आओ हे ॠतुराज वसंत, रति की प्रतिकृति रूप अनंत, चली इतराती प्रिय के संग : प्रतिभा राजहंस
प्रतिभा राजहंस की कविता बसंत गीत और अन्य
बसंत गीत
——-प्रतिभा राजहंस
आओ हे ऋतुराज वसंत
भरो जग- जीवन में आनंद
खिलाओ सुमन उड़े मकरंद
आओ हे ऋतुराज वसंत
आओ मन्मथ मित्र वसंत
खिलाओ पत्र-पुष्प अनंत
लाल-हरा- पीला सबरंग
रंगो धरा का चीर अनंत
सजाओ धरा-वधू के अंग
आओ हे ऋतुराज वसंत
आओ हे ऋतुराज वसंत
सजा लता-मंडप बहु रंग
बुलाओ दूलह मित्र अनंग
रति दुल्हन में भरो उमंग
चिर यौवन अनंत रसरंग
आओ हे ऋतुराज वसंत
आओ हे ऋतुराज वसंत
फूले प्रकृति सखी के अंग
फले धरा- वधू सबरंग
आओ हे ऋतुराज वसंत
आओ हे ऋतुराज वसंत
कुहू-कुहू कोयल की तान
मधुर भ्रमरों का गुंजन गान
तितलियों के पर रंग- बिरंग
धरा की चुनर हो नवरंग
बसाओ प्राणों में आनंद
आओ हे ॠतुराज वसंत
आओ हे ॠतुराज वसंत
प्रकृति बिहॅंस उठी है मंद
खुले कोंपल हैं कल थे बंद
रति की प्रतिकृति रूप अनंत
चली इतराती प्रिय के संग
पुरुष मन में छाया आनंद
आओ हे ॠतुराज वसंत
आओ हे ऋतुराज वसंत
ह्रदय कमल फूले नवरंग
भ्रमर झुंड को मृदु मकरंद
आओ हे ऋतुराज बसंत
आओ मन्मथ मित्र वसंत
सार्थक सुबह
माँ के कोमल गुलाबी हाथों की
रंगबिरंगी चूड़ियाँ
गुलाबी बदन पर शोभने वाला ब्लाउज
माथे पर करीने से लिया गया आंचल
और हाथ में तांबे का जल भरा लोटा
सूर्य को अर्घ्य देने जाती
एक एक सीढ़ी चढती मेरी माँ
जाने कितनी तस्वीरें सुबह सुबह
रोज उतर आती हैं मेरे जेहन में
मेरी माँ, ओ मेरी माँ
पुकारता मेरा मन
तल्लीनता से निहारता मेरा मन
और मेरी सुबह
सार्थक हो जाती है
व्याप्त रहे
कहते रहे जोर देकर
ऊपर नहीं जाना है
मेरा स्वर्ग धरती पर
ऊपर कौन ठिकाना है
अपनी कमाई खाता हूँ
उनकी ड्यूटी निभाता हूंँ
किसी को न सताता हूंँ
सबकी सेवा ही तो करता हूंँ
कहेंगे अगर चले चलो
मैं यही उन्हें कहूंगा
वहाँ भी कुछ अड़ा हो
तो मैं जरूर चला चलूंगा
कह कर जब भी हंसते थे
मन आह्लादित हो उठता था
उनका कहा-सुना
पूरा सच लगता था
हे देव मैं पूछती हूंँ
क्या मेरे बाबूजी की
वहाँ इतनी जरूरत है
क्या तेरे स्वर्ग की भी
दुनिया सी ही सूरत है
जिसको सुधारने को
तूने उन्हें बुलाया है
क्यों हमें रुलाया है
हे देव , मेरे पिता
मनुज नहीं अवतारी थे
धरती पर रह कर वे
सबसे बड़े संसारी थे
सुना जाना पढ़ा है
तेरा संसार बहुत बड़ा है
बाबूजी का संसार
जहाँ उनकी पड़ी नजर
अपने पराए सब
एक से थे उनके दर
कौन कहाँ रुका है
आस टिकी उन पर है
क्षणभर में वहाँ उतर
पीर उसकी हरते थे
मदद को सदा तत्पर
तन मन धन से
लगे ही रहते थे
कैसे कहूँ मेरे थे
सिर्फ मेरे ही थे
जबकि सभी उन्हें
यही तो कहते थे
काका सिर्फ मेरे हैं
दादा सिर्फ मेरे हैं
नाना सिर्फ मेरे हैं
मामा सिर्फ मेरे हैं
भैया सिर्फ मेरे हैं
किसके नहीं थे वे
कहाँ नहीं फैले थे
हे ईश्वर तेरे सदृश
व्याप्त रहे हरमन में
व्याप्त रहे हर कण में



आपकी यह रचना बहुत ही सुंदर और मार्मिक है। मेरे पापा भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। आपकी कविता पढ़ते हुए मेरी आंखों के सामने मेरे पापा की छवि तैरने लगी। जब वे थे तो मैं कितना बेफिक्र रहा करता था और अब जब नहीं है, तो मैं कितना परेशान रहने लगा हूं। कविता को पढ़ते हुए मेरी आंखें भर आई। मुझे लगा जैसे मैं अपने पापा के बारे में पढ़ रहा हूं। आपकी एक-एक पंक्ति मुझे अपने पापा के लिए जान पड़ रही थी। बेहतरीन।