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प्रचण्ड–पथ में पुष्प या काँटे ? : डा.श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक दिसंबर । मैदान क्रिकेट का हो या राजनीति का, यहाँ ंतिम समय तक खेल के बनने और बिगड़ने की संभावना बनी रहती है । पिछले चुनाव का परिदृश्य इस बात की पूर्ण रूप से पुष्टि करता है । मशहूर शेर है ।।।मुझे तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था, हमारी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था’ । किन्तु ये नदी उस राजनीति की है, जहाँ कब कौन कश्ती पार लगा दे और कौन कश्ती डुबा दे, पता नहीं होता क्योंकि, यहाँ न कोई गैर होता है और न ही कोई अपना । बस सभी स्वार्थ के साथी होते हैं । बस यही समझने में राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी देउवा ने गलती कर दी । और वहीं ।।।राजनीति संभावनाओं का खेल है’ कहने वाले प्रचण्ड बाजी मार गए । ओली ने अपने कार्यकाल में जो वादाखिलाफी की थी उसे इस बार प्रचण्ड हित में लागू कर दिया । जी हाँ यही राजनीति है जहाँ दलगत कोई नीति नहीं होती । विपरीत धार में भी नेता अपनी कश्ती पार लगा लेते हैं यह नेपाल की राजनीति से अलग कहीं और नहीं दिखती । कुर्सी का मोह होता ही ऐसा है । खैर.. ।

माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल के नेतृत्व में बनी सरकार अवसरों और चुनौतियों से भरी है । यह प्रचंड और उनकी सभी सत्ता सहयोगी पार्टियों और नेताओं पर लागू होता है । करीब डेढ़ दशक पहले एक नए जोश और दृष्टिकोण के साथ पहली बार सत्ता में आए प्रचंड ने अपने शब्दों में ।।। अहंकार’ से न सिर्फ सत्ता गंवाई, बल्कि जनता का अपार विश्वास भी खो दिया था । शायद यह उनके लिए उस खोए हुए विश्वास को पुनर्जीवित करने का अंतिम अवसर है

नेकपा अध्यक्ष प्रचण्ड के रूप में देश को अपना ४४ वां प्रधानमंत्री मिल चुका है । नेपाली राजनीति के मंच पर एक रोमांचक घटना को अंजाम देते हुए प्रचंड ने यू–टर्न लिया और देउबा को अलविदा कह कर केपी ओली का दामन थाम लिया । प्रतिनिधि सभा को दो बार भंग करने के केपी शर्मा ओली के कदम की प्रतिक्रिया के रूप में “संविधान
की रक्षा, स्थिरता और समृद्धि के लिए गठबंधन” के राजनीतिक नारे के साथ एक पाँच–पक्षीय वाम–लोकतांत्रिक गठबंधन का गठन किया गया था । और चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद यही गठबंधन आपसी सहमति से सरकार नहीं बना सका और एक नये गठबंधन का जन्म हुआ । गठबंधन टूटने के लिए मुख्य रूप से कौन जिम्मेदार था ? और नवगठित बहुरंगी गठबंधन का भविष्य क्या होगा ? इन सवालों ने नेपाली राजनीतिक बाजार को गर्म कर दिया है । पाँच दलों के वाम–लोकतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व करने वाले नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा की अदूरदर्शिता कका खामियाजा काँग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ रहा है । देउबा के प्रधानमंत्री बनने की चाहत से न सिर्फ वाम–लोकतांत्रिक गठबंधन टूटा, बल्कि खुद नेपाली कांग्रेस पार्टी को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है ।

