निर्विकल्प हिन्दी : अजय कुमार झा
अजय कुमार झा, जलेश्वर । भाषा हृदय की अभिव्यक्ति के साथ ही संस्कृति और सभ्यता की वाहक भी है। हिंदी अपनी आंतरिक चुनौतियों से जूझते हुए आज राजभाषा ही नहीं, बल्कि विश्वभाषा बनने के निकट है। इसमें अन्य भाषाओं को आत्मसात करने की क्षमता है। विदेशी साहित्य का हिंदी में अनुवाद और हिंदी साहित्य का विदेशी भाषाओं में अनुवाद आवश्यक है। हिंदी आज सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि बाजार की भी भाषा है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों को जन्म दिया, जिससे न केवल हिंदी का अनुप्रयोग बढ़ा, बल्कि युवाओं को रोजगार के नए अवसर भी मिले। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि भारत उनके उत्पाद का बड़ा बाजार है और यहां के अधिकतर उपभोक्ता हिंदीभाषी हैं। इसलिए उन्हें अपना उत्पाद बेचने के लिए उसका प्रचार-प्रसार हिंदी में करना पड़ेगा। हमें हिंदी को ज्ञान और संचार की भाषा के रूप में विकसित करना होगा। किसी देश के विकास के लिए आवश्यक है कि वहां ज्ञान-विज्ञान की भाषा जनमानस द्वारा ग्राह्य हो और वह सामर्थ्य आज हिन्दी मे है।
आज हिन्दी अपने राष्ट्रीय स्वरुप में दक्खिनी हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी, अरुणाचली हिन्दी आदि में विस्तारित हो गई है। दक्षिण भारतीय हिन्दी के स्वरुप को हम भले ही मजाकिए अंदाज में हिन्दी सिनेमा में देखते है लेकिन इसे भी हिन्दी का विस्तार माना जाता है। स्पष्टतया, आज हिन्दी सार्वत्रिक रुप से संपूर्ण भारत की भाषा बन गई है। हिन्दी का यह अखिल भारतीय स्वरुप भारत के दक्षिण से उत्तर की ओर तथा भारत के पूर्व से पश्चिम की ओर आ रही है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हिन्दी का यह जबानी फैलाव एक दिन लिपि के स्तर पर भी होगा।
इस भाषायी विस्तार के कारण हिन्दी में केवल भारतीय भाषाओं के शब्द ही नही आए है बल्कि इसका फैलाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आप्रवासियों की हिन्दी में देखा जा सकता हैं। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम के अतिरिक्त जमैका, टोबैगो और गुयना जैसे भारतवंशी देश भी है। जहाँ की पचास फीसदी से ज्यादा आबादी तो कहीं पचास फीसदी से कम लोग मातृभाषा के रुप में हिन्दी का प्रयोग करते है। सूरीनाम की हिन्दी में ‘हमरी बात समझियो’ जैसा प्रयोग मानक हिन्दी माना जाता है। तो, मारीशस में ‘मैं बुटिक जा रहा हूँ (मैं दुकान जा रहा हूँ)’ जैसा प्रयोग सहज स्वाभाविक है। हिन्दी के बोलचाल के सैकड़ो शब्द मॉरीशस की भाषा क्रियोल में आ गये है। फीजी की मुख्य भाषा भी फीजी बात(फीजी हिन्दी) है। जिसका प्रयोग वहां की संसद में भी होता है। यह भी आधुनिक हिन्दी का ही विस्तार है।
भाषाएं संस्कृति की वाहक होती है और इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया पर प्रसारित हो रहे कार्यक्रमों से समाज के बदलते सच को हिन्दी के बहाने ही उजागर किया जा रहा है। ऐसे कार्यक्रमों में रामायण, महाभारत , चाणक्य , मुजरिम हाजिर , चंद्रकांता , अन्य धार्मिक धारावाहिक, राखी का स्वंयवर, बालिका वधू, इस जंगल से मुझे बचाओं, सच का सामना, अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो, आदि के नाम गिना सकते है। इन कार्यक्रमों की लोकप्रियता से भी हिन्दी भाषा की बढ़ती स्वीकार्यता का अंदाजा लगा सकते है।
