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बहस मधेसी भाषा की : संतोष मेहता

 

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सन्तोष मेहता, (गजेंद्र न.सिंह प्रतिष्ठान)
मातृ भाषा और सम्पर्क भाषा (राजकाज भाषा) बीच द्वन्द सम्बन्ध हमेशा रहा है। डाक्टर सी के राउत सदन में शपथ ग्रहण का माध्यम भाषा मधेसी भाषा कहने पर पिछले कुछ दिनों में मधेस में भाषा विवाद और विमर्श फिर एक बार जोरो पर है । कुछ लोग “मधेसी भाषा” का वकालत कर रहे है और कुछ लोग इसको स्थानीय (मैथिली) भाषा के विरुद्ध एक षड्यन्त्र के रुप में परिभाषित कर रहे हैं । कुछ का कहना है डा. राउत का यह सिर्फ एक राजनीति स्टंट के सिवा कुछ भी नही है। वैसे मधेशी भाषा को किसी भी भाषा बिज्ञ द्वारा औपचारिकता नहीं दी गयी है । लेकिन इसके बारे में कम से कम एक औपचारिक रुप में चर्चा जरूर शुरु हुई  है ।
सम्पुर्ण उत्तरी भारत को जोडने वाली भारत की सम्पर्क भाषा हिन्दी का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । आर्यों की भाषा वैदिक संस्‍कृत थी । वैदिक संस्‍कृत में वेदों की रचना हुई । इस भाषा का उच्‍चारण जब सामान्‍य जन के लिये संभव न हुआ तो उच्‍चारण अशुद्धि के कारण प्राकृत भाषा का जन्‍म हुआ।
वैदिक काल की प्राकृत बदल कर दूसरी प्राकृत के रूप में पाली भाषा कहलायी जिसमें बाद में चलकर बौद्ध र्धम का प्रचार हुआ ।
कालान्‍तर में इस दूसरी प्राकृत में भी परिवर्तन हुआ । अपभ्रंश का अर्थ है बिगडा हुआ । इस अपभ्रंश से आगे चलकर पूर्वी हिन्‍दी और पश्चिमी हिन्‍दी का विकास हुआ और इन्‍ही रूपों से हिन्‍दी का जन्‍म हुआ । खास कर के १००० ई. से वर्तमान समय तक वर्तमान आर्य भाषाएं विकसित हुई है । पाली में प्राकृत का जो रूप था उसका विकास धीरे-धीरे होता गया और कुछ समय बाद उसकी तीन शाखाएँ हो गईं; अर्थात् शौरसेनी, मागधी और महाराष्ट्री। शौरसेनी भाषा बहुधा उस प्रांत में बोली जाती थी, जिसे आजकल उत्तर प्रदेश कहते हैं। मागधी मगध देश और बिहार की भाषा थी तथा महाराष्ट्री का प्रचार दक्षिण के बंबई, बरार आदि प्रांतों में था। बिहार और उत्तर प्रदेश के मध्य भाग में एक और भाषा थी जिसको अर्धमागधी कहते थे।शौरसेनी अपभ्रंश सें हिन्‍दी, गुजराती, पंजाबी, और पहाडी भाषओं का संबंध है । पूर्वी हिन्‍दी का संबंध अर्धमागधी अपभ्रंश के साथ है । बिहारी, बंगला, आसामी, और उडिया का संबंध मागधी अपभ्रंश से, मराठी का महाराष्‍ट्री अपभ्रंश के साथ ।
इस प्रकार हिन्‍दी का जन्‍म शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ । हिन्‍दी भाषा के स्‍वरूप में अनेक परिवर्तन हुए तथा उसके कई भेद उपभेद बने । हिन्‍दी के प्रमुख भेद – पूर्वी और पश्चिमी हिन्‍दी । पश्चिमी हिन्‍दी मध्‍य प्रदेश ( दिल्‍ली,अम्‍बाला, का जिला और उतर प्रदेश का पश्चिमी भाग ) भाषा है । मेरठ तथा दिल्‍ली के निकट बोली जाने वाली पश्चिमी हिन्‍दी के ही एक रूप खडी बोली से वर्तमान साहित्‍य उर्दू तथा हिन्‍दी की उत्‍पति हुई । इसकी एक दूसरी बोली ब्रजभाषा मथुरा के आसपास बोली जाती है । इन दो बोलियों के अति‍रिक्‍त पश्चिमी हिन्‍दी बंगारू, कनौजी, और बुन्‍देली बोलियां भी सम्मिलित है । हिन्दी का वर्तमान साहित्यिक खडी बोली का ही वर्तमान रूप है । पूर्वी हिन्‍दी में अवधी का प्रभाव प्रमुख है ।