देखा जाए तो इसमें माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचण्ड की कोई गलती नहीं है उन्होंने तो मौके का फायदा उठाया । चुक तो देउवा के आकलन में हुई, जिन्हें यह लगा था कि चूंकि नेकपा (माओवादी केंद्र) और एमाले (यूएमएल) किसी भी परिस्थिति में एक–दूसरे का समर्थन नहीं करेंगे, और कोई भी अन्य दल या गठबंधन बहुमत साबित नहीं कर सकता है ऐसे में उनसे अधिक मजबूत दावेदार प्रधानमंत्री पद के लिए कोई है ही नहीं । जबकि चुनाव के बाद, गठबंधन दल के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक आम सहमति थी कि नेकपा (माओवादी केंद्र) के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल प्रचंड पहले कार्यकाल के लिए सरकार का नेतृत्व करेंगे, और अध्यक्ष, स्पीकर, प्रमुख के राजनीतिक पद शक्ति संतुलन के आधार पर आपसी सहमति से मंत्री व अन्य का फैसला होगा । लेकिन यहाँ नेपाली कांग्रेस का नेतृत्व ईमानदार नहीं हो पाया और उनके हाथों से सब निकल गया ।
हालांकि कुछ लोगों को पुष्प कमल दहाल और केपी शर्मा ओली के अप्रत्याशित पुनर्मिलन पर आश्चर्य हुआ, उनकी आलोचना भी हुई जो स्वाभाविक भी था । किन्तु अब जो सवाल सामने है वह यह कि इन घटनाओं का नेपाल के भविष्य पर क्या असर होने वाला है ? क्योंकि प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार और गठबंधन के सामने जर्जर हो चुकी देश की अर्थव्यवस्था को नया जीवन देने और नेपाली जनता जिस विकास और समृद्धि के सपनों की तलाश में है, उसे हकीकत का रूप देने की चुनौती है ।

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मौजूदा गठबंधन से जुड़े अन्य दलों की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए क्या वाकई यह गठबंधन देश और जनता की चुनौतीपूर्ण स्थिति में समस्याओं को हल कर आगे बढ़ेगा ? इस बात का व्यापक संदेह है, जो स्वाभाविक है ।
क्योंकि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने राजनीतिक दलों को कोसते हुए ।।।नो नॉट अगेन’ का अभियान चलाया था । युवा होने का आकर्षण और विरोध की आवाज ने इन्हें राजनीति के मैदान में पहली बार ही अभूतपूर्व सफलता दिलाई । जनता ने सोचा था कि रास्वा के अध्यक्ष विपक्ष में बैठेंगे और एक मजबूत विपक्ष की जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगे । किन्तु
है । उनके नेतृत्व में अलग–अलग समय पर हुए आंदोलनों, अभियानों और घोषणाओं में जनमत पार्टी ने मधेश में रोजगार सृजित करने और विकास को गति देने का सपना साझा किया है उसे वो कितना हकीकत में बदल सकते हैं यह भी आनेवाला समय बताएगा ।

अजीब सा दिखने वाला यह गठबंधन सफलतापूर्वक आगे बढ़ेगा या कुछ राजनीतिक उद्देश्यों से बने पिछले गठबंधनों की तरह बीच में ही अटक जाएगा, यह कहना संभव नहीं है । हालांकि, समय बीतने के साथ यह स्पष्ट हो जाएगा कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं क्या थीं और क्या हैं ।
माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल के नेतृत्व में बनी सरकार अवसरों और चुनौतियों से भरी है । यह प्रचंड और उनकी सभी सत्ता सहयोगी पार्टियों और नेताओं पर लागू होता है । करीब डेढ़ दशक पहले एक नए जोश और दृष्टिकोण के साथ पहली बार सत्ता में आए प्रचंड ने अपने शब्दों में ।।। अहंकार’ से न सिर्फ सत्ता गंवाई, बल्कि जनता का अपार विश्वास भी खो दिया था । शायद यह उनके लिए उस खोए हुए विश्वास को पुनर्जीवित करने का अंतिम अवसर है । जब भी देश की राजनीति में परिवर्तन होता है और नए प्रतिनिधि होते हैं तो उनकी एक ही धारणा होती है कि वो देश का विकास करेंगे, अर्थव्यवस्था में सुधार लाएँगे, समृद्धि लाएँगे, सुशान लाएँगे, बुनियादी ढांचे के विकास को गति देंगे । लेकिन जैसे–जैसे दिन गुजरता जाता है सारे दावे और वादे खोखले होते चले जाते हैं । कोई भी नया परिवर्तन नहीं दिखता है । कम पूंजीगत व्यय, ठेकेदारों की लापरवाही, बिचौलियों द्वारा नीतिगत स्तर
हुआ बिल्कुल उल्टा । रास्वा बिना किसी स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा, दिशा और पृष्ठभूमि के नवीनतम राजनीतिक व्यवस्था के उत्पाद के रूप में सामने आई और कुर्सी की दौड़ में आगे निकल गई । अध्यक्ष रवींद्र लामिछाने ने एक महत्त्वपूर्ण पद हासिल करने में सफलता हासिल कर ली । एक अनुभवविहीन नेता के हाथों में गृहमंत्री जैसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद को सौपा गया है । अब देखना है कि इसमें उनकी कार्यशैली कैसी होती है ।
इसी तरह, संवैधानिक राजतंत्र और हिंदू राज्य के प्रतिगामी राजनीतिक एजेंडे को चलाने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी द्वारा प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार के समर्थन को देश और दुनिया उत्सुकता से देख रही है । वहीं उपेंद्र यादव, महंत ठाकुर, राजेंद्र महतो जैसी शख्सियतों के पीछे खड़े सीके राउत के सामने मधेश की जनता के चेहरों पर बदलाव, उत्थान और नवजागरण की उम्मीद जगाने की चुनौती

