होता है और यह वैज्ञानिक रूप से परिष्कृत हो जाता है तब भाषा का रूप धारण कर लेता है। वही आम आदमी की बोली तब भाषा बन जाती है। इस प्रकार बहुसंख्यक लोगों द्वारा सम्मानपूर्वक बोली जाने वाली भाषा समय के साथ-साथ राष्ट्रभाषा के रूप में हम सभी का मान बढ़ाने लगती है। हमें यह भी देखना देखना चाहिए कि हिंदी, आज का सार्वभौमिक भाषा, 700 वर्षों तक बोलियों तक ही सीमित थी। तो अन्य भाषाओं के बारे में क्या कहा जाय? अतः ऐसा प्रतीत होता है कि हमें भी समझदारी और सम्मान के साथ मधेशी भाषा के विकास में अपना योगदान देने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। हमें मधेसी राष्ट्रवाद और स्वाभिमान को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। यथास्थितिवादी से सावधान रहने की आवश्यकता है। अन्यथा वो हमें पशुता में धकेलने से पीछे नहीं हटेंगे। समय सापेक्ष परंतु सर्वजन हिताय प्रगतिशील विचाराधारा ही मानवता के उतुंग शिखर को छूने में समर्थ होती है। विकाश मानवता के लिए अनिवार्य पहलू है। या तो हमें विकाशित होना होगा या अविकशित। बीच में कोई स्थान नहीं है। या तो अपडेट हों अथवा आउट आफ डेट हों। अब समझना आप को है, मधेश के युवाओं को है, यहां के सक्षम तथा योग्य भाई बहनों को है। धन्यवाद!