हिंदी के विकास में कंप्यूटर जगत के हिंदी वर्ड प्रोसेसर की भी बहुमूल्य भूमिका है। कई संस्थानों ने हिंदी वर्ड प्रोसेसर का निर्माण कर हिंदी के विकास को गति प्रदान की है। इसके साथ-साथ 1991 में सरकार द्वारा जी.आई.एस.टी., शेलिपी, सुलीपी, ए.पी.एस., अक्षर विकास कार्यक्रम के तहत कई संस्थानों (सिद्धार्थ 1983 में डी.सी.एम.), लिपी (हिन्दीट्रौनिक्स 1983), आई.एस.एम., लिप ऑफिस (सी.डी.ए.सी., पुणे) के साथ कई अन्य संस्थानों ने भी हिंदी वर्ड प्रोसेसर का भी निर्माण किया है। पुणे स्थित सी.डी.ए.सी. संस्थान ने जी.आई.एस.टी. प्रौद्योगिकी की शुरुआत की, ताकि सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं का प्रयोग किया जा सके। यह इनफॉर्मेशन इंटरचेंज, स्कीन पर उसका प्रदर्शन एवं विशेष फोंट (आई.एस.एफ.ओ.सी.) के लिए भारतीय स्क्रिप्ट कोड का प्रयोग करता है। इसके साथ ही यह विभिन्न स्क्रिप्ट्स (आई.एन.एस.सी.आर.आई.पी.टी.) आदि के लिए कुंजीपटल ले-आउट का इस्तेमाल करता है। कम्प्यूटर के विकास के आरम्भिक काल में अंग्रेजी को छोड़कर विश्व की अन्य भाषाओं का प्रयोग बहुत कम किया जाता था। जिससे कारण सामान्य लोगों में यह गलत धारणा फैल गयी कि कम्प्यूटर अंग्रेजी के सिवा किसी दूसरी भाषा में काम ही नही कर सकता। किन्तु यूनिकोड के पदार्पण के बाद स्थिति बहुत तेजी से बदल गयी। 19 अगस्त 2009 में गूगल ने कहा की हर 5 वर्षों में हिन्दी की सामग्री में 94% बढ़ोतरी हो रही है। सन् 2000 में हिंदी का पहला Webportal अस्तित्त्व में आया था। तभी से इंटरनेट पर हिंदी ने अपनी छाप छोड़नी प्रारंभ कर दी जो अब रफ्तार पकड़ चुकी है। हिंदी भारत की उन 7 भाषाओं में से एक भाषा है जिसका इस्तेमाल Web addresses (URLs) बनाने के लिए किया जाता है
निजी टीवी और रेडियो चैनलों के आगमन और स्थापित पत्रिकाओं / समाचार पत्रों के हिंदी संस्करणों के विकास के कारण इन क्षेत्रों में भी नौकरियों के अवसर में कई गुना बढ़ौतरी हुई है। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में संपादकों, पत्रकारों, संवाददाताओं, उप संपादक, प्रूफ रीडर, रेडियो जॉकी, एंकर आदि की आवश्यकता होती हैं, इन लोगों का अधिकांश कार्य भी हिंदी में ही होता है। हिंदी में शैक्षणिक योग्यता रखने के साथ-साथ पत्रकारिता / जनसंचार में डिग्री / डिप्लोमा की योग्यता के साथ अभ्यर्थी एक से अधिक स्थानों पर नौकरी का अवसर पा सकते हैं। इसके अतिरिक्त अभ्यर्थी रेडियो / टीवी / सिनेमा के क्षेत्र में स्क्रिप्ट लेखक / संवाद लेखक / गीतकार के रूप में उपलब्ध अवसर का लाभ उठा सकते हैं। इन क्षेत्रों में रचनात्मक, कलात्मक लेखन की मांग होती है जो अभ्यर्थी इन क्षेत्रों की डिग्री या डिप्लोमा हासिल कर स्वयं में विकसित कर सकते हैं।