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पर हस्तक्षेप, खराब विकास, परियोजना कार्यान्वयन में देरी, आदि ऐसी समस्याएँ हैं जो जैसी की तैसी बनी रहती है । वस्तुतः उपरोक्त समस्याओं के कुछ मुख्य कारणों में वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था एवं मानव संसाधन की अक्षमता प्रमुख हैं । तेजी से आर्थिक विकास शुरू करने के लिए सरकार को संरचनात्मक बदलाव का रणनीतिक उपयोग करने की आवश्यकता है । उसके लिए निवेश बोर्ड जैसी संरचना को एक शक्तिशाली विकास प्राधिकरण के रूप में विकसित किया जा सकता है और एक द्वार प्रणाली के माध्यम से नेपाल में बुनियादी ढांचे के विकास को आगे बढ़ाने के लिए एक संरचना का निर्माण किया जा सकता है । यह सरकार नेपाल की विकास प्रक्रिया में मील का पत्थर साबित हो सकती है यदि वह बाबूराम भट्टराई, सूर्यराज आचार्य या अन्य कुशल व्यक्तियों के समन्वय से बनने वाले ऐसे स्वायत्त तंत्र के तहत बुनियादी ढांचे के विकास को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक नीतिगत व्यवस्था कर सके । नेपाल की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सरकारी संस्थानों का प्रबंधन सक्षम लोगों को देने की नीतिगत व्यवस्था संरचनात्मक ।।।बदलाव’ का एक अन्य महत्वपूर्ण अंग बन सकती है । इसलिए नई सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है ।