सन् 1857 ई. के हिन्दुस्तान मे विद्रोह के बाद हिन्दुस्तान में शान्ति स्थापना होने पर समाचार पत्र, मासिक पत्र, नाटक, उपन्यास और समालोचना का आरंभ हुआ। हिंदी की उन्नति का एक विशेष चिह्न इस समय को कहा जा सक्ता है हलांकि उस समय इस भाषा को खड़ी बोली (बोलचाल की भाषा मे) कहा जाता था । पादरी आदम साहब की लिखी और सन् 1837 में दूसरी बार छपी ‘उपदेश कथा’ में इस भाषा का नाम ‘हिंदवी’ लिखा है । उस समय अंग्रेज़ सरकार और क्रान्तिकारी दोनो के लिए एक सम्पर्क भाषा की जरुरत थी जो बंगाली, मैथिली, भोजपुरी अवधी आदि भाषा के बीच  सम्पर्क भाषा हो। समग्र में हिन्दुस्तान की भाषा हो । ऐसी हिंदी की जरुरत थी जिसे हिंदू-मुसलमान दोनों समझ सकें। खास मे हिंदी और उर्दू एक ही भाषा है । हिंदी कई नामों से प्रसिद्ध है; जैसे हिन्दुस्तानी, हिंदवी (हिंदुई), हिंदी, खड़ी बोली और नागरी। इसी प्रकार उर्दु भाषा के भी कई नाम हैं। वह हिंदुस्तानी, उर्दू, रेख्ता और दक्खिनी कहलाती है। इनमें से बहुत से नाम दोनों भाषाओं का यथार्थ रूप निश्चित न होने के कारण दिए गए हैं। हिन्दी भाषा के तीन नाम और प्रसिद्ध हैं (1) ठेठ हिंदी, (2) शुद्ध हिंदी और (3) उच्च हिंदी। ‘ठेठ हिंदी’ उस रूप को कहते हैं, जिसमें ‘स्थानीय बोली हो और कोइ बिदेशी बोली ना हो।’ इसमें ‘तद्‌भव’ शब्द आते हैं। ‘शुद्ध हिंदी’ में तद्‌भव शब्दों के साथ तत्सम शब्दों का भी प्रयोग होता है, पर उसमें विदेशी शब्द नहीं आते। ‘उच्च हिंदी’ से वह भाषा समझी जाती है, जिसमें अनावश्यक संस्कृत शब्दों की भरमार हो । फारसी, अरबी शब्द ज्यादा हो तो उर्दु, संस्कृत ज्यादा हो तो हिन्दी ।
हिंदी का इतिहास 200 वर्षों से ही कम है जबकि मैथिली, भोजपुरी भाषा बहुत ही पुरानी है । नेपाली भाषा का इतिहास भी इसीतरह 100 साल से भी पुराना नही है । मधेस मे भी शुद्ध मैथिली, भोजपुरी वा अवधी बहुत ही कम लोग बोलते हैं । सभी भाषा का अपभ्रन्स हो चुका है । साथ ही उपरोक्त भाषा सम्पुर्ण मधेस की भाषा हो भी नही सकती है ।
मधेस के सन्दर्भ में हिन्दी भाषा स्थानीय मातृभाषा को क्षति किए बगैर स्वभाविक रुप से सम्पर्क भाषा की भूमिका निर्वाह कर सकता है । जो नेपाली सहित अन्य भाषा के द्वारा सम्भव नहीं हो सकता है। अत: मधेस मे मातृभाषा के रुप मे बोली जाने वाली प्रत्येक भाषा को उचित स्थान देते हुए हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रुप मे प्रयोग करना उपयुक्त रहेगा। वैसे तो मधेस की सम्पर्क भाषा हिन्दी या नेपाली भी शुद्ध नही‌ं रहती है। स्त्रीलिंग पुलिङ्ग की गलती से लेकर मैथिली मगही भोजपुरी अवधी थारु और नेपाली भाषा का नेपाल के हिन्दी के उपर  प्रभाव रहा है । हमारी हिन्दी दिल्लीवाली और पटनावाली हिन्दी से अलग है । इसलिए इस भाषा को हम क्षेत्रीय नाम मधेसी हिन्दी व “मधेसी भाषा” दे सकते हैं । इस से भारत की भाषा जैसा आरोप भी कम होगा । हम मधेस को एक राष्ट्र और मधेसी को एक राष्ट्रीयता मानते हैं, इस भाष्य को भी बल मिलेगा । वैसे मधेस में बोली जाने वाला सभी भाषा मधेसी है जैसी हल्की टिप्पणी भी की जा सकती है । किसी एक भाषा को माध्यम भाषा के रुप में अपनाना बेहतर और दूरगामी रहेगा, लेकिन इस पर गम्भीर शोध की जरुरत है । खैर इस बहस का प्रारम्भ हुआ है ।संसदीय घेरा मे आने से इस का वजन भी बढा है इसके लिए डा. सिके राउत जी को धन्यवाद !

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