हिन्दी भाषा जिसका सीधा सम्बन्ध आपकी आत्मा से है। हमारे देश की जो प्राण रुपी भाषा है वो हिंदी है। ये एक इडो-आर्यन भाषा है और लगभग 615 मिलियन लोग हिंदी भाषा बोलते हैं। भारत में, यह उत्तरी राज्यों राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड और बिहार में इस्तेमाल की जाने वाली मुख्य भाषा है, और उत्तर और मध्य भारत के अधिकांश हिस्सों में बोली जाती है अन्य भाषाएँ जैसे पंजाबी, गुजराती, मराठी या बंगाली। नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे अन्य हिस्सों में भी लोग हिंदी समझने में सक्षम हैं। हिंदी को खड़ी बोली बोली से लिया जाता है, जिसे हिंदुस्तानी के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दी का क्षेत्र विशाल है तथा हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना भी हुई है। ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा , अवधी ,कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही आदि प्रमुख हैं। ये बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। देशी भाषा, आदी भाषा, हिन्दवी, खड़ी बोली आदि हिन्दी का ही नाम है।
हिन्दी भाषा की जड़ें संस्कृत भाषा में हैं और इसमें संस्कृत की शब्दावली अधिक है।
हिन्दी भाषा, भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। चीन की मंडारिन के बाद यह विश्व में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी के अधिकतम शब्द संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा से लिए गए हैं। इसलिए इस भाषा को संबंध भाषा के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। इसे नागरी नाम से भी पुकारा जाता है। देवनागरी में 11 स्वर और 33 व्यंजन होते हैं और इसे बाएं से दाएं ओर लिखा जाता है। भारतीय संविधान ने 14 सितंबर 1949 में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिया। इसलिए हर साल हम 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं। गूगल ने कहा है कि इंटरनेट पर हिंदी कंटेंट की मांग अब बढ़ना शुरू हो गई है। यह साल-दर-साल English कंटेंट के 19 प्रतिशत वृद्धि के मुकाबले 94 प्रतिशत बढ़ती जा रही है। हिंदी भाषा सबसे सरल और लचीली है। हिन्दी बोलने एवं समझने वाले लोग पचास करोड़ से भी अधिक है।
पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा भाषाएँ बोली जाती हैं। विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों का देश भारत सिर्फ एक या दो भाषाओं का नहीं बल्कि 461 भाषाओं का घर है पर इनमें से 14 विलुप्त हो गईं है।
यह सर्वकालिक सत्य है कि कोई भी देश अपनी भाषा में ही अपने मूल स्वत्व को प्रकट कर सकता है। निज भाषा देश की उन्नति का मूल होता है। निज भाषा को नकारना अपनी संस्कृति को विस्मरण करना है। जिसे अपनी भाषा पर गौरव का बोध नहीं होता, वह निश्चित ही अपनी जड़ों से कट जाता है और जो जड़ों से कट गया उसका अंत हो जाता है। भारत का परिवेश निसंदेह हिंदी से भी जुड़ा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि हिंदी भारत का प्राण है, हिंदी भारत का स्वाभिमान है, हिंदी भारत का गौरवगान है। भारत के अस्तित्व का भान कराने वाले प्रमुख बिंदुओं में हिंदी का भी स्थान है। हिंदी भारत का अस्तित्व है। वाणी (भाषा) एक प्राकृतिक शक्ति है |वह ही भावों की अभिव्यक्ति की “श्री” है ,चाहे कोई भी भाषा हो,सदैव सम्माननीय है ,फिर उनमें से भी “हिन्दी वाणी” ब्रह्माण्ड की प्रथम गूँज में से “ॐकार” के रूप में अवतरित हुई |और ऋषियों की देवनागरी भाषा से अंकित हुई ,हमारी ”मातृ वाणी” हिन्दी भाषा जन-जन में यदि आत्मा और प्राण बन के समायी हुई है ,तो वह अपनी दिव्य शक्तियों के कारण ही है |हिन्दुस्तान के प्रत्येक प्राणी के सहज विचारों की सहचरी है।