नई सरकार के सामने एक चुनौती देश की शिक्षा व्यवस्था भी है जिसमें क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है । शिक्षा का क्षेत्र राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है जिससे मुक्ति आवश्यक है । पब्लिक स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक माहौल की कमी के कारण हजारों युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तलाश में विदेश जाने को मजबूर हैं और यही कारण है कि अरबों की पूंजी विदेशों में पलायन कर रही है ।
दूसरी तरफ देश की आर्थिक व्यवस्था दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है । देश भले ही श्रीलंका या पाकिस्तान की तरह कंगाली की कगार पर न हो किन्तु बहुत मजबूत
स्थिति भी नहीं है इसे स्वीकार करना होगा । नेपाल की आर्थिक स्थिति इतनी सहज नहीं है । पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में वृद्धि, विलासिता के साथ–साथ उपभोक्ता वस्तुओं के आयात में वृद्धि, शैक्षिक गतिविधियों के कारण पूंजी का पलायन की समस्या सामने है । जिससे उबरना आवश्यक है । देश में तरलता की कमी को कम करने के लिए, राष्ट्र बैंक ने जमा और ऋण पर ब्याज दरों में वृद्धि की । लेकिन एक ओर ब्याज दर में वृद्धि और दूसरी ओर विलासिता की वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध जैसे फैसलों ने न केवल सरकार की आय कम की, बल्कि औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों के निवेश और रोजगार के संकट को भी जोड़ा । नतीजतन, अर्थव्यवस्था में बहुपक्षीय संकट के संकेत उभर रहे हैं ।
लंदन स्थित ऑनलाइन पोर्टल वर्ड इकोनामिक्स के अनुसार नेपाल की कुल अर्थव्यवस्था का ३३.२ प्रतिशत अवैध रूप से संचालित होता है । वित्त मंत्रालय के डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, नेपाल की जीडीपी मौजूदा कीमतों में लगभग ४८ ट्रिलियन है, लेकिन विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, लगभग ६२ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था प्रकृति में अनौपचारिक है । वैसे तो नेपाल की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के बारे में शायद ही कोई अध्ययन किया गया है । ऐसे में अगर राज्य में देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए लंबी अवधि के फैसले लेने की जबरदस्त इच्छा शक्ति और क्षमता है तो मौजूदा कैबिनेट और मौजूदा प्रधानमंत्री प्रचंड को एक बहुत ही ।।।साहसिक फैसला’ लेने का साहस करना होगा और अनौपचारिक क्षेत्र में छिपे धन को वैध बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना होगा ।
भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ५०० और १००० के नोटों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था, वजह थी काला बाजÞारियों और भ्रष्ट लोगों को निशाना बनाना, जो धन की जमाखोरी कर रहे थे । क्या ऐसा कोई निर्णय लेने का हौसला हमारे यहाँ किसी नेता में है ?
देश को नव नियुक्त प्रधानमंत्री प्रचण्डसे उम्मीद है क्योंकि उन्हें एक कठोर निर्णय लेने वाले नेता के रूप में देखा जाता है । किन्तु यह आसान नहीं है क्योंकि उनकी कुर्सी के चारो ओर समर्थन के नाम पर जो दीवार खड़ी है उसे पार करना कठिन है । क्योंकि कठिन निर्णय लेने के लिए सतरंगे गठबन्धन की नहीं बल्कि बहुमत की सरकार का होना आवश्यक होता है ।

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पुष्प कमल दहाल प्रचंड को कार्यकारी के रूप में दो बार सफलतापूर्वक देश का नेतृत्व करने, क्षमताओं की पहचान के साथ जिम्मेदारी सौंपने और उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति देने, देश और लोगों की समृद्धि में ठोस योगदान देने का अनुभव है । साथ ही, सभी दलों को एक साथ लाने की अपनी परिपक्व और गतिशील नेतृत्व क्षमता के कारण कम समय में भी ठोस परिणामों के साथ उन्होंने खुद को एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित किया है । इसलिए आम लोगों को उम्मीद है कि प्रचंड चुनौतियों के पहाड़ों को पार कर सफलता की सीढि़यां चढ़कर इतिहास रचेंगे । अध्यक्ष प्रचंड के लिए लोगों के बीच अपने भरोसे और विश्वसनीयता की रक्षा करने का यह महत्त्वपूर्ण अवसर है जिसका उन्हें जरुर फायदा उठाना चाहिए । वहीं इसके विपरीत नई उभरी पार्टियों के लिए अपने अस्तित्व को बनाए रखने के साथ ही लोगों के बीच किए गए वादों को पूरा करने की चुनौती है । क्योंकि अब जनता के बीच किसी भी तरह के ढोंग के लिए कोई जगह नहीं है । इसलिए प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार के सामने खस्ताहाल देश की अर्थव्यवस्था को नया जीवन देने और सुशासन के साथ नेपाली जनता के विकास और समृद्धि के सपने को नया जीवन देने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है । नहीं तो यह खतरा है कि व्यक्ति या दल ही नहीं बल्कि व्यवस्था ही विफल हो जाएगी, जिसके परिणाम भयंकर होंगे । साथ ही संगठन में लगातार कमजोर हो रहे माओवादियों की साख बचाने का भी यह आखिरी मौका है ।

डॉ श्वेता दीप्ति

 

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