हम जैसे आम नेपाली नागरिक,जो अपना भविष्य और अस्तित्व को नेपाल में सहज और सुरक्षित देखना चाहते हैं; उनके लिए हिंदी भाषा ही सहज महायान के रूप में वैतरणी तारक साबित होगा। हिंदी ही उन्हें विश्व के हरेक कोने कोने में अपने को स्थापित करने के लिए संवाद का सहज परंतु विराट माध्यम बनेगा। इस मामले में नेपाल के सरकारी उपेक्षा के शिकार मधेसियों के लिए तो हिंदी भाषा वरदान से कम नहीं है। वास्तावम में मधेस के लिए सर्व मान्य और सर्व ग्राह्य भाषा वह होगा जो हमारे किसान लोग अपनी जीवन यापन हेतु भारत में जाकर बोलते हैं। जो मधेस के मजदूर लोग अपने परिवार का पालन पोषण के लिए सहजता हेतु पंजाव, दिल्ली, हरियाणा, विहार और अन्य जगह जाकर बोलते हैं। वहीं मधेस के विद्वान् लोग काठमांडू में हिंदी में बोलकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते आ रहे हैं। राष्ट्रसेवक लोग नेपाल के पूरव से पश्चिम तक हिंदी को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर सेवा कार्य में अपने को सहज पाते हैं। हमारे आध्यात्मिक संत सन्यासी और दार्शनिकगण हिंदी में प्रवचन करते हैं और श्रोता शिष्य भक्त और साधकों को श्रवण करने तथा गूढार्थ को समझने में हिंदी में सहज होता है। सारे उच्चकोटी के विश्वस्तरीय साहित्य, वेदका रहश्य, उपनिषदों के तत्व, भागवत के भावार्थ, सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ गीता के गरिमागान, पुराणो तथा कुरान, बाइबल, धम्मपद, गुरुग्रंथ, त्रिपिटक, मानस, ताओ, कवीरवाणी, गोरखवाणी आदि हजारों रहश्यदर्शी ग्रंथों का समसामयिक विश्लेषण और विवेचन हिंदी के अलाबा अन्य किसी भाषा में उपलब्ध नहीं है। अतः ज्ञान विज्ञान, धर्म अध्यात्म, आयुर्वेद और सामवेद, संगीत और नृत्य, जडीबुटी से जीवन व्यवहार तक, प्रेम से परमात्मा तक, शुभ से सौभाग्य तक, हस्त रेखा से कुंडली तक, कृषि से व्यापार तक, तकनीक से बाजार तक का ज्ञान हमें हिंदी के अलावा अन्य भाषा में संभव नहीं है। मैं मधेस के हक में खड़ी हिंदी और बनारसी हिंदी की बात नहीं करता हूँ। इसलिए इसका नाम (मधेसी-हिंदी) भाषा रख कर विना विवाद के आगे बढ़ने का प्रयास किया जाय।।
बोलियां ही हिन्दी की सबसे बड़ी शक्ति है। एक हिन्दी वह है जो अपने मानक रुप में अपनी सरलता और नियमबद्धता के कारण राष्ट्रीय और क्षेत्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय भाषा तक है। दूसरी हिन्दी वह है जो आंचलिक और क्षेत्रीय प्रकार की है। यह हिन्दी मानक हिन्दी के लिए शब्दों और प्रयोगों का अक्षय भंडार है। मानक हिन्दी का वहीं अंश गृहीत होता है जो इसके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बोधगम्य होने में बाधक नहीं है। नमनीयता और अनुशासनबद्धता ऐसे परस्पर विरोधी ध्रुव है जिनके बीच दुनियाभर के बीच बड़ी भाषाएं काम करती है। हिन्दी का सच भी यही है। “ ऐसे में यह अत्यावश्यक है कि हिन्दी के इस नए स्वरुप को मानकीकृत किया जाए। सरकार को भी चाहिए कि वह सभी प्रमुख भाषाविदों से विचार-विमर्श करके हिन्दी का एक ऐसा मानक शब्दकोश तैयार करें जिसमें वर्तमान में प्रयोग किए जा रहे सभी शब्दों का समावेश हो तथा इस शब्दकोश में आम बोलचाल में स्वीकृत दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले।
जय हिंदी!



